संदर्भ / आतंक से लड़ने के लिए सहमति बनाए यूएन

  • संसद पर आतंकवादी हमले की बरसी और विघटनकारी ताकतों से निपटने का देश का संकल्प

एम. वेंकैया नायडू

Dec 12, 2018, 10:47 PM IST

आज जब हम 17 साल पहले हमारे जीवंत लोकतंत्र के मंदिर और लोगों की आकांक्षाओं के प्रतीक संसद पर हुए आतंकवादी हमले में हमारे सुरक्षाकर्मियों व अन्य लोगों द्वारा किए सर्वोच्च बलिदान को याद कर रहे हैं, तो हमें हमारी मातृभूमि के हर इंच को सुरक्षित बनाने का संकल्प मजबूत करना होगा। साथ ही हमें आतंकवाद के बढ़ते वैश्विक खतरे से लड़ने के लिए हमारे राजनयिक प्रयास भी बढ़ाने होंगे। मानवता को नुकसान पहुंचाने वाले इस अभिशाप के खिलाफ हमें अधिक शक्तिशाली गठबंधन तैयार करना होगा।

हमारे सुरक्षा बलों ने जिस बहादुरी से सांसदों और संसद की रक्षा की उसकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है। केवल 18 दिन पहले हमने उन 166 लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने मुंबई में हुए भयानक हमले में प्राण गंवाए थे। ये हमारे सामूहिक अवचेतन पर गहरे जख्म हैं। जहां भारत पिछले कई वर्षों से सीमा पार से जारी आतंकवाद के खिलाफ लड़ रहा है वहीं हाल के वर्षों में आतंकवाद की आग से दुनिया के कई देश झुलसे हैं। बहुत पहले 1996 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने कॉम्प्रेहेंसिव कन्वेंशन ऑन इंटरनेशनल टेरेरिज्म (सीसीआईटी) का प्रस्ताव रखा था। दुर्भाग्य से यह आज भी एक मसौदे के रूप में ही मौजूद है।

इस समझौते की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ने में यदि शब्दों व जुमलों के अर्थ आड़े आते हंै तो यह वाकई दुखद होगा। सारे देशों को सुरक्षा व गैर-जरूरी हिंसा के मौजूदा हालात पर गौर करना चाहिए, जो तरक्की के आड़े आ रही है। किसी भी परिस्थिति और स्वरूप में आतंकवाद का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। आतंकवादी तो आतंकवादी हैं और अच्छे-बुरे आतंकवाद की बात नहीं की जा सकती। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है- ‘दुनिया की मानवतावादी ताकतों को दबाव डालना होगा ताकि यह एकदम स्पष्ट हो जाए कि आतंकवाद क्या है।’ मुझे उम्मीद है कि सीसीआईटी जल्द साकार हो जाएगा।


भारतीय संसद और मुंबई के खौफनाक शैतानी हमलों ने भारतीयों के सामूहिक अवचेतन को झकझोर दिया था। उन्होंने सारी विभाजनकारी, उपद्रवी और विनाशकारी ताकतों से निपटने के हमारे संकल्प को मजबूत किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुंबई पुलिस और एनआईए ने सीमा पार तैयार की गई कुटिल साजिश का भंडाफोड़ करने का सराहनीय काम किया।

सरकारी अधिवक्ता उज्ज्वल निकम की कानूनी बुद्धमत्ता और मजबूत दलीलों व सबूतों ने मुख्य हमलावरों में से एक को फांसी के फंदे तक पहुंचाया। लेकिन, आतंक का क्रूर जाल और भी घातक हो रहा है। इसे खत्म करना ही होगा। इस घिनौने अध्याय के पीछे सक्रिय रहे मास्टरमाइंड अब भी गिरफ्त से बाहर हंै, जिन्हें कानून के कठघरे में लाना होगा। हम आतंकवाद को अंजाम देने वाले दोषियों को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। दुनिया को इस अप्रिय वास्तविकता के खिलाफ तेजी से प्रभावी उपाय खोजना होगा। घरेलू स्तर पर हमें सारे मोर्चों पर हमारे सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना होगा, जिसमें समुद्री व तटवर्ती सुरक्षा भी शामिल है।


