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पैदा होते ही डर गई थी मां, 6 दिनों तक नहीं पिलाया दूध, आज है घर का सहारा

7 वर्ष पहले
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मनोहरपुर. पश्चिमी सिंहभूम जिले के बारंगा गांव निवासी गुलशन लोहार दोनों हाथों से लाचार हैं। लाचारी ऐसी कि खाना-पीना, पढ़ाई-लिखाई आदि सारे काम पैरों से करना मजबूरी है।
कभी घरवालों के सहारे जिंदगी थी, लेकिन, हिम्मत न हारी। शारीरिक दुर्बलता को हावी होने न दिया। मेहनत की। एमए और बीएड की पढ़ाई की। आज वे घर का सहारा बने हुए हैं। बारंगा में ही सेल संचालित स्कूल में शिक्षक हैं। वहां बच्चों को पढ़ा रहे हैं।
सात भाइयों में सबसे छोटे गुलशन का जन्म 10 अगस्त 1987 को हुआ था। पैदा हुए तो दोनों हाथ नहीं थे। बच्चे की हालत देख मां रविवारी देवी डर गईं। अंधविश्वास के कारण छह दिनों तक दूर रखा। दूध तक नहीं पिलाया। घरवालों के कहने पर उन्हें मां का प्यार मिला। पिता सुधीर लोहार (स्वर्गीय) पुश्तैनी पेशे से जुड़े थे। कमाई इतनी नहीं थी कि बच्चों को ऊंची शिक्षा दे सकें। लिहाजा, बचपन गरीबी और अभाव में गुजरा। उनके छह भाई मजदूरी करते हैं, लेकिन गुलशन ने पढ़ाई जारी रखी। अब वे परिवार का उम्मीद बनकर उभरे हैं।
अब बहू लाने की तैयारी
शिक्षक बनने के बाद गुलशन की मां ने भविष्य का सपना संजो रखा है। वे उत्साहित हैं। कहती हैं कि बेटे के लिए ऐसी बहू लाऊंगी, जो उसकी बखूबी देखभाल कर सके। भाई और भाभियों को भी गुलशन से काफी उम्मीदें हैं।
एक साल के थे, तबसे पैरों से खाते हैं खाना
मां रविवारी देवी के अनुसार, बचपन से ही गुलशन ने अपनी शारीरिक दुर्बलता को हावी होने नहीं दिया। वे सालभर के थे, तबसे ही दोनों पैरों के जरिए खाना-पीना शुरू कर दिया था। थोड़े बड़े हुए तो मां ने पैरों में पेंसिल व चॉक पकड़ा दिया। पैरों के सहारे ही उसने चॉक से गोल-गोल लकीर खींचनी शुरू कर दी थी।
सेल की ओर से संचालित स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिली है। लेकिन, यह मंजिल नहीं है। मैं एमएड की पढ़ाई करना चाहता हूं। ऊंचा मुकाम बनाने की कोशिश में हूं।
गुलशन लोहार
जन्म से ही मेरा बेटे के दोनों हाथ नहीं थे। वह अन्य बच्चों से अलग था। मुझे उसकी भविष्य की चिंता थी कि मेरे बाद क्या होगा? उसकी आगे की जिंदगी कैसे कटेगी? मैंने उसके पैरों में पेंसिल और कलम थमा कर उसे इस लायक बनाया, ताकि वह आत्मनिर्भर हो सके।
रविवारी देवी, गुलशन की मां
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