मैनेजमेंट फंडा / क्यूबिकल भी बदलने को तैयार दिल की सुनने वाले!

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Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 11:12 PM IST

हमारे बीच कुछ ऐसे युवा हैं, जो एमबीए और सिविल इंजीनियरिंग करके और यहां तक कि एक अच्छी नौकरी के बाद भी अपने सपनों का पीछा नहीं छोड़ते। दिलचस्प बात यह है कि ऐसा करने में पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा जोखिम ले रही हैं। हो सकता है कि इसके पीछे उनके परिवार के पुरुष की भूमिका रही हो, क्योंकि कुछ मामलों में वे ज्यादा मददगार होते हैं। कुछ उदाहरणों से समझते हैं।


कहानी 1: हम सभी हाथ से बने ऐसे खूबसूरत बर्थडे कार्ड सहेजकर रखते हैं, जो बरसों पहले हमारे बच्चों ने दिए थे। आयुषी शर्मा भी उन्हीं बच्चों में से है, जिसने अपने पैरेंट्स और दोस्तों के लिए ऐसा ही कुछ किया था। लेकिन, जब वह बड़ी हुईं तो, उसकी पढ़ाई और एमबीए ने उसका वक्त चुरा लिया और उसे हैदराबाद शिफ्ट होना पड़ा। फिर एक ही जैसे काम ने उसके अंदर ऊब-सी भर दी थी। फिर उसने बहुत से सॉफ्टवेयर चलाने सीखे, अपनी बचपन की स्किल को डूडल्स बनाने के लिए निखारा, क्योंकि नई पीढ़ी को डूडल्स बहुत भाते हैं। उसने दूसरों के लिए वैसे ही कार्ड बनाने की सोची, जो वह बचपन में बनाती थी, लेकिन इस बार उसके दिमाग में बिज़नेस भी था। और इस तरह 2014 में जन्मी ‘कार्डकार्ट डिज़ाइंस’ और आज 24 की उम्र में, उसका डिज़ाइन पोर्टफोलियो दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। वह कई एनजीओ के लिए डिज़ाइन कन्सलटेंट भी हैं और इनमें यूनाइटेड वे हैदराबाद और पुलेला गोपीचंद व अभिनव बिंद्रा द्वारा संचालित ईएलएमएस स्पोर्ट्स फाउंटेन भी है। किसी भी कम्पनी के साथ काम करने से पहले आयुषी बहुत रिसर्च करती है। वह अपने क्लाइंट को किसी भी तरह की सलाह देने से पहले उनके सौंदर्य बोध की समझ को भी परखती हैं। इसके अतिरिक्त वह ऑर्डर पर अलग-अलग तरह की कई सेवाएं जैसे कॉर्पोरेट गिफ्ट, डूडल्स, कैरिकेचर, कार्ड और इलस्ट्रेशन भी उपलब्ध कराती हैं। अब वह डूडल्स पर एक किताब लिखने की तैयारी में है।


कहानी 2: बीके भव्या ने अपने पिता को खुश करने के लिए सिविल इंजीनियरिंग की और कुछ ही समय बाद वह अपने परिवार के इंडस्ट्रियल-प्रोजेक्ट्स के बिज़नेस से जुड़ी। लेकिन उसकी रुचि खासतौर पर सब्जियां उगाने और पौधों को फलते-फूलते देखने में रही है। इसीलिए, दिल की सुनते हुए उसने सबसे पहले बेंगलुरू से दूर, लीज पर जमीन लेकर खेती शुरू की। वह स्वयं वहां रहने लगी और एक पॉली हॉउस बनाया, जिसमें सजावटी और इनडोर प्लांट्स उगाए। उसने ‘पॉट ग्रीन्स’ मॉडल बनाकर लोगों को सिर्फ 20 रुपए में एक गमला देने लगी। ग्राहक हफ्तेभर तक इस गमले में उगी सब्जी का इस्तेमाल करते और उसे अगले हफ्ते लौटा देते। लेकिन फिर ग्राहकों ने शिकायत की कि सब्जी की मात्रा कम है। भव्या ने अपने पिता की जमीन पर दो एकड़ का खेत तैयार किया जहां से वह काम आगे बढ़ा रही हैं।


छह महीने के लिए उन्होंने ग्रीन फार्मिंग की सबसे अच्छी तकनीक और प्रोफेशनल एग्री एक्सपर्ट से मिट्‌टी-कोको पीट-खाद का सही मिश्रण बनाना और इस्तेमाल करना सीखा। उसके दो एकड़ के खेत में एक हिस्सा हरी सब्जियों के लिए सुरक्षित है और उसने पौधों को सूरज की तीखी धूप से बचाने के लिए शेड की व्यवस्था भी की है। गर्मी के इन्हीं दिनों में जब हर एक अपार्टमेन्ट के सामने उसकी कार का बूट खुलता है तो उसमें से मेहनत की हरियाली झांकती है। अब वह हर महीने कई घरों के दरवाजों तक 300 किलोग्राम हरी सब्जियों की आपूर्ति कर रही हैं। खेत में उगी सब्जियों को ग्राहक तक पहुंचाने के लिए उसे सिर्फ दो घंटे का समय लगता है। लोगों को उनकी पहुंचाई सब्जियां बेहद पसंद आती हैं, क्योंकि उनमें कुछ भी नकली नहीं है और उनका कुदरती हरा रंग वाकई असली है।

फंडा यह है कि नई पीढ़ी सही समय पर अपने दिल की सुनकर और मनचाहा काम करके बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अपना क्यूबिकल (पद) बदलने के लिए भी तैयार हैं।

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