इकोनॉमी / सुधारों से वैश्विक जोखिम को दे सकेंगे मात

  • 2019 में इकोनॉमी की क्या होगी दशा और दिशा, बता रहे हैं विशेषज्ञ
  • भारत के सामने दुनियाभर में संरक्षणवादी नीतियों, धीमी वैश्विक वृद्धि दर और लगातार बढ़ती ब्याज दरों की चुनौती रहेगी

Dainik Bhaskar

Jan 01, 2019, 11:08 PM IST

बीता साल भारत के लिए नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) तथा दिवालिया कानून जैसे सुधारों के असर से उबरने और सामान्य वृद्धि का साल था। अर्थव्यवस्था में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बावजूद महंगाई कम रही। अब 2018-19 में 7.4 की जीडीपी वृद्धि और उपभोक्ता वस्तुओं में 3.7 फीसदी की सामान्य महंगाई रहने की अपेक्षा है।

वैश्विक स्तर पर वृद्धि में गिरावट आई, जबकि व्यापार के मोर्चे पर उथल-पुथल दिखी। अमेरिका की मौद्रिक नीति कड़ी होने लगी और यूरोपीय केंद्रीय बैंक 2019 में क्रमश: कड़ाई के दौर के लिए तैयार होने लगा। अमेरिका में ब्याज दरों के बढ़ने का मतलब है उभरते बाजारों के बॉन्ड मार्केट में बड़े पैमाने पर बिक्री। इससे चालू खाते में घाटे का सामना कर रहे देशों की मुद्रा एकदम से कमजोर हो गई। भारत पर भी असर पड़ा और डॉलर की तुलना में रुपए का काफी अवमूल्यन हुआ।


मुद्रा की कहानी बीते साल की अंतिम तिमाही में बदलनी शुरू हुई, जब तेल कीमतें एकदम से नीचे आ गईं और अमेरिका की मौद्रिक नीति की आक्रामकता घटी, क्योंकि अमेरिकी वृद्धि की रफ्तार को बनाए रखने की चिंता उभरने लगी। नतीजे में रुपए ने वापसी की।


मोटेतौर पर भारत में घरेलू कारकों से चलने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था से हुए एकीकरण के कारण अब वैश्विक कारकों का महत्व बढ़ा है। इसलिए भारत की वृद्धि बाहरी व भीतरी कारकों के मिश्रण पर निर्भर रहेगी। चूंकि बाहरी वातावरण मोटेतौर पर अनुकूल नहीं रहेगा, 2019-20 में और उससे आगे जहां तक नज़र जाती है, भारत की आर्थिक वृद्धि का ग्राफ घरेलू कारकों से तय होगा। तीन ऐसे वैश्विक कारक हैं, जो भारत के लिए जोखिम होंगे।


धीमी पड़ती वैश्विक वृद्धि: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक पिछले तीन वर्षों (2016-18) में वैश्विक वृद्धि का औसत 3.7% रहा। 2019 में वैश्विक वृद्धि 3.7% और अगले पांच वर्षों तक 3.6% प्रतिवर्ष रहने की अपेक्षा है। वैश्विक वित्तीय संकट के पहले की अवधि (2003-07) की विश्व अर्थव्यवस्था के दौरान 5.1% सालाना वृद्धि की तुलना में यह बहुत कम है।


संरक्षणवादी नीतियां: बढ़ता संरक्षणवाद वैश्विक व्यापार व वृद्धि के लिए खतरा है और इसके भारत के लिए भी अपने नतीजे हैं। भूतकाल में एशिया के कई देश अपनी अर्थव्यवस्था को इसलिए बढ़ा सकें, क्योंकि व्यापार के लिए बढ़ते खुलेपन के साथ उनकी अर्थव्यवस्था को निर्यात की ताकत मिली। अब उसकी जगह संरक्षणवादी नीतियां ले रही हैं। यानी अपनी आर्थिक वृद्धि के लिए वैश्विक वृद्धि व व्यापार पर निर्भर रहने के अवसरों में कमी। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं- अमेरिका-चीन 2018 के लगभग पूरे उत्तरार्ध में व्यापार युद्ध लड़ते रहे।


