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शेखर गुप्ता का कॉलम: खतरनाक हो सकता है असम में ध्रुवीकरण

संदर्भ: 2019 में पूर्वोत्तर का यह राज्य भाजपा के लिए अहम है पर इसमें हिंदू भी निशाना बन सकते हैं

शेखर गुप्ता | Aug 06, 2018, 11:41 PM IST

शायद 35 साल पहली हुआ नेल्ली नरसंहार बताने की जरूरत नहीं है। इसकी बजाय में आपको गुमनाम सी जगहों खोइराबाड़ी, गोहपुर और सिपाझार के बारे में बताता हूं। ब्रह्मपुत्र घाटी में 1983 के हत्याकांड में 7 हजार लोग मारे गए थे। इनमें से तीन हजार मुस्लिम थे, जिन्हें नेल्ली में 18 फरवरी की सुबह कुछ ही घंटों में मार दिया गया था। जिन तीन जगहों का हमने जिक्र किया वहां मारे गए लगभग सभी हिंदू थे और उन्हें हिंदुओं ने ही मारा था। यदि ‘विदेशी नागरिकों’ (मुस्लिम) के खिलाफ गुस्सा था  तो हिंदू, हिंदुओं को क्यों मार रहे थे?


हमलावर असमी भाषी हिंदू थे और मारे गए बंगाली हिंदू। भाषाई व जातीय नफरत सांप्रदायिक विद्वेष जितनी ही विषैली थी। यदि दोनों आवेग एक ही में ढल गए थे तो कहानी सीधी थी कि असमी हिंदुओं ने बंगाली मुस्लिमों को मारा। भाजपा और भला चाहने वाले सुप्रीम कोर्ट ने उसी घातक मिश्रण को भड़का दिया है। चालीस लाख लोग एनआरसी के अंतिम मसौदे में जगह नहीं बना पाए हैं। उनका वर्णन इस बात पर निर्भर है कि भाजपा सरकार की तरह बोल रही है या पार्टी की तरह। गृह मंत्री राजनाथ सिंह कहते हैं यह केवल अंतरिम पहला मसौदा है। अमित शाह उन्हें संसद में ‘घुसपैठिए’ कहते हैं। फिर असम के वित्तमंत्री (और असली मुख्यमंत्री) हिमांता बिस्वा सरमा ने बताया कि 40 लाख में से एक-तिहाई हिंदू हैं। भाजपा का समाधान : नया नागरिकता कानून, जिसमें पड़ोसी देशों के हिंदू व सिखों को नागरिकता दी जाएगी। यह कानून पारित हो भी गया तो देखें कि ‘देशज’ असमी कैसी प्रतिक्रिया जताता है। मुस्लिम हो या हिंदू वे बंगालियों के साझीदार नहीं होना चाहते। 1983 में वे दोनों को मार रहे थे। पूर्व मुख्यमंत्री व असम गण परिषद के प्रमुख व आज भाजपा के सहयोगी प्रफुल्ल कुमार महंत असहमति जता चुके हैं।


सारे अनुमानों से लगता यही है कि अंतिम सूची में इन 40 लाख में से सिर्फ 5 लाख बचेंगे। गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्थानीय लोगों की इस मांग पर मुहर लगा दी है कि ग्राम पंचायत से मिले प्रमाण-पत्रों को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा। आधार आने के पहले से यहां रह रहे गरीब लोग कौन-सा प्रमाण लाएंगे? राज्य सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील भी नहीं की। किसी ओर ने यह काम किया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश की पुष्टि तो नहीं की पर उससे कहा कि वह मानक तय करके बताए कि पंचायतों के किन प्रमाण-पत्रों को मान्यता दी जाएगी। तार्किक सोच अपनाई तो कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बचेगा। भाजपा ऐसा नहीं चाहती। न्यायालय ने 1985 के राजीव गांधी-आसू/एएजीएसपी शांति समझौते की भावना के अनुरूप काम किया। इसमें कहा गया था कि नागरिकता तय करने के लिए एनआरसी के लिए 25 मार्च 1971 को कट ऑफ वर्ष माना जाएगा। यानी जो लोग उस तारीख से पहले भारत आ गए थे, उन्हें भारतीय नागरिक माना जाएगा। यह बात इंदिरा गांधी और शेख मुजीबुर्रहमान के समझौते के अनुरूप थी जिसके तहत बांग्लादेश, भारत से अपने करीब एक करोड़ शरणार्थियों को वापस लेने को तैयार हो गया था। इनमें से करीब 80 फीसदी हिंदू थे। 33 साल पहले 1985 में जब राजीव गांधी ने असम में विद्रोहियों के साथ समझौता किया था तो एनआरसी को इसी आधार पर रखने का वादा किया था। तमाम वजहों से एनआरसी अब तक नहीं तैयार हो सका। तब से दो और पीढ़ियां बड़ी हो गईं। क्या आप अब उनको देश से बाहर भेज सकते हैं या उनकी नागरिकता समाप्त कर सकते हैं? भाजपा भी जानती है कि ऐसा नहीं हो सकता।


