पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • ऐसा था वो खौफनाक मंजर, लोग लाशों के बीच तलाश रहे थे जिंदगी

ऐसा था वो खौफनाक मंजर, लोग लाशों के बीच तलाश रहे थे जिंदगी

8 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक

दर्द बहता है अंदर जिस्म में जहर बनकर, ये क्या बहता है इन आंखों से पानी सा... ये पंक्तियां भोपाल गैस त्रासदी की याद दिलाती है। जी हां उस भयावह हादसे को 30 बरस बीत चुके हैं। लेकिन हालात और लोगों का दर्द आज भी कल जैसा ही है।


भोपाल। 2 दिसंबर की उस सर्द रात को घड़ी का कांटा 3 दिसंबर की तरफ ले जाने को अपनी पूरी रफ्तार से घूम रहा था। इतवारा की छुट्टी मनाकर लोग अपनी-अपनी रजाइयों में दुबके कल के सपने देख रहे थे। इनमें से किसी को इस बार का गुमान भी न था कि बहुराष्ट्रीय अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने उस दिन मौत को भोपाल आने की दावत दे रखी थी।

पुराने शहर में ब्रिजीसिया मस्जिद के पास मैं भी अपने घर में उस रात सबकी तरह बेखबर था। देर रात तक काम करता रहा था और कुछ देर पहले ही सोया था। रात के करीब एक बजे के आस-पास अचानक गले में कांटा सा चुभने लगा। नींद के आगोश में भी बेचैनी बढऩे लगी। गले में फंसा कांटा एक ठंडी लकीर बनकर ऊपर उठने लगा। ऐसा लगा मानो सब कुछ खत्म हो रहा है। पास ही लेटी पत्नी की लगातार खांसी की आवाज से उठ बैठा। उसका दम घुट रहा था।


मै डर गया। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि हुआ क्या है। तभी अहसास हुआ कि नीचे गली में कुछ हलचल है। भागकर खिड़की से झांका तो मोहल्ले के लोग खांसते-खूंसते, अपने मुंह को किसी कपड़े से ढके हुए चले जा रहे हैं। इस मंजर ने अचानक मेरे अंदर एक मनहूस आशंका, जिसके बारे में मैं पिछले दो साल से लगातार अखबारों के जरिए सबको चेताने की कोशिश कर रहा था। पहले अपने छोटे से साप्ताहिक रपट के जरिए और फिर दिल्ली के जनसत्ता के जरिए। भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने बैठा रहा है।


थोड़ा होश संभालकर फोन की तरफ दौड़ा। पुलिस कंट्रोलरूम का नंबर 100 घुमाया। घंटी बजी और कुछ सेकंड में ही फोन उठ गया। फोन उठाने वाला भी सबकी तरह ही खांस रहा था। मैंने लगभग चीखते हुए पूछा क्या हुआ है शहर में? उधर से एक टूटती-उखड़ती हुई सी आवाज में जवाब मिला, "साहब, यूनियन कार्बाइड का टैंक फट गया है" और लगभग निराश और रुआंसी आवाज में उसके अंतिम शब्द थे- दम घुट रहा है।


तो आखिर ऐसा हो ही गया। अपनी असफलता और बेबसी पर रोने के अलावा अब चारा क्या था। नजर के सामने सिवाय मौत के कुछ नजर नहीं आता था। औरों से कुछ ज्यादा। ज्यादा इसलिए कि मैं कार्बाइड में जमा जहरीली गैस और फास्जीन के असर के बारे में, औरों से कुछ ज्यादा जानता था। आखिर पिछले तीन साल से इस पर काम जो कर रहा था।

दिसंबर 1981 में कार्बाइड में काम करने वाले मित्र मोहम्मद अशरफ की फास्जीन गैस से हुई मौत ने मुझे जगा दिया था। अगले दिन से ही काम पर लग गया। अगले नौ महीने तक इस सारे मामले की तहकीकात की। पहला तथ्य: इस यूनिट में एमआईसी आधारित सेवन और टेमिक जैसे कीटनाशक बनाए जाते हैं।


दूसरा तथ्य: एमआईसी और फास्जीन हवा से भारी गैस हैं। तीसरा तथ्य: कारखाने में सुरक्षा नियमों की पूरी तरह अनदेखी के चलते कई बार गैस लीक हुई है और मजदूर उससे प्रभावित हुए हैं।


कार्बाइड के दो मजदूर नेताओं मोहम्मद बशीरुल्लाह और शंकर मालवीय की मदद ने मेरा काम आसान कर दिया। कारखाने के अंदर जाकर देखा तो यूं लगा जैसे कोई बिना ब्रेक के कार या स्कूटर चला रहा है। सब कुछ साफ-साफ दिखने लगा था।


17 सितंबर 1982 को पहले लेख "बचाइये हुजूर, इस शहर को बचाइये" (रपट साप्ताहिक) से शुरू होकर 16 जून 1984 को "जनसत्ता" में प्रकाशित "भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर" तक लगातार लिखता रहा।


1982 में ही कुछ परिचित सदस्यों की समझ और हमदर्दी के नतीजे में बात विधानसभा में भी उठ गई लेकिन तब सरकार ने ऐसी किसी संभावना से इंकार कर दिया। सीएम अर्जुन सिंह को एक पत्र लिखकर जांच करवाने की प्रार्थना की। नतीजा सिफर। देश के सर्वोच्च न्यायालय को पत्र भेजकर दखल देने की अपील की। वह भी बेनतीजा।

नतीजा 2-3 दिसंबर की काली रात।


(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार केसवानी ने भोपाल गैस त्रासदी के 25 वर्ष पूरे होने पर दैनिक भास्कर की दस्तावेज नामक मैग्जीन के लिए लिखा था।)

अगली स्लाइड्स पर देखें उस खौफनाक मंजर की तस्वीरें...