बढ़ती ब्याज दरें: अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने 2018 में ब्याज दरें चार गुना बढ़ा दीं। 2019 में यूरोपीय संघ भी मौद्रिक नीति कड़ी करेगा। इससे विकसित देशों की आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ जाएगी। यदि दरों में वृद्धि अपेक्षा से तेज हुई तो इससे उभरते बाजारों में बिकवाली शुरू हो जाएगी और उनकी मुद्राएं कमजोर होंगी। भारत को इन वैश्विक हलचलों से आने वाले तूफान का न सिर्फ सामना करना पड़ेगा बल्कि आर्थिक वृद्धि का ग्राफ भी ऊंचा रखना पड़ेगा।


अपेक्षा है कि 2019-20 में भारतीय अर्थव्यवस्था 7-7.5 की दर से बढ़ेगी। एक स्थिर राजनीतिक जनादेश, सामान्य तेल कीमतें व लगभग सामान्य मानसून और मौद्रिक नीति से कुछ सहारा हमारी अर्थव्यवस्था को इस रेंज के ऊपर हिस्से में ले जा सकता है। हाल ही में दरें घटाए जाने और जीएसटी नियमों को आसान बनाने से भी 2019 में वृद्धि को सहारा मिलेगा। अर्थव्यवस्था को एक घरेलू जोखिम मानसून से रहेगा। लगातार चार सामान्य मानसून मिलना दुर्लभ होता है। तीन साल सामान्य मानसून रहा है तो यह इस साल गच्चा भी दे सकता है।

द मेट्रोलॉजिक ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएमओ) का अनुमान है कि दिसंबर 2018 और फरवरी 2019 के बीच पूर्ण अल नीनो इफेक्ट के 75-80 फीसदी अवसर हैं और इसके अप्रैल 2019 तक जारी रहने के 60 फीसदी अवसर हैं। इससे 2019 में सामान्य से कमजोर मानसून रहेगा।

कच्चे तेल की कम कीमतें भारत के लिए वरदान हैं, जिसका मतलब है चालू खाता सुरक्षित जोन में रहेगा और रुपए को ताकत देगा। चूंकि विश्व अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है तो लगता नहीं कि तेल कीमतों में कोई बुनियादी वृद्धि होगी। हालांकि, भू-राजनीतिक कारक खेल बिगाड़ सकते हैं। क्षमता के उपयोग में सुधार होने के कारण निजी निवेश की वापसी लायक स्थिति बन रही है। बंटा हुआ जनादेश सुधार प्रक्रिया में देरी लाने के साथ निजी कॉर्पोरेट निवेश चक्र को मोड़ सकता है। यदि तेल कीमतें बढ़ीं, आम चुनाव में जनादेश बंटा हुआ आया और मानसून कमजोर रहा तो 2019-20 में जीडीपी करीब 7% रहेगी।


सरकारी बैंकों की सफाई जारी है और गैर-बैंक वित्त निगमों से कर्ज भी धीमा पड़ा है। चाहे हमें उम्मीद है कि 2019 से एनपीए घटना शुरू होगा, पर सार्वजनिक बैकों के कर्ज देने में आक्रामक रहने की संभावना नहीं है। महंगाई के मौजूदा स्तर से ऊपर जाने की संभावना है लेकिन, यह आरबीआई के कंफर्ट जोन में ही रहेगी। संभावना है कि आगामी मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में आरबीआई ‘सोची-समझी कड़ाई’ से बदलकर ‘न्यूट्रल’ रुख अपनाएगी। 2019 में रेपो रेट में कटौती के अवसर में सुधार दिखाई देते हैं।

मध्यावधि दृष्टिकोण से भारत कार्यक्षमता बढ़ाने वाले घरेलू सुधारों से कुछ वैश्विक कारकों को बेअसर कर सकता है। अगले दो वर्षों तक जीएसटी, दिवालिया कानून, वित्तीय समावेश, डिजिटाइजेशन, बुनियादी ढांचे के विकास पर फोकस और बिज़नेस करने की आसानी बढ़ने के फायदे मिलने लगेंगे। लेकिन, ये सुधार सतत जारी रहने वाली चीज है और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत रहेगी। 2019 के चुनाव में स्थिरता के हित में आए जनादेश से ऐसा करना आसान रहेगा। लेखक धर्मकीर्ति जोशी, चीफ इकोनॉमिस्ट, क्रिसिल (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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