अस्तित्व / छुटि्टयों में बच्चों को गिरने दो, संभलने दो, खुला आसमान देख लेने दो

Dainik Bhaskar

Apr 19, 2019, 01:14 AM IST

गर्मियों की सालाना छुट्टियां करीब हैं और आप मसरूफ हैं बच्चों की फुर्सतों के हर लम्हे का पाई-पाई हिसाब रखने में। मसलन, सवेरे की कोचिंग, शाम की ट्यूशन, वीकेंड के टेस्ट और इन सबके बाद भी अगर कुछ वक्त बचा रह गया तो कोर्स रिवीज़न के लिए एक्स्ट्रा क्लासेज़। बिल्कुल इत्तफाक है हमें कि कंपीटिशन के युग में आंखेंखोलने वाले आपके बच्चों को शुरू से ही स्पर्धा के हथियार चलाने सीखने होंगे। उन्हेंआगे चलकर आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास करनी है, इंजीनियरिंग कॉलेज में जगह बनानी है, डीयू की कटऑफ लिस्ट को धता बताकर मनमाफिक कोर्स में एडमिशन लेना है। और इससे भी आगे चलकर मारकाट वाली मार्केट इकोनॉमी के हिसाब से उसे खुद को तैयार करना है। यानी, बतौर पेरेंट आप पर भी ढेर सारा दबाव है और चुनौतियां भी।


लेकिन जिं़दगी की परीक्षा के लिए बच्चों को तैयार करने की खातिर क्या किया? उन्हें रिलेशनशिप्स की बारीकियां समझाने की गरज से क्या किया? उन्हें अपने ही शरीर की बनावट और दिमाग की बुनावट समझाई क्या? सोशल स्किल्स का ककहरा रटवाया क्या? मिलनसार बनने की तरकीबें बताईं? नाजुक दौर में कैसे खुद को संभालना है, इस बारे में समझाया क्या? नहीं न? क्योंकि यह भी कोई बताने की बात है? जि़ंदगी के स्वीमिंग पूल में आप भी तो ऐसे ही उतार दिए गए थे, बिना बैक स्ट्रोक, बटरफ्लाई स्ट्रोक सीखे। उसी का खामियाज़ा भुगतती रही थी आपकी जिंदगी तमाम उतार-चढ़ावों के दौर में, हैं न?

मगर अब तो कमान आपके हाथ में है, सो बदल डालिए जि़ंदगी के ऊल-जलूल उसूल। बच्चों को इंटरनेट युग में रिश्तों को निभाने की तरकीबें बताइए और इस तनाव के दौर में उन्हें कैसे दूसरों को ‘स्पेस’ देना है, उनकी प्राइवेसी का सम्मान करना है, रोज-बरोज़ की जि़ंदगी को मैनेज करना है, यह सिखाइए। इन छुटि्टयों में कोचिंग, ट्यूटोरियल में दाखिला दिलाने की बजाय कुछ ऐसा करने दो जो उनके मन का हो, जिसे करते हुए वे हंसते-हंसते घर लौटें, खुलकर खिलखिलाना सीखें, खुद को खोलना सीखें, सही आजादी चख सकें।


किसी आश्रम में या जंगल में लगे संस्कारों के कैम्प का हिस्सा बन जाने दें ताकि वह गुरु की शरण में समय बिताते हुए अपनी परंपराओं को जान सकें। एक्टिंग सीखने दो, थियेटर करने दो, गिटार बजाने दो, पेंटिंग करने दो, फुटबॉल के मैदान पर उतार दो, गंगा किनारे योग-ध्यान की क्लास से जुड़ जाने दो… वॉलंटियरिंग का दौर है, सो किसी सुदूर प्रदेश में या विदेश में, वॉलंटियर की हैसियत से जुड़ जाने दो, ताकि कुछ नई स्किल्स हासिल कर सकें और अपने किसी हुनर के बलबूते अनजाने लोगों के बीच रहने का अनुभव बटोर सकें।


अपनी पीढ़ी के संस्कारों और मूल्यों से उन्हें हांकना छोड़ दो। बनाने दो उसे अपने खुद के नियम, तोड़ने दो बेतुके कायदे, चलने दो नई, अनजानी राह पर। सीखने दो कुछ नया जो उन्हें किसी एंट्रेंस एग्ज़ाम में न सही, जि़ंदगी की परीक्षा में जरूर पास करा देगा। करने दो ग‍लतियां, लगने दो ठोकरें, गिरने दो, संभलने दो, फिसलने दो, बहकने दो... बच्चों को उड़ान भरने दो, खुला आसमान देख लेने दो।

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