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सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने याचिकाकर्ताओं को डील से जुड़े दस्तावेज सौंपे

4 वर्ष पहले
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  • सरकार ने दस्तावेजों में कहा- राफेल डील रक्षा खरीद प्रक्रिया- 2013 में निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत हुई
  • राफेल डील से पहले रक्षा खरीद परिषद और संसद की सुरक्षा समिति से ली गई मंजूरी
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार ने राफेल डील से जुड़े दस्तावेज याचिकाकर्ताओं को सौंप दिए। सरकार ने बताया कि राफेल विमान खरीदने का फैसला सालभर में 74 बैठकों के बाद किया गया। दस्तावेजों में कहा गया कि 126 राफेल खरीदने के लिए जनवरी 2012 में ही फ्रांस की दैसो एविएशन को चुन लिया गया था। लेकिन, दैसो और एचएएल के बीच आपसी सहमति नहीं बन पाने से ये सौदा आगे नहीं बढ़ पाया। सरकार ने कहा कि एचएएल को राफेल बनाने के लिए दैसो से 2.7 गुना ज्यादा वक्त चाहिए था। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि केंद्र ने राफेल डील में कीमतों से जुड़े दस्तावेज सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपे।

 


दैसो और एचएएल के बीच दो बिंदुओं पर मतभेद थे

 

 
  • सरकार ने बताया, ‘‘126 लड़ाकू विमान खरीदने के लिए जनवरी 2012 में ही फ्रांस की दैसो एविएशन को चुन लिया गया था। दैसो और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच आपसी सहमति नहीं बन पाने की वजह से 126 राफेल विमान खरीदने का सौदा आगे नहीं बढ़ सका था।’’
  • ‘‘दोनों कंपनियों के बीच मतभेद के दो बिंदु थे। पहला- फ्रांस की कंपनी जितने समय में राफेल तैयार कर सकती थी, एचएएल को उससे 2.7 गुना ज्यादा समय भारत में विमान बनाने के लिए चाहिए था।’’
  • ‘‘दूसरा- दैसो को पूरी तरह से 18 विमान देने थे और 108 विमान भारत में बनाने थे। 108 विमानों को भारत में बनाने के अनुबंध से जुड़े कुछ मुद्दों पर दैसो और एचएएल के बीच सहमति नहीं बन पाई।’’
  • ‘‘ये मतभेद तीन साल से भी ज्यादा समय तक कायम रहे। फैसले में हुई देरी और यूरो-रुपए के एक्सचेंज रेट में बदलाव के कारण लड़ाकू विमानों की खरीद की लागत पर सीधा असर पड़ा।’’

 

विरोधी देशों ने 400 लड़ाकू विमान खरीद लिए थे

 

  • सरकार ने 16 पेज के दस्तावेज में कहा, ‘‘जून 2015 में 126 लड़ाकू विमान खरीदने का विचार छोड़ दिया गया। भारत ने बेनतीजा बातचीत में जितने साल लगाए, उस दौरान विरोधी देशों ने 20 स्क्वाड्रन बना लेने लायक 400 लड़ाकू विमान अपने बेड़े में शामिल कर लिए। इन देशों ने अपने पुराने विमानाें को अपग्रेड भी कर लिया।’’
  • ‘‘भारतीय वायुसेना में लड़ाकू विमानों की कम होती संख्या को देखते हुए तुरंत फैसला लेना जरूरी था। इस वजह से अप्रैल 2015 में दो स्क्वाड्रन बनाने लायक 36 तैयार राफेल विमान फ्रांस से खरीदने की सहमति बनी।’’
  • ‘‘36 राफेल विमान के सौदे के लिए 2013 की रक्षा खरीद प्रक्रिया का अनुसरण किया गया। मई 2015 से अप्रैल 2016 के बीच 74 बैठकें हुईं और राफेल सौदे को अंतिम रूप दिया गया। इसके लिए रक्षा खरीद परिषद और कैबिनेट की सुरक्षा संबंधी मामलों की समिति की मंजूरी भी ली गई।’’

 

सौदे को लेकर बेवजह का विवाद
- सरकार ने कहा, ‘‘दैसो और रिलायंस डिफेंस के बीच समझौते की खबरों को लेकर बेवजह का विवाद खड़ा किया गया है। भारतीय ऑफसेट पार्टनर के मामले में हमने किसी भी भारतीय कारोबारी समूह का जिक्र नहीं किया था।’’
- ‘‘आॅफसेट पॉलिसी इसलिए है ताकि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आ सके। इसका मकसद यह है कि विदेशी कंपनी को मिलने वाले हर एक डॉलर का 30 से 50 फीसदी हिस्सा भारत में निवेश के तौर पर लौटे।’’
- ‘‘मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि जब 2012 में दैसो को 126 विमानों की खरीद के लिए सबसे सस्ता बिडर चुना गया था, तभी रिलायंस के साथ उसका डिफेंस सेक्टर के लिए करार हो गया था।’’
- ‘‘ऑफसेट पार्टनर चुनना दो कंपनियों के बीच का कारोबारी फैसला है। ऑफसेट पार्टनर चुनने में भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं होती।’’

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1) फ्रांस के साथ एक साल तक चली बातचीत

सरकार ने दस्तावेजों में कहा, "राफेल डील की रक्षा खरीद परिषद से मंजूरी ली गई गई थी। डील को लेकर फ्रांस सरकार के साथ 1 साल तक बातचीत चली। डील से पहले संसद की सुरक्षा समिति से भी इसकी मंजूरी ली गई थी।"

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान सरकार से 36 विमानों की कीमत और फैसला लेने की जानकारी मांगी थी। साथ ही याचिकाकर्ताओं के साथ भारतीय आॅफसेट पार्टनर चुनने से जुड़ी जानकारी भी साझा करने को कहा था।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि राफेल विमान की कीमत का मामला एक्सक्लूसिव है और कुछ दस्तावेज ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत आते हैं। उसके विवरण कोर्ट से साझा नहीं किए जा सकते। इसके बाद चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि अगर ऐसा है तो आप कोर्ट में हलफनामा दायर कर बताएं कि जानकारी साझा क्यों नहीं की जा सकती?

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