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ग्राउंड रिपोर्ट / राजस्थान: प्रचार में मोदी आगे, कांग्रेस में गहलोत ही चेहरा

  • जिन पर नजर: किरोड़ी बैंसला और वसुंधरा के विराेधी हनुमान बेनीवाल अब भाजपा के साथ
  • सीएम गहलोत और डिप्टी सीएम पायलट के बीच तनाव की चर्चा, दोनों इसे अफवाह बताते हैं

Dainik Bhaskar

Apr 16, 2019, 10:28 AM IST

राजस्थान हर चुनाव में राजनीति के नए मुहावरे गढ़ता है और पुराने तोड़ भी देता है। इस बार का मुहावरा क्या होगा? यही जानने मैंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को फोन लगाया। उनकी डायलर टोन ने चौंका दिया- जय हनुमान ज्ञान गुन सागर...। एक-दो चौपाई के बाद उन्होंने फोन उठा लिया। क्या बात हुई, ये आगे बताऊंगा लेकिन सचिन का हनुमान चालीसा डायलर टोन लगाना मुझे रोचक लगा। भाजपा के चुनावी ट्रंप कार्ड भगवान राम के जवाब में क्या सचिन हनुमान चालीसा से सियासी संतुलन साध रहे हैं? क्या हनुमान कांग्रेस के संकट मोचक हैं? क्या भाजपा के राष्ट्रवाद का ये कांग्रेसी जवाब है? दरअसल, सियासत में कुछ भी, कभी भी स्थायी नहीं होता। एक ही स्थायी सच है- अापकी राजनीति से संदेश क्या जा रहा है।


29 अप्रैल को राजस्थान में 13 सीटों के लिए चुनाव होगा। इनमें सबसे रोचक, संघर्षपूर्ण सीटें हैं- जोधपुर, नागौर और बारां-झालावाड़। जोधपुर सीट पर सबकी निगाहें हैं। यहां के कांग्रेस उम्मीदवार वैभव गहलोत राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे हैं। उनका पहला चुनाव है। चुनाव वैभव का है, पर असल इम्तिहान गहलोत की जादूगरी का है। वैभव के सामने भाजपा के गजेंद्र सिंह शेखावत हैं जो मोदी सरकार में कृषि राज्यमंत्री रहे हैं। वे युवाओं में खासे लोकप्रिय हैं। उनके पक्ष में 22 अप्रैल को मोदी रैली करेंगे। रिटायर्ड सैनिक दयाराम कहते हैं कि हमारा वोट मोदी के लिए है। सरदारपुरा के नरेश सांखला बोले- यह सीट गहलोत का गढ़ रही है और इस बार भी रहेगी। गहलोत जोधपुर से पांच बार सांसद रह चुके हैं।


एक पूर्व और एक मौजूदा मुख्यमंत्री के पुत्रों पर नजर
दूसरी महत्वपूर्ण सीट है बारां-झालावाड़। यहां वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह मैदान में हैं। इनके सामने कांग्रेस के प्रमोद शर्मा हैं, जो भाजपा के यूथ ब्रिगेड से जुड़े रहे हैं। यहां दुष्यंत के सामने बड़ी चुनौती नहीं है। यहां से पांच बार वसुंधरा सांसद रही हैं। दुष्यंत तीन बार से सांसद हैं। दोनों ने लगातार आठ चुनाव जीते हैं। साफ है कि इस क्षेत्र में वसुंधरा की कितनी जबरदस्त पकड़ है। यह सिलसिला क्या इस बार भी जारी रहेगा?


