सबरीमाला / सुप्रीम कोर्ट ने केस 7 जजों की बेंच को भेजा, महिलाओं के प्रवेश की अनुमति का फैसला बरकरार रहेगा

  • चीफ जस्टिस,जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस एएम खानविलकर ने केस बड़ी बेंच को भेजने का फैसला दिया
  • चीफ जस्टिस ने कहा-महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर लगा प्रतिबंध सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं, दूसरे धर्मों में भी प्रचलित
  • 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं कोप्रवेश करने की अनुमतिदी थी

Dainik Bhaskar

Nov 14, 2019, 11:30 AM IST

नई दिल्ली. सबरीमाला केस में पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केस सात जजों की बेंच के पास भेज दिया है। बेंच ने यह फैसला 3:2 से किया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अंतिम फैसले तक उसका पिछला आदेश बरकरार रहेगा। अदालत ने 28 सितंबर 2018 को 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी दी थी। फैसले पर 56 पुनर्विचार समेत 65 याचिकाएं दायर की गई थीं।इन पर 6 फरवरी को अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

पुनर्विचार याचिकाएंचीफ जस्टिसरंजन गोगोई की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच में दायर की गई थीं। चीफ जस्टिस,जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस एएम खानविलकर ने केस बड़ी बेंच को भेजने का फैसला दिया। जस्टिस फली नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ फैसला दिया।

‘याचिका दायर करने वाले का मकसद धर्म और आस्था पर वाद-विवाद शुरू कराना’

पुनर्विचार याचिकाओं पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा- यह याचिका दायर करने वाले का मकसद धर्म और आस्था पर वाद-विवाद शुरू कराना है। महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर लगा प्रतिबंध सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं, यह दूसरे धर्मों में भी प्रचलित है। सुप्रीम कोर्ट को सबरीमाला जैसे धार्मिक स्थलों के लिए एक सार्वजनिक नीति बनानी चाहिए।सबरीमाला, मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश और फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन से जुड़े धार्मिक मुद्दों पर बड़ी बेंच फैसला करेगी।

बेंच की इकलौती महिला जज ने कहा था- धार्मिक मुद्दों को नहीं छेड़ना चाहिए

  • सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिलाओं के प्रवेश को मंजूरी देते हुएकहा था-दशकों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा गैरकानूनी और असंवैधानिक थी।
  • जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था- धर्मनिरपेक्षता का माहौल कायम रखने के लिए कोर्ट को धार्मिक अर्थों से जुड़े मुद्दों को नहीं छेड़ना चाहिए।
  • जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था- शारीरिक वजहों से मंदिर आने से रोकना रिवाज का जरूरी हिस्सा नहीं। ये पुरूष प्रधान सोच दर्शाता है।
  • जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था- महिला को माहवारी के आधार पर प्रतिबंधित करना असंवैधानिक है।यह मानवता के खिलाफ है।

1990 में मामला सामने आया

  • 29 साल पहले 1990 में मंदिर परिसर में 10-50 साल के बीच कीउम्र की महिलाओं के प्रवेश का मामला सामने आया। इन्हें रोकने के लिए केरल हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई।कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक की सदियों पुरानी परंपरा को सही ठहराया।
  • 2006 में इस रोक को चुनौती मिली। तभी से सबरीमाला बार-बार सुर्खियों में आने लगा।
  • 2006 में कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने दावाकि उन्होंने 1987 में भगवान अय्यप्पा के दर्शन किए। मंदिर प्रमुख ने कहा था कि भगवान नाराज हैं, क्योंकि मंदिर में युवा महिला आई थी।
  • 2007 में केरल की लेफ्ट कीसरकार ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर यंग लॉयर एसोसिएशनकी याचिका के समर्थन में हलफनामा दाखिल किया।
  • फरवरी 2016 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार आई तो महिलाओं को प्रवेश देने की मांग से पलट गई। कहा कि परंपरा की रक्षा होनी चाहिए।
  • 2017 मेंसुप्रीम कोर्ट ने मामला संविधान पीठ को सौंप दिया। 28 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी। केरल के राजपरिवार और मंदिर के मुख्य पुजारियों समेत कई हिंदू संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
  • सबरीमाला कार्यसमिति ने आरोप लगाया था कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति देकर उनके रीति-रिवाज और परंपराओं को नष्ट किया।
  • मान्यता है कि 12वीं सदी के भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। जिसकी वजह से मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित किया गया।

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