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प्रीतीश नंदी का कॉलम: चुनाव में पाला बदलने का वक्त आ गया है

संदर्भ: विज्ञान और तर्क को दरकिनार कर दिए गए सत्ता में बैठे जिम्मेदार व्यक्तियों के अतिशयोक्ति पूर्ण बयान

प्रीतीश नंदी | Aug 10, 2018, 12:03 AM IST

कुछ दिन पहले कर्नाटक के भाजपा विधायक बासनागौडा पाटिल येतनाल ने कारगिल विजय दिवस कार्यक्रम में कहा कि भारत को भीतर से ही इसके बुद्धिजीवियों और उदारवादियों से गंभीर खतरा है, जो राज्य-व्यवस्था पर बोझ से ज्यादा कुछ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे सब राष्ट्र-विरोधी हैं और यदि वे गृहमंत्री हो तो पुलिस को आदेश देंगे कि सबको कतार में खड़े करके गोली मार दो।

सौभाग्य से वे मंत्री है नहीं लेकिन, पत्रकार गौरी लंकेश सहित चार बुद्धिजीवियों को कर्नाटक और पड़ोसी महाराष्ट्र में गोली मारी गई है। पुलिस ने नहीं बल्कि किराये के हत्यारों ने। मुझे लगता है कि इन्हें किराये पर यतनाल जैसे लोगों ने ही लिया होगा। ये सभी चारों सम्माननीय शख्सियतें थीं और पांच अन्य इस वक्त कर्नाटक में पुलिस सुरक्षा में जी रहे हैं, क्योंकि माना जा रहा है कि वे निशाने पर हो सकते हैं। यतनाल ही वे शख्स हैं, जिन्होंने पहले एक वायरल वीडियो में कहा था कि उनकी पार्टी के पार्षद मुस्लिमों के लिए काम नहीं करेंगे। वे अकेले नहीं हैं। हमने ऐसे ही विचार उनकी पार्टी के कुछ अन्य लोगों से भी सुने हैं, जो सोचने-समझने वाले लोगों, उदारवादियों, धर्मनिरपेक्षवादियों, अल्पसंख्यकों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं को अपना शत्रु मानते हैं। वे इसे भिन्न तरीकों से कह सकते हैं पर यह साफ है कि ऐसे लोग उन्हें अखरते हैं, वे भी जो आधुनिक विज्ञान की भाषा बोलते हैं। उनके लिए ये ‘दूसरे’ हैं- और उन्हें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। वे पाठ्यपुस्तकें भी बदलना चाहते हैं। यदि उनकी चले तो इतिहास से मुगल अध्याय ही समाप्त हो जाए और उसी तरह ब्रिटिश शासन भी। राजस्थान में कक्षा 10वीं की पाठ्यपुस्तक में छात्रों को पढ़ाया जाता है कि महाराणा प्रताप हल्दीघाटी की लड़ाई जीत गए थे, जबकि अन्य जगहों पर बच्चे सीखते हैं कि वे अकबर की सेना से हार गए थे। अकबर भी राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों से बाहर कर दिए गए हैं। टीपू सुल्तान भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, जो अंग्रेजों से लड़ते हुए मारा गया था। किसी स्पष्ट कारण के बिना उसे खलनायक बना दिया गया है।

लेकिन, बात सिर्फ इतिहास की किताबों की नहीं है। वे डार्विन को भी नकारते हैं। हमारे बच्चे जिन स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते हैं उससे संबंधित मानव संसाधन मंत्रालय के जूनियर मंत्री ने डार्विन को फर्जी बताकर उसकी निंदा की। उन्होंने मानव उत्क्रांति के सिद्धांत को पाठ्यपुस्तकों से निकालने की कसम खाई है, क्योंकि उनका दावा है कि वे बरसों से देख रहे हैं पर किसी वानर को मानव होते नहीं देखा (मेरा ख्याल है अब आइंस्टीन निशाने पर होंगे, क्योंकि इसी तर्क से किसी ने e को mc2 होते नहीं देखा।

