Advertisement

Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

32 साल की हुई भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी हर्षा, मां के पास नहीं थे इलाज के लिए पैसे

भारत में आईवीएफ की शुरुआत करने वाली डॉ. इंदिरा हिंदूजा ने 32 साल पहले एक डिलीवरी कराकर इतिहास रच दिया था।

हर्षा की डिलीवरी भी डॉ. इंदिरा हिंदूजा ने कराई थी। डिलीवरी के बाद हर्षा, पति दिव्यपाल शाह और डॉ. हिंदूजा।
Dainikbhaskar.com | Aug 06, 2018, 05:46 PM IST

हेल्थ डेस्क. भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी सोमवार को 32 साल की हो गई है। 6 अगस्त 1986 में जन्मीं मुंबई की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी हर्षा शाह दो बच्चों की मां हैं। भारत में आईवीएफ की शुरुआत करने वाली डॉ. इंदिरा हिंदूजा ने 32 साल पहले एक डिलीवरी कराकर इतिहास रच दिया था। ये डिलीवरी मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में कराई गई थी। टीम में हॉस्पिटल की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. कुसुम झावेरी और आईसीएमआर के डायरेक्टर डॉ. टीसी आनंद कुमार शामिल थे। डॉ. इंदिरा हिंदूजा से जानते हैं कैसे पहली टेस्ट ट्यूब हर्षा का जन्म हुआ और अभी कहां है....

05 प्वाइंट्स : हर्षा के जन्म से डॉक्टर बनने तक की कहानी

1- डॉ. इंदिरा हिंदूजा के मुताबिक एक दिन 24 साल की मणि चावड़ा मुझसे मिलने आईं। मणि एक पार्ट टाइम टीचर थीं और उनके पति बॉम्बे म्युनिसिपल कार्पोरेशन में कर्मचारी थी। दंपति 4 साल बेबी प्लान करने की कोशिश कर रहा था। उन्हें आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की पूरी तरह से जानकारी नहीं थी लेकिन वे इस प्रोसेस से बेबी प्लान करने को पूरी तरह से तैयार थे। 

2- उन दिनों क्लीनिकल ट्रायल फ्री था। लेकिन बाद के ट्रीटमेंट जैसे हार्मोन इंजेक्शन के उनके पास रुपए नहीं थे। उन्होंने किसी तरह रकम का इंतजाम किया। उनकी इच्छाशक्ति ने मेडिकल हिस्ट्री में इतिहास रच दिया था। पहली ही बार में मणि चावड़ा को सफलता मिली। 6 अगस्त 1986 को सुबह 3.30 बजे डिलीवरी हुई थी। हम सेफ डिलीवरी चाहते थे इसलिए सी-सेक्शन प्रकिया चुनी।

3- इस प्रोसेस में टीम में शामिल डॉ. कुसुम झावेरी ने काफी मदद की। यह आईवीएफ ट्रीटमेंट की पहली सफलता थी। बेबी का नाम हर्षा दिया गया था। करीब 30 साल बाद हर्षा ने नॉर्मल प्रोजीसर से एक बच्चे को जन्म दिया जिसकी डिलीवरी भी मैंने ही कराई थी। ये इस बात का प्रूफ था की आईवीएफ बेबी नॉर्मल लाइफ जीता है। आज की तारीख में हर्षा एक बेटा और एक बेटी की मां है। 

4- डॉ. हिंदूजा के अनुसार जब वह 9 साल की थी तो हड्डी में फ्रेक्चर होने के कारण उसे हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। उस दौरान उसने बताया कि वह एक डॉक्टर बनना चाहती है। हर्षा 32 साल की हो चुकी है। जो एक डॉक्टर है। इसके साथ वह नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन रिप्रोडक्टिव हेल्थ मुंबई से आईवीएफ रिसर्च में पीएचडी कर रही है। हर्षा के पति दिव्यपाल शाह एक बिजनेसमैन हैं।

5- डॉ. हिंदूजा बताती हैं कि इनदिनों जो कपल इसके लिए आते हैं वे काफी अवेयर हैं। वे यह तय कर लेते हैं कि उन्हें कब इसके लिए खुद को तैयार करना है। मेरे अनुभव के अनुसार आईवीएफ का सक्सेस रेट बढ़ा है। हालांकि इस ट्रीटमेंट की फीस अभी भी एक बड़ा चैलेंज है। हिंदूजा हॉस्पिटल में करीब ऐसे 15000 हजार दंपतियों के मदद कर चुका है। 

क्या है आईवीएफ
आईवीएफ को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन कहते हैं। ऐसी महिलाएं जिनमें अंडे नहीं डेवलप हो पा रहे या काफी कम हो रहे हैं उन्हें ये ट्रीटमेंट दिया जाता है। इस प्रक्रिया में अधिक अंडों के उत्पादन के लिए महिला को फर्टिलिटी बढ़ाने वाली मेडिसिन दी जाती हैं और उसके बाद एक छोटी सी सर्जरी के माध्यम से अंडों को निकाला जाता है। इसके बाद इन्हें प्रयोगशाला में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन के लिए रख दिया जाता है। लैब में इसे दो-तीन दिन के लिए रखा जाता है और इससे बने भ्रूण को वापस महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। आईवीएफ की पूरी प्रक्रिया में दो से तीन सप्ताह का समय लग जाता है। इसमें डॉक्टर की सलाह, जांच, अंडों और शुक्राणुओं का स्ट्रोरेज और अंत में निषेचन के बाद भ्रूण का गर्भ में प्रत्यारोपण शामिल है। इसकी सफलता- असफलता का पता अगले 14 दिनों में रक्त परीक्षण/प्रेग्नेंसी टेस्ट के बाद लगता है।

एक इवेंट के दौरान हर्षा, पति दिव्यपाल शाह, डॉ. इंदिरा हिंदूजा और डॉ. झावेरी। हर्षा के बच्चे के साथ डॉ. हिंदूजा और डॉ. झावेरी
Advertisement

Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

टॉप न्यूज़और देखें

Advertisement

बॉलीवुड और देखें

स्पोर्ट्स और देखें

Advertisement

Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

जीवन मंत्रऔर देखें

राज्यऔर देखें

वीडियोऔर देखें

बिज़नेसऔर देखें