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संदर्भ/ क्या पाक ने खुद के खिलाफ ट्रिगर दबा दिया है?

शेखर गुप्ता

Feb 19, 2019, 12:08 AM IST
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  • पहले की तरह परमाणु हथियारों से दुनिया को ब्लैकमेल करने की नीति अब पड़ोसी देश के काम नहीं आएगी

Dainik Bhaskar

Feb 19, 2019, 12:08 AM IST

दक्षिण एशिया के जाने-माने अमेरिकी विद्वान स्टीफेन पी कोहेन ने पाकिस्तान की रणनीतिक सोच का अनूठा वर्णन किया है। उनके मुताबिक पाकिस्तान अपने ही सिर पर बंदूक तानकर दुनिया से कहता है कि मैं जो चाहता हूं वह दो वरना मैं अपनी खोपड़ी उड़ा दूंगा। फिर जो होगा उससे आप निपटना। क्या पाकिस्तान ने पुलवामा में वह ट्रिगर दबा दिया है?

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पहली बात, अपने दिमाग से यह धारणा निकाल दीजिए कि यह देशी हमला था। आत्मघाती हमलावर कट्‌टरपंथी बना दिया गया कश्मीरी था लेकिन, वह भारतीय धरती पर नियोजित हमला नहीं हो सकता। इसके कई कारण हैं। हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित व आईएसआई संचालित गुट जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। इस बात के कोई सबूत नहीं है कि इतनी बड़ी मात्रा में आरडीएक्स या आरडीएक्स मिक्स विस्फोटक ट्रिगर टाइमर के साथ स्थानीय गुटों के पास था। आखिरी वीडियो में हमलावर सामने रखे किसी बोर्ड पर पहले से लिखे हुए संदेश को पढ़ रहा है। उसमें कश्मीरी शिकायतें अथवा बदले की बात नहीं थी बल्कि शेष भारत में मुस्लिमों को भड़काने की कोशिश थी। यह जैश बल्कि उससे भी ज्यादा लश्कर-ए-तय्यबा की सोच है।

हमले में जैश द्वारा भूतकाल में अपनाया पैटर्न था। श्रीनगर में 2001 में विधानसभा भवन पर आत्मघाती हमला, संसद, पठानकोट और गुरुदासपुर के हमले, सब में आतंकवाद को कश्मीर से आगे ले जाने का इरादा था। लश्कर ने ऐसा मुंबई हमले में भी किया था। जैश छोटा गुट होने के बावजूद अधिक खतरनाक, साधन-संपन्न और आईएसआई का चहेता है। कंधार विमान अपहरण से हमें पता चलता है कि जैश कितना साधन संपन्न है। बाद की जांच में यह स्थापित हुआ कि विमान अपहरण में काठमांडू में मदद, कंधार में भारतीय अधिकारियों से तालिबान का इस्तेमाल करके बातचीत और मसूद अजहर की रिहाई सबकुछ आईएसआई की निगरानी में हुआ था। पाकिस्तान व आईएसआई के लिए अजहर व जैश, लश्कर तथा हाफिज सईद से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। जैश उनकी ताकत बढ़ाने वाला गुट है। चीन भी यह मानता है और इसीलिए पूरी बेशर्मी के साथ उसका बचाव कर रहा है। हमले में स्थानीय कश्मीरी होना आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे पास पर्याप्त सबूत है कि हम स्थानीय जड़ें इत्यादि पर वक्त बर्बाद न करें और पाकिस्तान को हमले में हाथ होने से इनकार का मौका दें।


हमने यह सवाल क्यों उठाया कि क्या पाकिस्तान ने अपनी खोपड़ी पर खुद रखी बंदूक का ट्रिगर दबा दिया है? क्योंकि पहले के सारे हमले बदले की कार्रवाई के प्रचार के बिना निकल गए। हालांकि, हम कुछ गोपनीय सर्जिकल स्ट्राइक होने की बात जानते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह के बीच धमकाने वाली कूटनीति, वैश्विक दबाव और शांतिवादी रणनीतिक मानसिकता के कारण देश गुस्से के दौर से बाहर आने में कामयाब रहा। उसका विश्वास ऐसा जवाब देने में रहा, जो उकसावा साबित न हो। मोदी सरकार ऐसा कोई दिखावा नहीं चाहती। वह मनमोहन और वाजपेयी दोनों सहित पूर्व की सरकारों के रवैये को ‘कायराना’ मानती है। फिर इस तरह का शोर मचाकर और उड़ी सर्जिकल हमले का राजनीतिक फायदा उठाने के बाद वह लंबे समय तक संयम नहीं रख पाएगी। पाकिस्तान को जवाब मिलेगा। कहां, कैसे, कब कोई नहीं जानता पर इसमें लंबा वक्त नहीं लगेगा। यह साफ नज़र आएगा।


