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शहीदों को अनूठी श्रद्धांजलि: देश के लिए मर मिटने वाले सेनानियों के नाम लगाए 700 पेड़, कहलाया क्रांतिवन

महाराष्ट्र के सांगली जिले के इस वन में मंगल पांडे, चंद्रशेखर आजाद और बिरसा मुंडे जैसे शहीदों के नाम से 700 पेड़ हैं।

Dainikbhaskar.com | Aug 09, 2018, 06:49 PM IST

लाइफस्टाइल डेस्क. साधारण सी कद काठी वाले संपतराव पेशे से एक किसान हैं। उम्र 77 साल है। संपत राव ने देश पर मर मिटने वाले शहीदों के नाम एक-एक पेड़ लगातार उन्हें अनूठी श्रद्धांजलि दी है। महाराष्ट्र के सांगली जिले के इस वन में मंगल पांडे, चंद्रशेखर आजाद और बिरसा मुंडे जैसे शहीदों के नाम से 700 पेड़ हैं और इस जगह को क्रांतिवन नाम दिया गया है। इसे शहीदों का जीवित स्मारक भी कहा जाता है। इस विरासत को आगे बढ़ाने के साथ संपतराव का लक्ष्य नई पीढ़ी को ऐसी महान शख्सियतों से रूबरू कराना भी है। जानते हैं इसकी शुरुआत कैसे और क्यों हुई

6 प्वाइंट्स : वन से क्रांतिवन तक का सफर 

1- संपतराव के मुताबिक क्रांतिवन शहीदों का जीवित मेमोरियल है क्योंकि वे कभी मरते नहीं है। कई सालों पहले इसकी शुरुआत हुई थी। उस दौरान यहां के ग्रामीणों ने कहा था ये सब व्यर्थ है क्यों समय बर्बाद कर रहे हो। क्रांतिवन का सपना पूरा करना आसान नहीं था क्योंकि यहां निर्माण के दौरान मैंने अपना बेटा खोया था और पूरी मैं पूरी तरह टूट गया था। 

2- संपत 9 अगस्त 1942 को शुरु हुए भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए थे। जब इस आंदोलन के 50 साल पूरे हुए तो 1992 में क्रांतिवन का निर्माण करने का विचार आया। उस दिन से ही इसकी शुरुआत की। इस दौरान लोगों का सहयोग नहीं मिला। 1998 में छात्र-छात्राओं से इस वन को विकसित करने की अपील की। उन्होंने साथ भी दिया।

3- क्रांतिवन का सपना पूरा करने में संपत को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसकी शुरुआत में ही जिला प्रशासन क्रांतिवन को ये बताते हुए बनाने की परमिशन नहीं दी थी कि यह सरकारी जमीन है। यहां किसी तरह का विकास नहीं किया जा सकता है। संपत प्रशासन से लगातार गुजारिश करते रहे। लेकिन नतीजा सिफर रहा। 1998 में वन विभाग ने जमीन को अपने आधिपत्य में ले लिया। उस दौरान सारे पेड़ काट दिए गए थे। 

4- लगातार निराशा के बाद संपत ने हार नहीं मानी अपने 4 एकड़ में फैली गन्ने की फसल को काटकर पेड़ लगाने शुरू किए। इनके इस कदम से परिवार और समाज के लोग आश्चर्यचकित थे क्योंकि गन्ने की खेती ही घर चलाने का एकमात्र साधन थी। इस जमीन की कीमत लाखों में थी। घरवालों ने किनारा कर लिया और इस काम में सिर्फ 21 साल के बेटे वैभव ने मदद की। 

5- पेड़ लगाने की शुरुआत हुई। एक दिन गड‌्ढा खोदने के दौरान आरी लगने से बेटा घायल हो गया और मौत हो गई। बेटे की मौत के बाद भी संपत मिशन पर डटे रहे। संपत का कहना है बिल्डिंग या मेमोरियल पर जनता के पैसे खर्च करना समझदारी नहीं है। शहीदों को वास्तव में सम्मान देना है तो उनके नाम से पेड़ लगाएं यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। मैं चाहता हूं इसे लोग समझें, आगे आएं और इसे पूरा करें।

6- इनके प्रयास नतीजा है कि यहां अब 1475 पेड़ हैं। आने वाली जनरेशन को देश पर जान न्योछावर करने वालों की कुर्बानी से रूबरू कराने के लिए ओपन ऑडिटोरियम और प्लेटफॉर्म बनाया गया है ताकि वे स्वतंत्रता के संघर्ष को समझ सकें। 

 

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