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राफेल डील/ जांच की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, केंद्र से कहा- कीमतें बताने की जरूरत नहीं

2012 में राफेल विमान खरीदने के लिए दैसो को चुना गया, लेकिन दैसो और एचएएल के बीच आपसी सहमति नहीं बन पाने से सौदा आगे नहीं बढ़ पाया।

  • प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई
  • राफेल डील में अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को ऑफसेट पार्टनर बनाने पर सवाल उठाए गए
  • केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट अौर याचिकाकर्ताओं को सोमवार को सौंपे थे राफेल सौदे के दस्तावेज

Dainik Bhaskar

Nov 14, 2018, 04:30 PM IST

नई दिल्ली.सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील की जांच के लिए दायर याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, अदालत ने केंद्र को राहत देते हुए कहा कि जब तक हम तय नहीं करते, तब तक सरकार को याचिकाकर्ताओं को राफेल की कीमतों के बारे में जानकारी देने की जरूरत नहीं है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सरकार से 2015 में ऑफसेट गाइडलाइन बदलने पर सवाल किया। सरकार ने कहा कि ऑफसेट कॉन्ट्रेक्ट मुख्य सौदे के साथ-साथ चलता है। एयर वाइस मार्शल चेलापति ने कहा कि वायुसेना को पांचवीं पीढ़ी के विमानों की जरूरत है, इसलिए राफेल का चयन किया गया।

 

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने अपनी दलील में कहा- राफेल डील में बदलाव किया गया, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते थे कि ऑफसेट कॉन्ट्रेक्ट अंबानी की कंपनी को दिया जाए। याचिकाकर्ता के वकील एमएल शर्मा ने कोर्ट से कहा कि सरकार की ओर से अदालत में पेश की गई रिपोर्ट से खुलासा होता है कि यह एक गंभीर घोटाला है। उन्होंने यह केस पांच जजों की बेंच के पास ट्रांसफर करने की अपील की।

 

राफेल की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट में बहस

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल : गोपनीयता एयरक्राफ्ट की कीमतों को लेकर नहीं है, बल्कि हथियारों और विमान तकनीक को लेकर है। सरकार ने विमान और हथियारों की कीमतें सुप्रीम कोर्ट से साझा की हैं। यह एक रक्षा खरीद है, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। ऐसे में अदालत इसकी समीक्षा नहीं कर सकती। इसके खुलासे में सरकारों के बीच हुए समझौते जैसी बाधाएं हैं।

 

प्रशांत भूषण : सरकार की दलील है कि राफेल की कीमत सार्वजनिक होने से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है। सरकार संसद में दो मौकों पर खुद इसकी कीमत बता चुकी है। ऐसे में यह कहना कि कीमत बताने से गोपनीयता की शर्तों का उल्लंघन होगा, गलत दलील है। नई डील में राफेल की कीमत पहले से 40% ज्यादा है। इस मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए।

 

अरुण शौरी : नई डील में राफेल की औसत कीमत 1,660 करोड़ है और पहले के सौदे की औसत कीमत करीब 670 करोड़ थी। आप इसे कैसे जस्टिफाई कर सकते हैं?  

 

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई : राफेल की कीमत पर कोई बहस तभी होगी जब यह अदालत तय करेगी कि ये चीजें सार्वजनिक करने की जरूरत है। 

 

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल : अगर मूल्य निर्धारण समेत राफेल सौदे की जानकारी सार्वजनिक की जाती है तो इससे हमारे प्रतिद्वंद्वियों को फायदा होगा। 

 

रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर बनाने पर दलीलें

 

सुप्रीम कोर्ट : 2015 में ऑफसेट गाइडलाइन क्यों बदली गईं, देश के हित के बारे में क्या सोचा, अगर ऑफसेट पार्टनर कोई प्रोडक्शन नहीं करता है, तो क्या करेंगे?

 

रक्षा मंत्रालय: रक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ने कहा- ऑफसेट कॉन्ट्रेक्ट मुख्य सौदे के साथ-साथ चलता है।

 

केंद्र सरकार : अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा- दैसो ने अभी तक ऑफसेट पार्टनर के बारे में सरकार के सामने जानकारियां नहीं प्रस्तुत की हैं।

 

प्रशांत भूषण : यह दैसो के साथ मिलकर की गई साजिश है, जिसमें रिलायंस को ऑफसेट पार्टनर का अधिकार दिया गया। रिलायंस के पास ऑफसेट कंपनी के तौर पर काम करने की क्षमता नहीं है। प्रधानमंत्री के द्वारा की गई डील में हुए कथित बदलावों के बारे में किसी को नहीं पता। यहां तक की रक्षा मंत्री को भी इस बदलाव की जानकारी नहीं थी। एक झटके में विमान 108 से 36 हो गए और ऑफसेट रिलायंस को दे दिया गया। सरकार कह रही है कि उसे ऑफसेट पार्टनर का पता नहीं। लेकिन प्रोसेस में साफ है कि बिना रक्षा मंत्री की अनुमति के ऑफसेट तय नहीं हो सकता है। ऑफसेट बदलने के लिए सरकार ने नियमों को बदला और तुरंत उसे लागू किया।
    
अरुण शौरी : उस समय रक्षा मंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने घोषणा की थी कि राफेल सौदा प्रधानमंत्री मोदी का निर्णय है और मैं इसका समर्थन करता हूं। यह दिखाता है कि रक्षा मंत्रालय लूप में नहीं था। सवाल यह है कि कैसे शून्य अनुभव वाली एक कंपनी को पहले शामिल किया जा सकता है और इस तरह के एक बड़े सौदे की ऑफसेट दी जा सकती है।

 

प्रशांत भूषण : राफेल डील में ऑफसेट पार्टनर के रूप में रिलायंस का चुनाव एक कमीशन है। यह मेरा आरोप है और मैंने इसे प्रमाणित करने के लिए दस्तावेज जमा कर दिए हैं। सरकार कह रही है कि ऑफसेट पार्टनर चुनने में सरकार की कोई भूमिका नहीं है जबकि नियम के मुताबिक ऑफसेट पार्टनर के एग्रीमेंट के लिए रक्षा मंत्री के दस्तखत की जरूरत होती है। यह अपने आप मे विरोधाभासी है।

 

 

 

तीन जजों की बेंच कर रही सुनवाई

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सरकार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट और याचिकाकर्ताओं को 36 राफेल विमानों की खरीद के संबंध में किए गए फैसले के ब्योरे वाले दस्तावेज सौंपे थे। राफेल की कीमत को लेकर एक अलग सीलबंद दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट को सौंपा गया था।

 

राफेल सौदे के लिए एक साल में हुई थीं 74 बैठकें

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिए दस्तावेज में बताया कि राफेल विमान खरीदने का फैसला सालभर में 74 बैठकों के बाद किया गया। 126 राफेल खरीदने के लिए जनवरी 2012 में ही फ्रांस की दैसो एविएशन को चुन लिया गया था। लेकिन, दैसो और एचएएल के बीच आपसी सहमति नहीं बन पाने से ये सौदा आगे नहीं बढ़ पाया। सरकार ने कहा कि एचएएल को राफेल बनाने के लिए दैसो से 2.7 गुना ज्यादा वक्त चाहिए था।

सरकार का कहना है कि एचएएल को राफेल बनाने के लिए दैसो से 2.7 गुना ज्यादा वक्त चाहिए था।
याचिकाकर्ताओं ने राफेल मामले की सुनवाई पांच जजों की बेंच के पास ट्रांसफर करने की अपील की।
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