दुनिया को विषाक्त सोच वाले तथा मानव जीवन व मानव अधिकार के लिए जरा भी सम्मान न रखने वाले मुट्‌ठीभर लोगों को बंधक नहीं बनाया जा सकता। यह एक विडंबना ही है खासतौर पर भारतीय संदर्भ में कि कुछ लोग मानवाधिकारों की आड़ में आतंकवाद के हित में काम कर रहे हैं। एक राष्ट्र के रूप में हमें एकजुट होकर खड़े होना होगा और वैश्विक समुदाय के हिस्से के बतौर हर देश को खड़े होना होगा और जरूरत हो तो इस लड़ाई में शामिल होना होगा। हम जिसका सामना कर रहे हैं वो सभी का साझा शत्रु है। केवल समन्वित रणनीति ही काम देगी। भारत में हमें ऐसी ताकतों से निपटने के हमारे संकल्प को मजबूत करना होगा खासतौर पर उन ताकतों से जो सीमा पार से भीतर-बाहर आतंकवाद को बढ़ावा देती हैं।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आतंकवादी घटनाओं को भी धार्मिक रंग देने के प्रयास होते हैं। कोई धर्म अमानवीय आतंकी कार्रवाइयों को मान्यता नहीं देता। हिंसा और लोगों की जान लेने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का औचित्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। गलत सूचनाओं पर आधारित दृष्टिकोण और पथभ्रष्ट लोगों और आंख मूंदकर मानव विरोधी विश्वदृष्टि पर चलने का बल के न्यायपूर्ण उपयोग के साथ संवाद के जरिये मुकाबला किया जाना चाहिए। जब भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की कगार पर है और कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, तो हम अपनी ऊर्जा व संसाधन ऐसे मुद्‌दों पर बर्बाद नहीं कर सकते, जो हमारे विकास के लक्ष्यों में योगदान नहीं देते।
हमारा सामूहिक फोकस हमारे लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने पर होना चाहिए और जो कृत्य हमें भटकाता है, ऐसी ताकत जो विनाश लाती है या मौत व दुश्वारियों का अंतहीन सिलसिला छोड़ती है या ऐसा देश जो आतंकी गतिविधियों को मदद व बढ़ावा देता है, उनसे दृढ़ता से निपटना होगा।


आखिर में अपने सुरक्षा बलों के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। 17 साल पहले इस दिन छह सुरक्षाकर्मियों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। कई आतंकी घटनाओं ने भारी जानी नुकसान पहुंचाया है और पहुंचा रही हैं। हमारे बहादुर सैनिक कठिनतम परिस्थितियों में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। हमारे पुलिसकर्मी हमारे जीवन और संपत्ति की रक्षा कर रहे हैं और अर्द्धसैनिक बल बहादुरी से हमलावरों, आतंकियों और असामाजिक तत्वों का मुकाबला कर रहे हैं। वे प्रशंसा के हकदार हैं। कर्तव्य के प्रति उनका निस्वार्थ समर्पण और देश व देशवासियों की सुरक्षा के लिए अविचल प्रतिबद्धता वाकई ऐसी बात है, जो हम सभी को प्रेरित करती है। हमारी विकास की कहानी के लिए सही मौहाल बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को हमें कम करके नहीं आंकना चाहिए।


आइए, आज उन बहादुरों को श्रद्धांजलि देने के पवित्र अवसर पर हम खुद को आगे मौजूद चुनौती याद दिलाएं। हम पूरी स्पष्टता व दृढ़ता के साथ मार्ग में आने वाली आतंकवाद जैसी नकारात्मक ताकतों से मुकाबला करते हुए समावेशी प्रगति व विकास के मार्ग पर आगे बढ़ें। हमें लोककल्याण और सौहार्दपूर्ण दुनिया बनाने के अपने लक्ष्यों की दिशा में सतत प्रयास करने होंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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