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आस्था/ गया का विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला शुरू, 17 दिनों तक चलने वाले मेले में लाखों लोग होंगे शामिल



Dainik Bhaskar | Sep 24, 2018, 01:30 PM IST

रिलिजन डेस्क. गया का विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला शुरू हो गया है जो 17 दिन तक चलेगा। देश-विदेश से हजारों की संख्या में पिंड दानी मोक्षधाम पहुंचने लगे हैं। इन दिनों के लिए पितृ हमारे घर में रहेंगे और तर्पण के माध्यम से तृप्त होंगे। आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की अवधि को पितृपक्ष माना जाता है। वैदिक परंपरा और हिंदू मान्यताओं के अनुसार पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना एक महान और उत्कृष्ट कार्य है। मान्यता के मुताबिक पुत्र का पुत्रत्व तभी सार्थक माना जाता है, जब वह अपने जीवन काल में जीवित माता-पिता की सेवा करे और उनके मरणोपरांत उनकी मृत्यु तिथि (बरसी) तथा महालय (पितृपक्ष) में उनका विधिवत श्राद्ध करे। 

पितृपक्ष से जुड़ी खास बातें

  1. क्या है पितृपक्ष?

    पितृ पक्ष अपने कुल, परंपरा और पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों को याद करने और उनके पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेने का समय है।

     

    इसमें व्यक्ति का पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया ‘तर्पण’ यानी जलदान और ‘पिंडदान’ यानी भोजन का दान श्राद्ध कहलाता है।

  2. गया में पिंडदान से मिलता है मोक्ष

    बिहार के गया को पिंडदान के लिए सबसे पवित्र भूमि माना गया है। यहां श्राद्ध व तर्पण से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। 

     

    पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम जब लंका विजय के बाद माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्पक विमान से अयोध्या के लिए लौट रहे थे तब गया के पहाड़ी की एक चोटी (जिसे आज राम सीता पर्वत कहा जाता है) पर वे विश्राम के लिए रुके थे।  उसी समय पहाड़ से राजा दशरथ का हाथ निकला था और आवाज आई थी कि बेटा तुम गया कि पवित्र भूमि पर हो मेरा पिंडदान कर दो जिससे मुझे मोक्ष मिल सके। भगवान राम ने उसी पर्वत पर पिता का पिंडदान किया था।

  3. क्या है मोक्ष?

    हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार मौत के बाद भी इंसान की आत्मा भौतिकवादी दुनिया में रहती है। मौत के बाद शरीर तो नष्ट हो जाता है, लेकिन लोग अपने आप को दुनिया से अलग नहीं कर पाते। 

     

    परिवार और दोस्तों के प्रति दया और प्यार के चलते आत्मा उनसे जुड़ी रह जाती है। भौतिकवादी दुनिया से इस लगाव के चलते आत्मा अंतिम प्रस्थान नहीं कर पाती, जिसके चलते आत्मा को कई तरह के कष्ट भोगने पड़ते हैं। वह इनसे मुक्ति तो पाना चाहता है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।  वे अपने आप को भौतिकवादी दुनिया से अलग नहीं कर पाते। हिंदू मान्यता के अनुसार पिंड दान से आत्मा को अंतिम राहत मिलती है और परम शांति (मोक्ष) के लिए आत्मा के प्रस्थान का मार्ग बनता है।

  4. कैसे करें श्राद्ध?

    पहले यम के प्रतीक कौआ, कुत्ते और गाय का अंश निकालें (इसमें भोजन की समस्त सामग्री में से कुछ अंश डालें)

     

    फिर किसी पात्र में दूध, जल, तिल और पुष्प लें। कुश और काले तिलों के साथ तीन बार तर्पण करें। ऊं पितृदेवताभ्यो नम: पढ़ते रहें। बाएं हाथ में जल का पात्र लें और दाएं हाथ के अंगूठे को पृथ्वी की तरफ करते हुए उस पर जल डालते हुए तर्पण करते रहें। वस्त्रादि जो भी आप चाहें पितरों के निमित निकाल कर दान कर सकते हैं।
     

  5. गयासुर के शरीर से बनी गया

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भस्मासुर के वंश में गयासुर नामक राक्षस ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान मांगा था कि उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाए और लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाएं। 

     

    इस वरदान के मिलने के बाद स्वर्ग में अधर्मियों की जनसंख्या बढ़ने लगी। इससे बचने के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र स्थल की मांग की। गयासुर ने अपना शरीर देवताओं को यज्ञ के लिए दे दिया।  यज्ञ के बाद गयासुर लेटा तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया। यही जगह आगे चलकर गया बनी। गयासुर ने देवताओं से वरदान मांगा कि यह स्थान लोगों को तारने वाला बना रहे।  जो भी लोग यहां पर किसी का तर्पण करने की इच्छा से पिंडदान करें, उन्हें मुक्ति मिले। यही कारण है कि आज भी लोग अपने पितरों को तारने के लिए पिंडदान के लिए गया आते हैं। 

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