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गुजरात से ग्राउंड रिपोर्ट / वोटिंग में सिर्फ 5 दिन बाकी, लेकिन चुनावी गर्मी गायब

  • कांग्रेस के लिए: न्याय से बड़ा किसान कर्जमाफी फैक्टर
  • भाजपा के लिए: राज्य सरकार से नाराजगी, पर राष्ट्रीय मुद्दे हावी

देवेंद्र भटनागर

Apr 18, 2019, 08:51 AM IST

गुजरात. पिछले हफ्ते गुजरात की ग्राउंड रिपोर्ट में आपने पढ़ा था कि भाजपा राज्य की 7 सीटों पर फंसी हुई है। आईबी, ब्यूरोक्रेट्स और संघ की रिपोर्ट में भी कमोबेश यही सामने आया है। दरकती सीटों को बचाने के लिए अमित शाह और अब खुद मोदी ने मोर्चा संभाला है। आज की स्थिति में भाजपा 22 से 24 सीटों पर वापसी कर रही है। अभी भी चार सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस मजबूत है। फिर भी गर्मी के मौसम में वह चुनावी गर्मी गायब है, जिसके लिए गुजरात जाना-पहचाना जाता है। न शहरों में चुनावी तपिश है और न गांवों में प्रचार की धूल उड़ रही है। इस ठंडे माहौल का फायदा किसे मिलेगा?

ठंडे माहौल के दो सीन देखिए- दो दिन पहले मुख्यमंत्री विजय रूपाणी विसावदर में रैली करने पहुंचे, लेकिन कुर्सियां खाली देख, उलटे पैर लौट गए। दूसरी तरफ राहुल की महुआ रैली से भी भीड़ नदारद थी। और जब भीड़ गायब होती है तो सबसे पहले नेताओं के तेवर गायब होते हैं। वैसे, ये दोनों किस्से ग्रामीण क्षेत्रों के हैं, जहां अमूमन चुनावी माहौल में भीड़ जुट ही जाती है। शहरों की हालत भी ऐसी ही है।

खैर, राजनीति की कुंडली समझने वाले दावा कर रहे हैं कि ठंडे माहौल का फायदा भाजपा को मिल सकता है। इसके पीछे उनके तर्क भी हैं। कहते हैं-ज्यादा वोटिंग बदलाव के लिए होती है। चुनावी माहौल तभी जमता है जब या तो सत्ता के पक्ष में लहर हो या उसके खिलाफ गुस्सा। दोनों ही स्थिति अभी नहीं दिख रही। अपनी कमजोर सीटों को बचाने के लिए भाजपा आक्रामक होती जा रही है तो कांग्रेस उतनी ही मुद्दा विहीन नजर आ रही है।

गांवों में वोट स्विंग कराने में विफल रहा न्याय, राष्ट्रवाद लगने लगा जरूरी

गांवों में कांग्रेस के न्याय पर भाजपा का राष्ट्रवाद भारी है। 72 हजार रुपए का वादा वोटरों को कांग्रेस की तरफ स्विंग कराने में नाकाम नजर आ रहा है। विकास और राष्ट्रवाद भाजपा ने पेटेंट करा लिया है। दबे-छिपे हिंदुत्व मुद्दा है ही। गुजरात की राजनीति से हिंदुत्व गायब हो भी नहीं सकता। राजकोट में चाय दुकान पर बैठे जिगाभाई कहते हैं- भाजपा को जिताना मजबूरी है। जिगाभाई के साथ ही चाय पी रहे मोहन पटेल नोटबंदी-जीएसटी को याद करते हुए तपाक से कहते हैं- मोदीजी ने धंधा जरूर बिगाड़ा, लेकिन कांग्रेस जीती तो धंधा करना मुश्किल हो जाएगा। कारण पूछा तो कहने लगे- गुजराती जानते हैं कांग्रेस राज में एक समुदाय का कितना आतंक था। उनकी बातों से उन सवालों के जवाब मिल गए कि आखिर क्यों मोदी और भाजपा इनकी मजबूरी है। हालांकि बेरोजगारी और किसानों की समस्याएं ही ऐसे मुद्दे हैं जो भाजपा के मिशन 26 में स्पीड ब्रेकर बन सकते हैं।