अगर भाजपा का कोई व्यक्ति कहता है कि इसमें कोई राजनीति नहीं है तो उससे पूछिए कि क्या उसने अमित शाह का भाषण नहीं सुना? उन्हें श्रेय देना होगा कि उन्होंने पूरी पारदर्शिता के साथ 2019 के चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी। केंद्र में दूसरा कार्यकाल हासिल करने के लिए भाजपा ‘राष्ट्रवादी’ ध्रुवीकरण करेगी। असम में यह मसला तब तक सुलगता रहेगा। भाजपा लाखों लोगों को घुसपैठिया कहती रहेगी। अपने वाम-बौद्धिक आधार के दबाव में ‘धर्मनिरपेक्ष’ विपक्ष मजबूरन इनके बचाव में उतरेगा। फिर कहा यह जाएगा कि वे मुस्लिमों के हिमायती और राष्ट्र विरोधी हैं। कांग्रेस ने चाल समझ ली है लेकिन, उसके पास इसका कोई जवाब नहीं है। अगर 2019 का चुनाव मुस्लिम समर्थक और मुस्लिम विरोधी के खांचे में बंटा तो भाजपा की जीत तय है। अमित शाह के लिए असम देश भर में राष्ट्रवाद की भावना भड़काने का माध्यम है। शाह और भाजपा अपनी चुनावी राजनीति को दूसरों से बेहतर समझते हैं। पर क्या वे असम को जानते हैं? मैं आपको 35 वर्ष पहले गुवाहाटी के नंदन होटल के मेरे छोटे से कमरे में ले चलता हूं। मुझसे मिलने आए चार लोगों के नेता थे तब आरएसएस के बौद्धिक प्रमुख केएस सुदर्शन, जो बाद में सरसंघचालक बने। उनमें से दो बाद में आरएसएस में पूर्वोत्तर ‘विशेषज्ञ’ बने और अब संघ और भाजपा सरकार में अहम पदों पर हैं। वे यह जानने आए थे कि असम के दंगों में इतनी बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू कैसे मारे गए? उनका सवाल था कि असम के लोग ‘मुस्लिम घुसपैठियों और हिंदू शरणार्थियों’ में भेद क्यों नहीं कर पा रहे? मैंने उन्हें असम में हुए इस हत्याकांड के पीछे की जातीय और भाषाई जटिलता समझाई। उन्होंने कहा, ‘किंतु हिंदू तो अरक्षित है।’ उसके बाद आरएसएस ने असमी विद्रोहियों को नए सिरे से शिक्षित करने का अभियान चलाया। गत विधानसभा चुनाव में मिली जीत उसी का पुरस्कार है। असम भाजपा में अब मुख्यमंत्री व उनके अधिक प्रभावशाली सहयोगी सहित आसू और अगप के तमाम पुराने लोग शामिल हैं। परंतु जैसा कि उन्होंने 1983 में अपनी युवावस्था में किया था, इस बार भी उन्हें एनआरसी के मामले में आरएसएस/भाजपा की शर्तों पर काम करना मुश्किल होगा : यानी बंगाली मुस्लिमों को निशाना बनाना और हिंदुओं को साथ लेना। भाजपा ने असम को 2019 के लिए अपना प्रमुख हथियार बनाना तय किया है। जैसा कि हमने नोटबंदी से देखा, शाह और मोदी बड़े जोखिम उठा सकते हैं। बहरहाल, राजनीतिक लाभ के लिए आर्थिक नुकसान झेलना एक बात है और असम में पुरानी आग भड़काना दूसरी बात। संभव है कि शांति बरकरार रहे लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो मामला फिर हिंदू बनाम मुस्लिम, असमी बनाम बंगाली, हिंदू या मुस्लिम, हिंदू बनाम हिंदू और मुस्लिम बनाम मुस्लिम का बन जाएगा। 

 

 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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