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संदर्भ/ ऊंचे जीडीपी का दावा पर वृद्धि किसी क्षेत्र में नहीं

Feb 20, 2019, 12:10 AM IST
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  • रक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को अपर्याप्त पैसा, योजनाएं लक्ष्य से बहुत पीछे

Dainik Bhaskar

Feb 20, 2019, 12:10 AM IST

‘अंतरिम बजट’ के छद्‌म वेश में ‘पूर्ण बजट’ स्वीकार हो गया। स्पीकर ने लोकसभा में संशोधनों पर बहस की अनुमति नहीं दी। इस कॉलम में मैं बजट की चर्चा कर चुका हूं लेकिन, अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गोयल द्वारा पेश बजट प्रस्तावों में कई और चिंताएं हैं, जिन्हें मैं दो (हां, आपने एकदम ठीक पढ़ा) मिनट के वक्त में उठा नहीं सका, जो स्पीकर ने मुझे बोलने के लिए दिए थे। यहां कुछ मुख्य चिंताओं की चर्चा :

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मौजूदा सरकार ने कई बार देश के सशस्त्र बलों का राजनीतिक नारेबाजी और मिथ्या प्रचार में इस्तेमाल किया है। बजट भाषण भी कोई अपवाद नहीं था, जिसमें एक युद्ध आधारित फिल्म का छौंक था। मेजें थपथपाने की ऊंची आवाज के साथ वित्त मंत्री ने घोषणा की कि रक्षा आवंटन पहली बार 3 लाख करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गया है। लेकिन, यह पिछले साल के 2.98 लाख करोड़ के आवंटन से मात्र 6.67 फीसदी ही अधिक है। पिछले साल का आवंटन देश के जीडीपी का 1.58 फीसदी था, जो 1962 के बाद से न्यूनतम रहा। यहां तक कि मौजूदा आवंटन (महंगाई को ध्यान में लेने के बाद) को भी कई रक्षा विशेषज्ञों ने सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए अपर्याप्त बताया है। वह भी उस समय जब एक वरिष्ठ जनरल ने उजागर किया है कि सेना के 68 फीसदी उपकरण ‘विंटेज’ श्रेणी के हैं। वित्त मंत्री ने यह दावा भी किया कि ‘वन रैंक वन पेंशन’ के मुद्‌दे पर न्याय देने वाली मोदी सरकार पहली है। लेकिन, इस योजना की विसंगतियां दूर करने के लिए सरकार द्वारा गठित जस्टिस रेड्‌डी समिति ने अक्टूबर 2016 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी पर उसे अभी प्रकाशित अथवा अमल में लाया जाना बाकी है।


स्वास्थ्य के लिए बजटीय आवंटन को लेकर वित्त मंत्री की कहानी कोई बेहतर नहीं है। 61,398.12 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण का बजट रक्षा के बजटीय आवंटन का पांचवां हिस्सा भर है। इसके बावजूद वह जीडीपी के 2.5 फीसदी से कम है, जो सरकार ने 2017 में जारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में तय किया था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान को सरकार ने जो आवंटन किया है उससे उपेक्षा साफ दिखती है। यह मिशन यूपीए की सफल कहानी का हिस्सा है, जिसने दस साल में गरीबों, हाशिये पर मौजूद तबकों व वंचितों को स्वास्थ्य सेवा देने में आमूल बदलाव ला दिया था। इस मिशन को 2018-19 के बजट की तुलना में सिर्फ 1,062 करोड़ रुपए अधिक दिए हैं। इससे तो मौजूदा महंगाई दर भी समायोजित नहीं हो पाएगी। मोदी सरकार के तहत कुल बजटीय आवंटन में नेशनल हेल्थ मिशन की हिस्सेदारी 2014-15 के 61 फीसदी से गिरकर 2019-20 में 49 फीसदी हो गई है।


