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एक फैक्ट्री ने दी थी यहां मौत को दावत, 28 साल बाद भी ताजे हैं जख्म

8 वर्ष पहले
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देश की राजधानी भोपाल में गैस त्रासदी को हुए भले ही 29 वर्ष होने वाले हों, लेकिन उसके कुप्रभाव अब भी लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहे हैं। संयंत्र परिसर व आसपास जमा जहरीले कचरे से प्रभावित भूमिगत पानी का दायरा साल-दर-साल बढ़ता ही जा रहा है। इस गैस से मिले घाव अब भी भर नहीं पाए हैं।

संयंत्र परिसर व उसके आसपास जमा जहरीला कचरा आबोहवा से लेकर भूमिगत जल को भी प्रदूषित कर रहा है। हजारों गैस पीड़ित आज भी गुनहगारों को सजा मिलने का इंतजार कर रहे हैं…

भोपाल. दो-तीन दिसंबर1984 की दरमियानी रात विश्व की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदी झेलने वाली पुराने शहर की करीब दो दर्जन बस्तियों के लोग आज भी इस हादसे के दंश से उबर नहीं पाए हैं। इनका न तो आर्थिक रूप से पुनर्वास हो पाया और न सामाजिक। मामूली रूप से आंशिक गैस पीड़ित मानकर दिए गए मुआवजे को लेकर भी लोगों में खासा गुस्सा है।

पीड़ित बस्तियों में लोग कई बीमारियों से ग्रस्त हैं। श्वास लेने में तकलीफ, सीने में जलन, आंखों में दर्द, बच्चों में अपंगता जैसे कई मामले आज भी इस हादसे का जीता जागता उदाहरण हैं।हादसे के 28 साल के बाद भी गैस पीड़ित इलाकों के लोगों को न तो पीने का साफ पानी मिल रहा है और न ही पर्याप्त इलाज की सुविधा। अस्पताल भवनों के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन गैस पीड़ितों की मानें तो ये केवल दिखावे के लिए हैं।

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