Advertisement

Dainik Bhaskar Brings you the latest Hindi News

संपादकीय/ रघुराम राजन के बयान का आर्थिक इस्तेमाल हो

Dainik Bhaskar | Sep 13, 2018, 12:36 AM IST
भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ( फाइल फोटो )
-- पूरी ख़बर पढ़ें --

बयान का राजनीतिक इस्तेमाल करना दुर्भाग्य की बात

Dainik Bhaskar

Sep 13, 2018, 12:36 AM IST

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय आकलन समिति के सामने जो बयान दिया है उसका राजनीतिक इस्तेमाल न करके आर्थिक इस्तेमाल होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि उस रिपोर्ट का ज्यादातर मीडिया समूहों और राजनेताओं ने एक ही निष्कर्ष निकाला है कि बैंकों का बट्‌टा खाते का कर्ज यूपीए सरकार की गलत नीतियों की देन है।

यह सही है कि रघुराम राजन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ज्यादातर बट्‌टा खाते का कर्ज 2006 से 2008 की देन है और उस दौरान कोयला घोटाला होने के कारण सरकार कोई भी कठोर निर्णय लेने से झिझकने लगी थी। इसके बावजूद यह कैसे भुलाया जा सकता है कि 2014 का बट्‌टा खाते का कर्ज 2018 में तीन गुना हो चुका है।

राजनेता और मीडिया ज्यादातर आंकड़ों और घटनाओं का सरलीकरण करते हैं लेकिन, समस्याओं की जड़ उससे कहीं ज्यादा उस व्यवस्था में होती है जो कुछ विशेष शक्तियां मिलकर तैयार करती हैं। इसीलिए रघुराम राजन ने यह भी माना है कि बट्‌टे खाते का कर्ज बैंकर, प्रोमोटर और परिस्थितियों से मिलकर तैयार होता है।

उन्होंने जिन तीन बातों को सबसे ज्यादा दोषी बताया है कि वे हैं अतिआशावादी बैंकर, नीतिगत सुस्ती और बड़ा कर्ज देने में बरती गई असावधानी। उनका मानना है कि 2006 में ढांचागत परियोजनाएं समय से पूरी हो गईं और उनसे उत्साहित बैंकरों ने कर्ज देने में वास्तविक स्थिति का आकलन करना जरूरी नहीं समझा।

राजन की बातों का जवाब अर्थशास्त्री और देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को स्पष्ट तरीके से देना चाहिए। इसके बावजूद रघुराम राजन ने दूसरी बात भी कही है और उस पर गौर किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि उन्होंने बैंक के कर्ज न देने वालों के नाम यूपीए और एनडीए दोनों सरकारों के कार्यकाल में पीएमओ को भेजे थे लेकिन, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब 2016 में रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और दूसरा कार्यकाल चाहते थे तो मोदी सरकार ने ही उन्हें मना किया। रघुराम राजन चाहते थे कि बैंक अपना बहीखाता दुरुस्त करें और उससे इस सरकार को भी परेशानी हो रही थी। इसलिए रघुराम राजन की बातों को पूरे परिप्रेक्ष्य में ही लिया जाना चाहिए।