लेकिन पूर्व पुलिसकर्मी, जो प्राय: मंत्रालय के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति होने की शेखी बघारते हैं वे सत्यपाल अकेले नहीं हैं। पार्टी में कई और हैं, जो बहुत जल्दी में है। उन्हें हमारा संविधान बदलने की जल्दी है। वे सारे मुस्लिमों को पाकिस्तान–  और अब बांग्लादेश भेजना चाहते हैं। उन्हें सारे अंतरजातीय, अंतर्धार्मिक विवाह रोकने की जल्दी में हैं। उन्हें दलितों को घोड़े पर बैठकर विवाह करने जाने से रोकने की जल्दी है। उन्हें महात्मा को हटाकर उनके स्थान पर उनके हत्यारों को लाने की जल्दी है। हमारे सामने तो त्रिपुरा के राज्यपाल भी हैं, जो 2002 में गुजरात में मुस्लिमों के मारे जाने को सकारात्मक कार्रवाई बता रहे हैं। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री भी कम नहीं हैं। उन्होंने राज्य के युवाओं को सलाह दी है कि वे सरकारी नौकरियों के पीछे न भागे बल्कि घर पर रहे और गाय का दूध निकाले या पान की दुकान खोल लें। वे सिविल सेवा में सिर्फ सिविल इंजीनियर चाहते हैं, क्योंकि उनकी योग्यता काम के अनुरूप है।

जैसे-जैसे हम 2019 के चुनाव के नज़दीक जा रहे हैं, इस तरह का शोर अधिक तीखा, कर्कश और अधिक भड़काऊ होगा, क्योंकि उन्हें रोकने वाला कोई है नहीं। मजे की बात है कि जो बचे हुए सरकार के सहयोगी हैं चुपचाप उससे दूर हो रहे हैं। लेकिन, समस्या यह है कि खेल के नियम बदल गए हैं। हर कोई आगामी चुनाव के लिए पैसे की जुगाड़ में है और जैसा हम जानते हैं पैसा हमेशा सत्ता में होता है। इस तरह यदि विपक्ष राजनीतिक गठजोड़ों और संसाधनों दोनों स्तरों पर काम नहीं करता, तो उन्हें चुनाव बाद के खरीद-फरोख्त के माहौल में मात मिलेगी। मुझे आश्चर्य  होता है कि क्यों सरकार नफरत को इतना फैलाना चाहती है। वे उदारवादियों को गोली मारना चाहते हैं, धर्मनिरपेक्षतावादियों को निर्वासित करना चाहते हैं। बुद्धिजीवी तो उनके लिए राष्ट्रविरोधी हैं, मुस्लिम आतंकी। किसान तो लगातार अर्थव्यवस्था को निचोड़ने वाले, इसलिए उनकी जमीन को विकास यानी –बुलेट ट्रेन और हाईवे- के लिए हथिया लेना चाहिए। आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे सारे एक्टिविस्ट माओवादी हैं। पर्यावरणविद तो तरक्की के दुश्मन है, क्योंकि वे जंगलों की कटाई, मेनग्रोव को उखाड़ने, नदियों पर बांध बनाने का विरोध करते हैं। पत्रकार प्रेस्टीट्यूट हैं। एनजीओ को भारत के खिलाफ शत्रुता रखने वाली वैश्विक ताकतें पैसा देती हैं। 

जब तक आप नहीं मानेंगे कि संजय ने टीवी देखकर दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध का वर्णन सुनाया था या गणेशजी ने प्लास्टिक सर्जन से सिर का प्रत्यारोपण कराया था, ऐसे किसी प्रागैतिहासिक भारत के सुनहरे युग में जब आसमान में सुपसॉनिक जेट उड़ते थे और हम ब्रह्मांडों के बीच उड़ान भरने वाले वाहनों में उड़ते थे, जो उस सबसे बहुत आगे की बात थे, जो एलन मस्क सोच रहे हैं, तब तक आप राष्ट्रवादी नहीं हैं। बेशक, धरती भी चपटी है और जब तक आप सारे नास्तिकों को कगार से नीचे नहीं धकेल देते तब तक हम यह पता नहीं लगा पाएंगे कि इतने दुष्कर्मों और लिचिंग और तर्कवादियों की हत्याओं के बाद भारत अतुल्य कैसे है। ऐसे राष्ट्र के लिए जिसने कला और विज्ञान के क्षेत्रों के हमारे समय के महानतम मस्तिष्कों को जन्म दिया यह सब अतिशयोक्तिपूर्ण है। लेकिन, फिर हमने ही इन्हें वोट देकर सत्ता सौंपी है। मुझे नहीं पता कि हमने तब क्या खाकर उन्हें वोट दिए थे। लेकिन, अब पाला बदलने का वक्त है फिर चाहे हमारी जीडीपी कुछ नीचे ही क्यों न गिर जाए और शेयर बाजार को धरती पर ही क्यों न ला दे। शायद एक थोड़ा कम महान, सुरक्षित, तर्कशील भारत इतनी बुरी बात भी नहीं है। 


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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