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कुरमी को ST का दर्जा तभी, जब TRI अनुशंसा करे, लेकिन रिसर्च वाला ही कोई नहीं है

4 वर्ष पहले
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रांची.    कुरमी जाति को एसटी में शामिल करने की मांग लगातार उठ रही है। यह तभी संभव है, जब ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआरआई) इसकी अनुशंसा करे। लेकिन टीआरआई तो खुद पंगु है। यहां न कोई शोध अफसर है और न सहायक कर्मचारी। एक डायरेक्टर और एक शोध अन्वेषक के भरोसे यह चल रहा है। ऐसे में फिलहाल यहां रिसर्च हो ही नहीं सकता। क्योंकि केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार रिसर्च के लिए स्थल पर जाकर ग्राउंड रियलिटी की जांच जरूरी है।


टीआरआई में डिप्टी डायरेक्ट के तीन, असिस्टेंट डायरेक्टर के छह, रिसर्च अफसर के छह, शोध अन्वेषक के छह, प्रयोगशाला सहायक के चार, लाइब्रेरियन का एक और संगणक का एक पद है। इनमें से सिर्फ एक शोध अन्वेषक कार्यरत हैं। भूजेंद्र बास्की डायरेक्टर हैं। वह भी स्थाई नहीं, बल्कि अतिरिक्त प्रभार में हैं। इस संस्थान का उद्देश्य जनजाति और अन्य जातियों के बीच विकास की खाई कम करना है। इसके लिए टीआरआई को रिसर्च कर समय-समय पर सरकार को अपना सुझाव देना है।

 

2004 में टीआरआई ने की थी अनुशंसा-कुरमी/कुड़मी को यथास्थिति में रखा जाए

 

टीआरआई  2004 में राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें कहा था कि झारखंड में कुरमी/कुड़मी जाति को यथास्थिति में बनाए रखने की जरूरत है। झारखंड में रहने वाले कुरमी, कुड़मी और महतो जाति की उत्पत्ति आर्य एवं द्रविड़ समूह के सम्मिश्रण से हुई, जो मध्य भारत के कुनबी जाति की उपजाति के रूप में झारखंड में रहती है। उनका गोत्र कुड़ियार, संखुआर, कानविंधा, सिंकुआर, मुतरुआर आदि है। वे अपने गोत्र या गोत्र चिह्न के आगे अर ध्वनि का प्रयोग करते हैं। जबकि अनुसूचित जनजातियों जैसे टुडू, सोरेन, लकड़ा, तिर्की, टोप्पो, होरो, बोदरा आदि के गोत्र एवं गोत्र चिह्नों में उस तरह की अर ध्वनि की कोई प्रधानता नहीं है। छोटानागपुर की कुरमी, कुड़मी जाति को 1931 में एबोर्जिनल ट्राइब्स की सूची में रखा गया था, परंतु 1950 में जारी अधिसूचना में एसटी सूची में कुरमी, महतो का नाम नहीं है।

 

विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष बोले-सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही मिल सकेगा एसटी का दर्जा

 

विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष सह भाजपा विधायक राजकिशोर महतो ने कहा कि कुरमी को एसटी सूची में शामिल कराने के दो ही रास्ते हैं। पहला प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंप कर टीआरआई से पुन: रिसर्च कराने का अनुरोध करना और दूसरा सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल करना। मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपने और राज्य सरकार की अनुशंसा से अब कुछ होने वाला नहीं है। वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने केंद्र को प्रस्ताव भेजा था। 31 जुलाई 2015 को केंद्र ने इसे खारिज कर दिया। झारखंड गठन के बाद 2001 में मनोहरपुर में कुरमी जाति की रैली हुई, जिसमें इसे पुन: एसटी की सूची में शामिल करने की मांग की गई। 2004 में अर्जुन मुंडा ने केंद्र को अनुशंसा भेज दी। लेकिन केंद्र ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया।

 

पूर्व डायरेक्टर ने समझाया- क्या है प्रक्रिया

 

टीआरआई के लंबे समय तक डायरेक्टर रहे डॉ. प्रकाश उरांव ने कहा कि कुरमी को एसटी में शामिल करने के लिए जरूरी है कि टीआरआई अनुशंसा करे। राज्य सरकार टीआरआई को फिर से रिसर्च के लिए कह सकती है। टीआरआई अनुशंसा करता है तो उसे राज्य सरकार केंद्रीय कल्याण मंत्रालय को भेजेगी। वहां से वह एसटी अायोग और महानिबंधक  को भेजा जाएगा। दोनों बात करेंगे। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव होगा तो कल्याण विभाग के माध्यम से कैबिनेट जाएगा और वहां से वह संसद भेजा जाएगा।

 

क्या कहते हैं भाजपा विधायक

 

यह संवैधानिक विषय है : गंगोत्री कुजूर 

विधायक गंगोत्री कुजूर का कहना है कि कुरमी को आदिवासी का दर्जा दिये जाने की मांग काफी पुरानी है। यह संवैधानिक विषय भी है। मांग पर नियमानुकूल निर्णय लिया जाना चाहिए।

 

राज्य सरकार अनुशंसा करे : विमला प्रधान 

विधायक विमला प्रधान ने कहा कि कुरमी जाति की राज्य में अच्छी संख्या है। पहले भी सरकार ने अनुशंसा की थी। लेकिन दिल्ली में इस पर निर्णय नहीं हो सका। सरकार को फिर अनुशंसा करनी चाहिए। 

 

जरूरत पड़ी तो राज्य सरकार मदद करेगी : लक्ष्मण टुडू

विधायक लक्ष्मण टुडू ने कहा कि हर समाज अपनी उन्नति के बारे में सोचता है। लोकतंत्र में सबको अपनी मांग करने का हक है। पहले भी सरकार ने अनुशंसा की थी। सरकारी प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया के तहत कुरमी समाज को भी एसटी का दर्जा मिलता है तो अच्छी बात है। जरूरत होगी तो सरकार मदद करेगी।

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