बजट में महिला और बाल स्वास्थ्य के प्रति सरकार का तिरस्कार भी जाहिर हो गया, जिसके आवंटन में 2017-18 की तुलना में करीब 4,200 करोड़ रुपए की कटौती की गई है। 2012-13 में यूपीए ने अपने बजट का 4.76 फीसदी बच्चों से संबंधित योजनाओं के लिए दिया था, जबकि एनडीए के तहत यह 3.25 फीसदी रह गया है। वर्क फोर्स में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन देने के लिए यूपीए नेशनल क्रेश स्कीम लाई थी; भाजपा सरकार ने इसमें भी इस साल 61 फीसदी की कटौती की है। यहां तक कि इस सरकार के सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य कार्यक्रम आयुष्मान भारत पर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। रोगों की रोकथाम करने के उद्‌देश्य वाली इसकी शाखा हेल्थ व वेलनेस सेंटर को पृष्ठभूमि में डाल दिया गया है। सरकार के ही आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में ऐसे 15 हजार सेंटर स्थापित किए जाने थे, जबकि अभी केवल 8 हजार शुरू हो सके हैं। इस रफ्तार से तो 2022 तक जो 1.53 लाख सेंटर स्थापित करना है, उन्हें एक दशक से ज्यादा वक्त लग जाएगा। यही हाल आयुष्मान भारत की बीमा योजना का है।

इसे कुल आवंटन का 50 फीसदी मिला है पर यह फिर भी अपर्याप्त है। इसे 6,400 करोड़ रुपए दिए हैं पर यदि 1 फीसदी आबादी भी 5 लाख रुपए का वह फायदा मांगती है, जिसकी शेखी प्रधानमंत्री बघारते हैं तो आपको बजट में 50,000 करोड़ रुपए चाहिए। यह योजना हेल्थकेयर में निजी निवेश संबंधी है पर अपर्याप्त आवंटन देखते हुए कितना बीमा कंपनियों और कितना गरीब रोगियों को मिलेगा?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का हाल हम देख ही चुके हैं। इसमें बीमा कंपनियों ने 47,408 करोड़ रुपए किसानों से एकत्रित किए हैं, जबकि दावों के लिए भुगतान सिर्फ 31,613 करोड़ का है। इसी तरह की यूपीए की योजना में 10,560 करोड़ रुपए का प्रीमियम इकट्‌ठा किया गया था जबकि दावों पर भुगतान 28,564 करोड़ रुपए का था। इतना कहना पर्याप्त नहीं है कि इस सरकार के लिए शिक्षा प्राथमिकता नहीं है, क्योंकि आईआईएम को पिछले बजट की तुलना में आधे से भी कम पैसा मिला है और एनआईटी को कुछ भी नहीं मिला है। युवा बेरोजगारों के लिए भी अंतरिम बजट में कोई विशेष योजना नहीं है सिवाय नाकाम और खोखली कौशल विकास योजना के। इस साल जनवरी में प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना लक्ष्य से बहुत दूर रह गई। 2020 की इसकी समय सीमा के लिए सालभर से भी कम वक्त है और 1 करोड़ प्लेसमेंट के लक्ष्य में सिर्फ 10 लाख प्रशिक्षु जॉब हासिल कर पाए हैं। अचरज नहीं कि युवाओं के लिए ‘अच्छे दिन’ का वादा, घटते अवसरों में तब्दील हो गया है।


जहां तक सरकार के आशावादी वृद्धि के दावों की बात है, आमतौर पर इससे समझा जाता है कि उत्पादन, मुनाफा, वेतन, जॉब और निर्यात सब बढ़ रहे हैं। यहां तो इनमें से कुछ नहीं बढ़ रहा है और सरकार 8 फीसदी से ज्यादा जीडीपी वृद्धि की उम्मीद दिखा रही है। देश का बाहरी कर्ज 82 लाख करोड़ रुपए हैं, (सितंबर 2018 तक) जो सर्वकालिक ऊंचाई पर है। इसका उल्लेख बजट में नहीं किया गया। औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक दिसंबर 2018 में सिर्फ 0.5 फीसदी से बढ़ा था। यह और भी अचरज की बात है कि सरकार के समर्थक गोयल के कामधेनु बजट को लेकर इतने उत्साहित है। मैं तो उम्मीद ही कर सकता हूं कि काले धन के सरकार द्वारा लिए गए अनुमानों की तरह वित्तमंत्री ने अपना अर्थशास्त्र भी कहीं बाबा रामदेव से न लिया हो। यह भी हो सकता है कि यह वास्तव में पतंजलि बजट हो, जो गुणवत्ता की बजाय बाजार में हिस्सेदारी को ऊपर रखता हो?(ये लेखक के अपने विचार हैं)