देश सर्वाधिक कटु चुनाव अभियान के शुरुआती चरण में है। पुलवामा दाग लेकर नरेन्द्र मोदी दूसरा कार्यकाल मांगने नहीं जाना चाहेंगे। फिर यह पाकिस्तान पर होगा कि उसे वहीं छोड़ दें या घरेलू बाध्यताओं में बदले का दुष्चक्र चला दे। सैन्य स्तर पर जो भी हो, इससे इमरान खान का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। इतिहास बताता है कि कोई पाकिस्तानी शासक भारत के साथ युद्ध करके बना नहीं रह सका है। अयूब खान (1965), याह्या खान (1971), नवाज शरीफ (करगिल, 1999) यही बताते हैं। इमरान को फौज के दुस्साहस की कीमत चुकानी पड़ेगी जैसी नवाज ने करगिल के बाद चुकाई थी। बदले के दुश्चक्र में फंसना या नहीं है यह फैसला फौज का होगा। इमरान इसके खिलाफ सलाह दे भी सकते हैं या नहीं, हम पक्का नहीं कह सकते। जो भी हो, उनके पल्ले तो नाकामी ही आएगी।


मोदी और उनके पूर्ववर्तियों के बीच फर्क के अलावा दो महत्वपूर्ण फर्क अौर हैं। एक तो दुनिया 2008 (26/11) और 2001-02 (जम्मू-कश्मीर विधानसभा व संसद हमले) की तुलना में एकदम बदल चुकी है। तब शीर्ष अमेरिकी व यूरोपीय नेता चले आते थे, राष्ट्राध्यक्ष फोन कॉल करते, रूस, चीन दबाव डालकर स्थिति शांत करते। हमारे साथ एकजुटता दिखाकर व पाकिस्तान की भर्त्सना करके भारतीय जनमत को आश्वस्त करते। अब तो विश्व नेता है ही नहीं। यह तभी तय हो गया जब डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव जीते और उन्होंने दुनिया को उसके हाल पर छोड़कर अपने देश को फिर महान बनाने का वादा किया। यदि भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ हुआ तो संभव है कि वे तत्काल संयम बनाए रखने का ट्वीट करने की भी परवाह नहीं करें। अब दोनों देश क्षेत्र में आग लगाने को स्वतंत्र हैं और अमेरिकी या वैश्विक स्तर पर कोई आग बुझाने की राहत देने नहीं आएगा। अब इस क्षेत्र की यह सुविधा खत्म हो गई है कि आओ और हमें रोको वरना हम एक-दूसरे पर परमाणु हमला कर देंगे। हम चाहें ट्रम्प को दोष दें लेकिन, जिम्मेदार परमाणु शक्ति होने के दावे के बाद इस तरह के ब्लैकमेल से दुनिया ऊब चुकी है।

बेशक, यह भारत की बजाय पाकिस्तान पर अधिक लागू होता है, क्योंकि क्षेत्र में परमाणु शक्ति कमजोर देश का हथियार है। वीपी सिंह के 1990 के रीढ़हीन वर्ष से शुरू करके पाकिस्तान ने परमाणु शक्ति का अपने हित में पूरा फायदा उठाकर भारत से किसी प्रबल प्रतिकार होने की संभावना कुंठित कर दी। परमाणु हथियारों के लिए पाकिस्तानी जुनून बताता है कि उसने शायद कभी अपनी स्थिति की समीक्षा नहीं की है। यदि उसने ऐसा नहीं किया है तो उसका सामना विनाशकारी अचरज से होगा। भारत की मौजूदा सरकार परमाणु हथियारों को एक पक्ष के हित की बात नहीं समझती। यदि आपने इससे खेलने की कोशिश की और वह भी चुनाव पहले के हफ्तों में तो हो सकता है आपने अपनी खोपड़ी पर रखी बंदूक का ट्रिगर दबा दिया हो।(ये लेखक के अपने विचार हैं)