संघर्ष की कहानी / दोहरा शतक लगा रिकॉर्ड बनाने वाले यशस्वी के पिता बोले- लोग कहते थे बेटे के पीछे बाप पागल हो गया

  • 17 साल के यशस्वी ने विजय हजारे ट्रॉफी में दोहरा शतक लगाया, ये कारनामा करने वाले वो सबसे कम उम्र के क्रिकेटर हैं
  • उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में रहता है यशस्वी का परिवार, मां बोलीं- कभी उसके लिए एक खिलौना नहीं खरीदा

Dainik Bhaskar

Oct 23, 2019, 06:13 AM IST

भदोही. उत्तर प्रदेश का भदोही जिला आजकल चर्चा में है। इसकी वजह है क्रिकेटर यशस्वी जायसवाल, जिन्होंने विजय हजारे ट्रॉफी में सबसे कम उम्र में दोहरा शतक लगाया। यशस्वीयही के सुरियावां नगर में रहतेहैं।दैनिक भास्कर APPसे यशस्वी के पिता भूपेंद्र और मां कंचन ने बेटे के संघर्षो को लेकर विस्तार से बातचीत की।

पेंट की दुकान चलाते हैं पिता
यशस्वी के पिता भूपेंद्र आज भी भदोही मेंपेंट की छोटी सी दुकान चलातेहैं। पिता कहते हैं, 'बेटे ने मेरा सपना पूरा कर दिया। जो लोग मुझे पागल कहते थे वो आज साथ में फोटो खिंचवाते हैं। जो कहते थे कि बेटे के पीछे बर्बाद हो जाओगे, आज वही लोग पेपर हाथों में लेकर आते हैं। फक्र से कहते हैं, मोंटी (यशस्वी का घर का नाम) हमारा बच्चा है।'

यूं मुंबई पहुंचा यशस्वी
बचपन से ही यशस्वी में क्रिकेटर बनने का जुनून था। 10 साल की उम्र मेंउसने पिता से मुंबई जाने की जिद की। पिता भी बेटे की प्रतिभा को समझ रहे थे। इसलिए, उन्होंने उसे नहीं रोका। मुंबई के वर्ली इलाके में रहने वाले एक रिश्तेदार संतोष के यहां यशस्वी को भेज दिया। यशस्वी 5-6 महीना वहीं रहे। वह यहां से आजाद मैदान में प्रैक्टिस करने जाते थे। लेकिन, रिश्तेदार का घर छोटा था। इतनी जगह नहीं थी वहां लंबे समय तक रह पाते।

पिता बताते हैं, 'आजाद मैदान में कई महीने उसे ग्राउंड के बाहर ही दूसरे बच्चों के साथ खेलना पड़ा। नेट तक नहीं पहुंच पाया।' इसके बाद रिश्तेदारसंतोष यशस्वी को आजाद ग्राउंड ले गए। वहां पर उनका एक परिचित ग्राउंडमैन सुलेमान था। उनसे बात करके यशस्वी को वहीं पर रहने की व्यवस्था करवाई। यहां करीब तीन साल तक यशस्वी टेंट में रहा और क्रिकेट की बारीकियां सीखीं।'

'मैंने बुलाया, लेकिन बोला-पापा नहीं आऊंगा'
पिता कहते हैं कि उन तीन सालों में उसने बहुत संघर्ष किया। जमीन पर सोता था कीड़े और चींटी काटते थे। फोन करके कहता था-पापा बहुत चींटी काटती है। मैंने कहा- बेटा तकलीफ बहुत है। वापस आ जाओ। लेकिन, उसने कहा- पापा बूट पालिश कर लूंगा। लेकिन, मैं बिना कुछ बने वापस नहीं आऊंगा। ये तकलीफें पापा मुझे एक दिन आगे बढ़ाएंगी। आप परिवार का ख्याल रखिए।

गोलगप्पे बेचे, दूध की दुकान पर सफाई की

पिता भूपेंद्र बताते हैं कि मुंबई में यशस्वी नेआजाद मैदान के बाहरगोलगप्पे की दुकान पर काम किया। एक दूध वाले के यहां भी काम किया। वहां सफाई करने के एवज में उसे रोजाना 20 रुपए मिलते थे। वहां 4-5 महीने काम किया। उस दुधवाले ने काम से यह कहकर यशस्वी को निकाल दिया कि सिर्फ खेलता और सोता है। मैं यहां से 2000 रुपए भेजता हूं। लेकिन, अब वक्त काफी कुछ बदल गया। अब यशस्वी का कंपनियों से एक करोड़ रुपए का कांट्रैक्ट हो चुका है।'

मां बोलीं-कभी उसके लिए एक खिलौना नहीं खरीदा
बेटे की उपलब्धि से खुश मां कहती हैं, 'कभी उसके लिए (यशस्वी) एक खिलौना नहीं खरीदा। एक साल कि उम्र थी तब पापा के साथ रुम में बैट-बॉल खेला करता था। उसकी जिद्द से हारकर मुंबई भेजा। बहुत सी तकलीफों को बताता भी नहीं था। चीटियां काटकर आंख और चेहरा फुला देती थीं। जिसने उसे ताना दिया उसका मुंह बेटे ने बंद कर दिया।

एक मुलाकात और बदली तकदीर
पिता के मुताबिक, 'यशस्वी 13 साल की उम्र में अंजुमन ए इस्लामिया की टीम से आजाद ग्राउंड पर लीग खेल रहा था। इस दौरान ज्वाला सर आए, उनकी शांताक्रूज में एकेडमी है। वह यशस्वी के खेल से प्रभावित हुए। उन्होंने उनसे पूछा-कोच कौन है तुम्हारा? उसने जवाब दिया कोई नहीं। यशस्वी ने कहा कि मैं बड़ों को देखकर सीखता हूं।' उन्होंने बताया कि इसके बाद ज्वाला सर ने मुझसे बात की। दो दिन बाद वह यशस्वी को अपनी एकेडमी ले गए। यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट था।


सचिन तेंदुलकर ने घर बुलाकार बैट गिफ्ट किया
पिता कहते हैं, 'अप्रैल 2019 में बेटी की शादी हुई थी, तब यशस्वी ने काफी मदद की। ज्वैलरी का खर्च उठाया। मेरे लिए जींस, कोट और मां के लिए साड़ी और भाई के लिए कपड़े लाया था।' वह बताते हैं कि कुछ दिन पहले मुंबई में सचिन तेंदुलकर ने यशस्वी को घर बुलाकर 40 मिनट तक मुलाकात की।इस दौरान उन्होंने यशस्वी को बैट गिफ्ट किया और टिप्स भी दी।

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