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सुप्रीम कोर्ट शरिया अदालतों के गठन को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई को तैयार

याचिकाकर्ता मुस्लिम महिला से अर्जी देकर पक्षकार बनने को कहा

Bhaskar News | Sep 03, 2018, 05:45 AM IST

निकाह-हलाला की चुनौती पर संविधान बेंच कर रही है सुनवाई

 

नई दिल्ली.  सुप्रीम कोर्ट ने निकाह, तलाक और अन्य मामलों पर फैसला करने के लिए शरिया अदालतों के गठन को असंवैधानिक करार देने की मांग को लेकर एक मुस्लिम महिला की याचिका पर विचार करने को मंजूरी दी है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने याचिकाकर्ता जिकरा से कहा कि मुस्लिमों में बहुविवाह और निकाह-हलाला के मामले में चल रही सुनवाई में पक्षकार बनने के लिए नई अर्जी दायर करें।  
उत्तर प्रदेश की रहने वाली 21 वर्षीय जिकरा 2 बच्चों की मां हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से अधिवक्ता अश्वनी उपाध्याय पेश हुए। जिकरा ने याचिका में अनुरोध किया है कि धारा 498ए के तहत तीन-तलाक को क्रूरता, जबकि “निकाह हलाला’, “निकाह मुताह’ और “निकाह मिस्यार’ को धारा 375 के तहत दुष्कर्म घोषित किया जाए। याचिका में कहा गया है कि बहु-विवाह आईपीसी की धारा 494 के तहत अपराध है। भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ निकाह-हलाला और बहु-विवाह की अनुमति देता है। जिकरा ने याचिका में तीन तलाक, निकाह हलाला और अन्य कानूनों तथा परंपराओं के हाथों अपनी प्रताड़ना की बात कही है। महिला को दो बार तलाक का सामना करना पड़ा और अपने ही पति से निकाह करने के लिए “निकाह हलाला’ से गुजरना पड़ा।  

बहु-विवाह और निकाह हलाला का मामला विचाराधीन : सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष सुन्नी मुसलमानों में तीन तलाक की पुरानी परंपरा को खत्म करने का फैसला सुनाया था। इसके साथ ही समुदाय में बहु-विवाह और निकाह हलाला को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए 26 मार्च को 5 सदस्यीय संविधान बेंच का गठन किया था और मामला विचाराधीन है। केंद्र ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट में “निकाह हलाला’ का विरोध करेगा। बहु-विवाह के तहत मुस्लिम पुरुष को चार पत्नी रखने की अनुमति है। “निकाह हलाला’ के तहत कोई मुस्लिम पुरुष तलाक देने के बाद पत्नी को दोबारा तभी रख सकता है, जब पत्नी किसी दूसरे पुरुष से निकाह करके उसके साथ पत्नी की तरह रहे और फिर उससे तलाक लेने के बाद “इद्दत’ की अवधि गुजार ले। इद्दत तलाक लेने के बाद महिला के पति से अलग रहने की व्यवस्था है।

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