भाजपा कमजोर सीटों पर चुनाव मोदी बनाम कांग्रेस करने में सफल

भाजपा के लिए अमरेली, जूनागढ़, पाटण, सुरेंद्रनगर, बनासकांठा, हिम्मतनगर, बारडोली जैसी सीटें चुनौती बन रही थीं। चुनौती मोदी नहीं, बल्कि सांसदों की निष्क्रियता थी। लेकिन भाजपा यहां चुनाव कांग्रेस बनाम मोदी करने में सफल हो रही है। जो सात सीटें फंसी थीं, उनमें से 3 को भाजपा ने कवर कर लिया है। अमरेली, जूनागढ़ और आणंद में अभी कांग्रेस आगे दिख रही है। उत्तर गुजरात में भाजपा चार सीटों पर कमजोर स्थिति में थी। यहां ठाकोर वोटर अच्छे खासे हैं। भाजपा ने ठाकोर नेता अल्पेश को कांग्रेस से तोड़ा। लेकिन भाजपा ज्वाॅइन नहीं कराई, क्योंकि पाटीदार नाराज हो जाते। इससे कांग्रेस को सीधा नुकसान है।

सुरेंद्रनगर में नाराज चल रहे फतेपरा को मना लिया है। छोटा उदेपुर, दाहोद, पंचमहाल, भरुच, खेड़ा, नवसारी, वलसाड़ सीटों को मैनेज करने में संघ जुट गया है। हालांकि अमरेली-जूनागढ़ में भाजपा चाहकर भी वापसी करती नहीं दिख रही। वजह है कांग्रेस के चेहरे। अमरेली में परेश धनाणी और जूनागढ़ में पुंजा वंश दोनों की पर्सनल छवि पार्टी पर भारी है। कांग्रेस को न चाहने वाले भी इन चेहरों पर दांव लगाने को तैयार दिख रहे हैं।

राज्य के काम से लोग संतुष्ट नहीं, लेकिन राष्ट्रीय मुद्दे इस नाराजगी पर भारी

लोग बातचीत में राज्य सरकार के काम से संतुष्ट नहीं दिखते। कहीं पानी की समस्या तो कहीं रोजगार और किसान के मुद्दे। कहीं भेदभाव की बातें तो कहीं स्थानीय नेताओं का घमंड। रुपाणी सरकार को लेकर जितनी नाराजगी है, उतना ही साॅफ्ट कार्नर नरेंद्र मोदी के प्रति है। सूरत के वराछा में भिंजा पटेल कहते हैं कि जो काम मोदी साहब ने किया, वो कोई नहीं कर सकता। मोदीजी के जाने के बाद गुजरात में जैसे भाजपा कमजोर हुई है, वैसे ही दिल्ली से मोदीजी के जाने पर देश कमजोर होगा। अल्पेश शाह डायमंड का काम करते हैं। जीएसटी उनके लिए मुद्दा नहीं है। वे कहते हैं महंगाई, जीएसटी घर के मुद्दे हैं। सुलझा लेंगे। लेकिन आतंकवाद और पाकिस्तान का इलाज जरूरी है। ये काम मोदी ही कर सकते हैं। वो कहते हैं- कश्मीर चाहिए तो मोदी को लाना होगा।

आखिरी बात-

राहुल गांधी में बदलाव को लोग स्वीकार रहे हैं। प्रियंका के राजनीति में आने का यहां कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा। हार्दिक के कांग्रेस ज्वाॅइन करने से कांग्रेस को फायदा होता नहीं दिखता। आपत्तिजनक बयानों को गुजरात गलत नहीं मानता। इनका कहना है-नेता नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा? और हां, अंतरिक्ष में जो कामयाबी भारत को मिली, उसके बारे में अधिकतर लोगों को कुछ पता ही नहीं है। भाजपा के पक्ष में सबसे बड़ा मुद्दा एयर स्ट्राइक है तो कांग्रेस के पक्ष में (न्याय नहीं) किसानों की कर्ज माफी। नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, माल्या के भागने की नाकामी के लिए लोग मोदी को नहीं यूपीए सरकार को जिम्मेदार मानते हैं। लोग कहते हैं-भागता वही है जिसे डर होता है। मोदी का डर था, इसलिए वो भागे। संकेत साफ हैं- मोदी आज भी गुजरात का मुद्दा हैं। शायद 22 साल से भाजपा के सत्ता में रहने की वजह भी मोदी ही हैं।

(लेखक दैनिक भास्कर गुजरात के स्टेट हेड हैं)

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