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ये हैं देश की पहली महिला फायर फाइटर, कभी 3 महीने अकेली रहीं थी जेंट्स हॉस्टल में

4 मई को 'वर्ल्ड फायर फाइटर्स' डे मनाया जाता है।

DainikBhaskar.com | May 03, 2018, 08:17 PM IST

नागपुर. 4 मई को 'इंटरनेशनल फायर फाइटर्स' डे मनाया जाता है। इस मौके पर हम आपको उस महिला से मिलाने जा रहे हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि जेंडर के आधार पर कोई काम निर्धारित नहीं होता। यहां बात हो रही है भारत की पहली वुमन फायर फाइटर हर्षिनी कान्हेकर की। जिनके लिए आग से खेलना बच्चों का खेल है। वर्तमान में हर्षिणी ओएनजीसी की फायर सर्विसेज की डिप्टी मैनेजर हैं। आइए जानते हैं उनके बारे में...

 

- हर्षिनी बताती हैं कि आज वो जो कुछ भी हैं, उसमें उनके पिता का भरपूर योगदान है।
- 70 वर्षीय पिता बापुराव गोपाल राव कान्हेकर महाराष्ट्र के वाटर रिसोर्स डिपार्टमेंट के रिटायर्ड इंजीनियर हैं।
- एजुकेशन को लेकर वे हमेशा से जागरूक रहे हैं। यही वजह थी कि शादी के बाद भी पत्नी को पढ़ने के लिए इन्सपायर करते रहे।
- वे हर्षिनी को भी हमेशा कॉम्पिटीटिव लेवल एग्जाम्स देने के लिए प्रोत्साहित करते रहे, ताकि उनकी स्पीड बनी रहे।
- गौरतलब है कि हर्षिनी का सपना था कि वे आर्म्ड फोर्स में शामिल हों। सेना की वर्दी पहनें, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था और वो एक फायर फाइटर बनीं।

 

'लड़कों का कॉलेज है, कैसे टिकोगी'
- पुराने दिनों को याद करते हुए हर्षिनी बताती हैं कि उनके पिता किसी भी कॉलेज में जाने से पहले वहां की सारी सिचुएशन्स से हमें रूबरू कराते थे। 
- 'पापा मुझे नागपुर के फायर कॉलेज ले गए। पता चला कि वहां किसी लड़की ने कभी दाखिला ही नहीं लिया था।'
- 'मुझे देख वहां सभी एकदम से चौंक गए कि यहां लड़की कैसे? फिर कहा-मैडम आप आर्मी या नेवी में कोशिश करें।'
- 'यह तो लड़कों का कॉलेज है, यहां आप टिक नहीं पाएंगी। यही बात मुझे चुभ गई और मैंने ठान लिया कि पढ़ाई तो यहीं करूंगी।'
- 'यूपीएससी की इस परीक्षा में ऑल इंडिया केवल 30 सीटें थीं। मैंने एग्जाम दिया और पास हो गई। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।'

 

यूनीफॉर्म पहनने का था सपना
- 'खाकी वर्दी पहनने का मेरा सपना था। जो लोग मुझ पर हंसते थे, वो अब चुप हैं।'
- 'मैं वो सारे काम करती थी, जो लड़के कर सकते थे।'
- 'कॉलेज में मैं हारी नहीं, क्योंकि इसका असर उन लड़कियों पर पड़ता; जिन्हें मैं रिप्रजेंट कर रही थी।'
- हर्षिनी ने नागपुर स्थित नेशनल फायर सर्विस कॉलेज से फायर इंजीनियरिंग का कोर्स किया। 
- वह पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने 2002 में इस कोर्स में एडमिशन लिया। 

 

पिता ने बढ़ाया हौसला
- 'अक्सर लोग कहते हैं मैं बहुत हिम्मत वाली हूं। लेकिन मुझसे ज्यादा मेरे मां-बाप साहसी हैं।'
- हर्षिनी का कहना है कि यही वजह थी कि पिता ने उन्हें लड़कों के कॉलेज में एडमिशन दिलाने की हिम्मत दिखाई।
- एक रिपोर्ट के मुताबिक, कभी कोलकाता में हर्षिनी तीन महीने तक जेंट्स हॉस्टल में अकेली रही थीं।
- इस पर हर्षिनी ने कहा कि पिता चाहते, तो उन्हें अलग भी रख सकते थे। लेकिन समाज की सोच को बदलने कि लिए उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया।

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