व्रत / रमा एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मीजी भी होती है प्रसन्न

दीपावली से 4 दिन पहले पड़ने से इसे लक्ष्मीजी के नाम पर रमा एकादशी कहा गया

Dainik Bhaskar

Oct 22, 2019, 03:07 PM IST

रिलिजन डेस्क.कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत किया जाता है। दीपावली के चार दिन पहले आने वाली इस एकादशी को लक्ष्मी जी के नाम पर रमा एकादशी कहा जाता है। इसके प्रभाव से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी दूर हो जाते हैं। इस दिन विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा कर के नैवेद्य अर्पण किया जाता है और आरती कर के प्रसाद बांटा जाता है।इस बार यह एकादशी 23 नवंबर को है। मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए यह व्रत सुख और सौभाग्यप्रद माना गया है।

  • व्रत और पूजा की विधि

रमा एकादशी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत करने के लिए संकल्प लें। जिस प्रकार आप व्रत कर सकते हैं, उसी के अनुसार संकल्प लें, जैसे- यदि पूरा दिन निराहार रहना चाहते या फिर एक समय फलाहार करना चाहते हैं। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार पूजा करें। यदि आप स्वयं पूजा नहीं कर सकते तो किसी योग्य ब्राह्मण को पूजा के लिए बुलाएं। फिर भगवान को भोग लगाएं व प्रसाद भक्तों को बांट दें।

इसी प्रकार शाम को भी भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी की पूजा करें। रात के समय भगवान की मूर्ति के पास बैठकर श्रीमद्भागवत या गीता का पाठ करें। अगले दिन ब्राह्मणों को आमंत्रित करें। ब्राह्मणों को भोजन करवा कर, दान-दक्षिणा देकर ससम्मान विदा करें। उसके बाद ही भोजन ग्रहण करें। भगवान को माखन और मिश्री का भोग लगाएं तो अति उत्तम रहेगा।

  • व्रत की कथा श्रीपद्म पुराण के अनुसार

प्राचीन समय में मुचुकुंद नाम के एक राजा थे। जिनकी मित्रता देवराज इंद्र, यम, वरुण, कुबेर एवं विभीषण से थी। वह बड़े धार्मिक प्रवृति वाले व सत्यप्रतिज्ञ थे। उनके राज्य में सभी सुखी थे। उनकी चंद्रभागा नाम की एक पुत्री थी, जिसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक दिन शोभन अपने श्वसुर के घर आया तो संयोगवश उस दिन एकादशी थी। शोभन ने एकादशी का व्रत करने का निश्चय किया। चंद्रभागा को यह चिंता हुई कि उसका पति भूख कैसे सहन करेगा? इस विषय में उसके पिता के आदेश बहुत सख्त थे। राज्य में सभी एकादशी का व्रत रखते थे और कोई अन्न का सेवन नहीं करता था। शोभन ने अपनी पत्नी से कोई ऐसा उपाय जानना चाहा, जिससे उसका व्रत भी पूर्ण हो जाए और उसे कोई कष्ट भी न हो, लेकिन चंद्रभागा उसे ऐसा कोई उपाय न सूझा सकी। निरूपाय होकर शोभन ने स्वयं को भाग्य के भरोसे छोड़कर व्रत रख लिया। लेकिन वह भूख, प्यास सहन न कर सका और उसकी मृत्यु हो गई। इससे चंद्रभागा बहुत दु:खी हुई। पिता के विरोध के कारण वह सती नहीं हुई।

उधर शोभन ने रमा एकादशी व्रत के प्रभाव से मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक उत्तम देवनगर प्राप्त किया। वहां ऐश्वर्य के समस्त साधन उपलब्ध थे। गंधर्वगण उसकी स्तुति करते थे और अप्सराएं उसकी सेवा में लगी रहती थीं। एक दिन जब राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पर आए तो उन्होंने अपने दामाद का वैभव देखा। वापस अपनी नगरी आकर उसने चंद्रभागा को पूरा हाल सुनाया तो वह अत्यंत प्रसन्न हुई। वह अपने पति के पास चली गई और अपनी भक्ति और रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन के साथ सुखपूर्वक रहने लगी।

  • रमा एकादशी शुभ मुहूर्त

रमा एकादशी तिथि प्रारम्भ: 24 अक्टूबर को रात 01:10 बजे

रमा एकादशी तिथि समाप्त: 24 अक्टूबर को रात 10:20 बजे

रमा एकादशी पारण समय : 25 अक्टूबर को सुबह 06:40 से 08:40 बजे तक

  • रमा एकादशी का महत्व

पुराणों के अनुसार रमा एकादशी व्रत कामधेनु और चिंतामणि के समान फल देती है। ये व्रत करने से समृद्धि और संपन्नता बढ़ती है। इस व्रत को करने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं। पद्म पुराण के अनुसार रमा एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है। जिसके प्रभाव से हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। मृत्यु के बाद विष्णु लाेक की प्राप्ति होती है।

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