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जज्बे को सलामः 21 साल की उम्र में जीत लिए 186 मेडल

8 वर्ष पहले
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परिवार में बहनें बेहतर दोस्त होती हैं, लेकिन मेरी बहन तो फरिश्ता है। इसलिए इस वुमन डे पर मैं अपनी बहन पूजा चौरसिया का नाम नॉमिनेट करना चाहता हूं। जो इंटरनेशनल टाइटल जीतने वाली पहली भारतीय महिला ट्रायएथलीट है। पूजा के खेल सफर की शुरुआत सन 2002 में स्वीमिंग से हुई। उस समय उसकी उम्र मात्र 9 साल थी। बचपन से ही पूजा का सपना गोल्ड मेडल जीतने का था। उसके जुनून और प्रयासों को देखते हुए इंडियन ट्रायथलान फेडरेशन (आईटीएफ) ने उसे ट्रायथलान जूनियर स्क्वैड कैंप 2004 के लिए सेलेक्ट किया।

ट्रायथलान एक ऐसी दौड़ स्पर्धा है, जिसमें प्रतियोगी को एक के बाद एक होने वाली तीनों प्रतियोगिताओं - तैराकी, साइकिलिंग और दौड़ में हिस्सा लेना होता है। पूजा हमेशा से ही ट्रायथलान में हिस्सा लेने की इच्छुक थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण यह संभव नहीं हो सका। दरसअल खेल के ये तीनों प्रारूपों की तैयारियों में काफी खर्च आता है।

सन 2006 में जब उसने नेशनल एक्वाथलन चैंपियनशिप में बड़ी लीड के साथ गोल्ड मेडल जीता तो आईटीएफ ने उसे ट्रायथलान में हिस्सा लेने का मौका दिया। पूजा की किस्मत ने इस अवसर पर उसका साथ दिया। हालांकि, ट्रॉयथलान प्रतियोगिता के लिए उसकी प्रैक्टिस ठीक नहीं थी। साइक्लिंग के लिए उसके पास बाइक भी नहीं थी। लेकिन उसने एक किराए की साधारण सी साइकिल से ट्रायथलान में पहला गोल्ड मेडल जीतते हुए सबको चौंकाकर रख दिया।

पूजा के इस हैरतअंगेज परफॉरमेंस को देखते हुए दो महीने बाद ही गुजरात स्टेट ट्रॉयथलान एसोसिएशन से उसे सन 2007 में असम में आयोजित होने वाले 33वें नेशनल गेम्स में भाग लेने का मौका दिया।

नेशनल गेम्स की तैयारी के लिए हमने उसे 10 हजार रुपए एक साइकिल खरीद कर दी। असम में अन्य प्रतियोगी उसकी साधारण सी साइकिल को देखकर उसका खूब मजाक उड़ाया करते थे। क्योंकि उनके पास अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक से बढ़कर एक महंगी साइकिल थीं, जिनकी कीमत 1.5 लाख रुपए से भी ऊपर की थी। यह सब देखकर पूजा शुरुआत में अपसेट भी होने लगी थी। अंतत: उसने सारी बातों को दरकिनार करते हुए अपना मन प्रैक्टिस में लगाया। वह जानती थी कि ईश्वर कोशिश करने वालों को ही सफलता प्रदान करता है। पूजा ने यहां भी इतिहास रचते हुए गोल्ड मेडल जीतकर सबको आश्चर्यचकित कर दिया।


यह गौरव न सिर्फ पूजा को प्राप्त हुआ, बल्कि गुजरात राज्य के इतिहास में भी पहला मौका था, जब वहां के किसी प्रतियोगी ने ट्रॉयथलान में पहला गोल्ड मेडल अपने नाम किया था।

इन सफलताओं के बाद आईटीएफ ने चीन में आयोजित होने वाले एशियन चैंपियनशिप के लिए पूजा का सेलेक्शन किया। इसके बाद पूजा ने कई अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में हिस्सा लिया और देश के लिए अनेकों मेडल्स भी जीते।

हालांकि, उसके पास अंतरराष्ट्रीय स्टैंडर्ड की साइकिल नहीं थी, जिसके चलते उसे अनेकों जगह परेशानियों का सामना भी करना पड़ा। इसी बीच गुजरात के एक स्थानीय बिजनेसमैन राजन शाह ने पूजा के लिए स्पेशल बाइक खरीदने में मदद की। पूजा की उपलब्धियों को देखते हुए सन् 2009 में राजन शाह व गुजरात सरकार की मदद से पूजा के लिए अंतरराष्ट्रीय स्टैंडर्ड की साइकिल खरीदी गई।

मैं जब भी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से ऊब जाता था या कभी निराश होता तो पूजा ही मुझे प्रोत्साहित करती। ट्रॉयथलान स्पर्धा के लिए रोजाना की 6 घंटों की प्रैक्टिस के बाद भी वह मेरे और अपनी एमएससी की पढ़ाई के लिए समय निकाल लिया करती है।

अब तक पूजा 4 अंतरराष्ट्रीय, 28 राष्ट्रीय स्तर के मेडल्स के साथ 186 मेडल्स जीत चुकी है। इस दौरान उसने जीवन में कई बार जानलेवा खतरों का भी सामना किया और कई बार घायल भी हुई, लेकिन उसने कभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी। उसके जीवन में अनेकों बाधाएं आईं, लेकिन वे उसे कमजोर नहीं कर सकीं। इसलिए इस वुमन डे पर मैं अपनी बहन को दिल से बधाई देता हूं। मुझे उसका भाई होने का गर्व है।

यह स्टोरी नील चौरसिया ने शेयर की है। अगर आपके पास भी ऐसी ही कोई कहानी हो तो शेयर करने के लिए यहां क्लिक करें-