जोधपुर और बारां-झालावाड़ सीटें कई मायनों में एक जैसी हैं लेकिन नतीजों की दृष्टि से काफी अंतर है। समानता ये कि यहां मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे चुनावी मैदान में हैं। दोनों के लिए चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल है। सीएम गहलोत सभाओं में कह रहे हैं कि उनका बेटा नहीं, कांग्रेस का एक कार्यकर्ता मैदान में है। उनकी भावनात्मक अपील ही वैभव की जीत का आधार बन सकती है।


अब नागौर की बात। यहां मुकाबला दिलचस्प हो गया है। भाजपा ने अपने ही मंत्री सीआर चौधरी का टिकट काटकर हनुमान बेनीवाल को जोड़ा है और सीट उन्हें दे दी है। बता दें कि बेनीवाल का वसुंधरा से हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है इसके बावजूद आलाकमान ने यह कदम उठाया। यहां कांग्रेस से दिग्गज जाट नेता नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा मैदान में हैं। बेनीवाल- भाजपा की मिलीजुली ताकत से ज्योति के लिए मुकाबला अब आसान नहीं है।


राजस्थान में वोट प्रतिशत जीत-हार का बड़ा फैक्टर है। अगर शहरी क्षेत्र का वोटिंग प्रतिशत 45 से कम रहा तो कांग्रेस को फायदा होगा। अगर 60% से ज्यादा हुआ तो भाजपा आगे होगी। यह जमीनी आकलन है जो पिछले चुनावों में बाकायदा सही रहा है। ग्रामीण क्षेत्राें में जाति पहला फैक्टर है। 29 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग की महत्वपूर्ण सीट टोंक-सवाईमाधोपुर में कांग्रेस उम्मीदवार नमोनारायण जीत के लिए महज इसलिए आश्वस्त हैं कि उनकी जाति के क्षेत्र में वोटर सबसे ज्यादा हैं। ऐसा ही भरोसा भाजपा के सुखबीर सिंह जौनपुरिया को भी है।


चर्चा: पायलट-गहलोत में तनाव, बताया अफवाह
चर्चा हैै कि सीएम गहलोत और डिप्टी सीएम पायलट के बीच तनाव है। दोनों इसे अफवाह बताते हैं। पायलट कहते हैं- विवाद मोदी कैंप की फैलाई अफवाह है। मैं तो खुद वैभव के पार्टी कार्यालय का फीता काटने जोधपुर गया था। चर्चा है कि वैभव को टिकट दिलाने में भी सचिन सक्रिय रहे। वहीं गहलाेत भी कहते हैं कि हमारा टकराव सिर्फ भाजपा से है। दोनों नेता “आॅल इज वेल’ का संदेश लगातार दे रहे हैं।


उधर, नागौर सीट बेनीवाल को देने से वसुंधरा खफा हैं। बेनीवाल के भाजपा में शामिल होने की घोषणा करने आए प्रकाश जावड़ेकर की प्रेस वार्ता में वसुंधरा नदारद थीं। इधर राजस्थान का ब्राह्मण चेहरा घनश्याम तिवाड़ी अब कांग्रेसी हो गए हैं। जबकि गुर्जर आंदोलन के सर्वेसर्वा रहे कर्नल किरोड़ी बैंसला के भाजपा में शामिल होने के भी राजनीतिक मायने हैं। देखना होगा- किसका आना और जाना चुनाव में कितना फायदा करता है।


जिन 13 सीटों पर 29 को चुनाव हैं। वहां अभी कहीं भी चुनाव का माहौल नहीं है। शायद बढ़ती गर्मी जमीन पर सियासत को ठंडा कर रही है। जहां तक प्रचार का सवाल है, मोदी परंपरागत अंदाज में आगे हैं। प्रदेश में सरकार में होने के बाद भी कांग्रेस का प्रभावी प्रचार नहीं दिखता है। बीजेपी का आक्रामक प्रचार बता रहा है कि यहां मोदी ही चुनाव लड़ रहे हैं, भाजपा के घोषित उम्मीदवार नहीं। कांग्रेस में केंद्रीय नेतृत्व से ज्यादा गहलोत का चेहरा दिखाई देता है।


प्रचार तंत्र की मुस्तैदी वोटों में कैसे बदलेगी यह तो 23 मई को पता चलेगा। जाहिर है कांग्रेस पर अपनी सरकार होने के नाते ज्यादा सीटें जीतने का दबाव है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पुराने जादूगर हैं। देखना होगा कि अपनी सियासी टोपी से वो कैसे छूमंतर बोलकर जीत का खरगोश निकालते हैं?

(लेखक दैनिक भास्कर राजस्थान के स्टेट एडिटर हैं)

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