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मप्र और महाराष्ट्र के बीच एनओसी के इंतजार में अटका रोप-वे

4 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता| बुरहानपुर

मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के पहाड़ी जंगल के बीच अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए इच्छादेवी मंदिर का रोप-वे का काम अटका हुआ है। पर्यावरण मंत्रालय ने मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सरकार से रोप-वे के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगा था। चार साल बीत गए हैं अब तक दोनों राज्यों ने एनओसी नहीं दिया है।

मध्यप्रदेश के छोर पर बसे इच्छापुर की पहाड़ी पर इच्छादेवी मंदिर हैं। यहां से दो किलो मीटर दूरी पर महाराष्ट्र राज्य की सीमा शुरू होती है। बुरहानपुर मुख्यालय से इच्छापुर 27 किलो मीटर दूर बसा है। वर्ष 2011-12 में इच्छादेवी मंदिर के लिए रोप-वे की स्वीकृति मिली थी। राज्य शासन ने रोप-वे के लिए 4 करोड़ रुपए आवंटित भी कर दिए थे। टेंडर में कलकत्ता की दामोदर रोप-वे कंपनी को इसका ठेका दिया था। कंपनी के तकनीकी अफसर इच्छादेवी मंदिर का सर्वे कर गए। उन्होंने प्रति दिन पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की जानकारी जुटाई। कंपनी से राज्य शासन का 20 साल तक के लिए करार होना था। तकनीकी स्वीकृत के बाद पर्यावरण विभाग को प्रस्ताव भेजा गया। जांच में पाया कि यहां जंगल की भूमि भी शामिल है। पर्यावरण विभाग ने दोनों राज्यों से एनओसी मांगी। अब तक दोनों राज्यों से विभाग को एनओसी नहीं पहुंची है।

मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों के मुताबिक ट्रस्ट द्वारा रोप-वे निर्माण के लिए एक लाख 20 हजार रुपए अनुदान दिया था। बावजूद इसके काम शुरू नहीं हो पाया। दो बार इसके ठेकेदार बदल चुके हैं। शिलान्यास का सिर्फ पत्थर लगा दिया है लेकिन काम अब तक शुरू नहीं कराया। इस संबंध में ट्रस्ट द्वारा बार-बार रिमाइंडर भी भेजा जा चुका है।

दो बार बदल गए ठेकेदार
150 फीट ऊंचाई की राह दुर्गम, चारों ओर घना जंगल
मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर इच्छापुर गांव बसा हुआ हैं। यहां से इंदौर तक इंदौर-इच्छापुर दो लेन हाईवे बना हुआ है। हजारों वाहन रोड इच्छापुर से गुजरते हंै। इसलिए भी इच्छादेवी मंदिर की पहचान बनी है। करीब 500 साल से इच्छादेवी का मंदिर पहाड़ों में बसा हुआ है। जमीन से 150 फीट ऊंचाई पर इच्छादेवी का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के चारों ओर घना जंगल है।

मैहर देवी के लिए बना है इस तरह का रास्ता
सतना मैहर देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए भी रोप-वे बना है। तीन साल पहले यहां प्रति व्यक्ति 50 रुपए किराया लगता था। छह महीने पहले यहां 100 रुपए किराया हुआ है। यहां हर रोज सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन को पहुंचते है। जबकि इच्छादेवी मंदिर पर हर रोज मुश्किल से 100 भक्त आते हंै। ऐसे में कंपनी को रोप-वे का मेंटनेंस महंगा पड़ जाता है।

पर्यावरण एनओसी के लिए काम अटका
वर्तमान महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस उस समय शिक्षा मंत्री थी। उन्हीं के प्रयास से इच्छादेवी मंदिर पर रोप-वे की योजना बनी थी। इच्छादेवी मंदिर ट्रस्ट सचिव महेश पातोंडेकर के मुताबिक चार साल पहले योजना बनी थी। मंदिर ट्रस्ट ने सालभर पहले कंपनी के अफसरों से चर्चा की थी। उनका कहना था पर्यावरण एनओसी के लिए काम अटका है।

नवरात्रि पर दो राज्यों से आते हैं लाखों भक्त
शारदीय और चैत्र नवरात्रि में दोनों राज्यों से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर पहुंचने के लिए सामने से प्रवेश द्वार है और पीछे से निकासी का रास्ता बनाया है। दोनों ओर श्रद्धालुओं को सीढ़ियों से चढ़ना और उतरना पड़ता है। संकरा रास्ता होने से भीड़ अधिक हो जाती है। इससे महिला और पुरुष श्रद्धालुओं के पार्टीशन किया है। भीड़ में बुजुर्ग और बच्चों की हालत खराब हो जाती है।

450 साल पहले मराठा सूबेदार ने बनाया था मंदिर
एक मराठा सूबेदार ने इच्छादेवी से पुत्र प्राप्ति की कामना की थी। माता की कृपा से सूबेदार की मनोकामना पूरी भी हुई थी। उसी ने 450 साल पहले पहाड़ी पर मंदिर बनवाया था। अब मंदिर का एक ट्रस्ट बन चुका है। ट्रस्ट मंदिर की व्यवस्था संभालता है। पयर्टन विभाग के पास संरक्षण का जिम्मा है। मंदिर के पास पर्यटन विभाग ने शीला लेख बनाया है। उसी पर श्रद्धालुओं को मंदिर का इतिहास पता चलता है।

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