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कम पड़ गया था कफन का कपड़ा और भीड़ बढ़ती जा रही थी

7 वर्ष पहले
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भोपाल गैस त्रासदी का वह खौफनाक मंजर अब तक लोगों के जहन में ताजा है। मैगजीन "दस्तावेज" में प्रकाशित एक लेख के अनुसार उस हादसे के दूसरे दिन लोगों को कफन का कपड़ा तक नसीब न हो सका। अंतिम संस्कार का सामान बेचने वाले एक व्यापारी के अनुसार सुबह 8 से दोपहर 3 बजे तक उसकी दुकान पर अंतिम संस्कार का सारा सामान खत्म हो चुका था। इतना ही नहीं गांधी मेडिकल कॉलेज में पहले दिन की लाशों का ऐसा अंबार लगा कि पोस्टमॉर्टम के लिए हर तीन शव में से एक शव को चुनने के अलावा कोई चारा नहीं था।


भोपाल। देर रात तेज-तेज चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनाईं दीं। मानो कोई चीज है जो आपके ऊपर हमला कर रही हो और आप बच नहीं पा रहे हों। मैंने बागर निकलकर देखने की कोशिश की, लेकिन घर के बुजुर्गों ने मना कर दिया। कड़ाके की सर्दी थी, इसलिए मैं बाहर नहीं आया और वापस सो गया। लेकिन हर रोज की तरह पूरी नींद नहीं सो पाया।

किसी ने दरवाजे पर दस्तक दीः सूरज की किरण निकलने से पहले ही किसी ने दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। दरवाजा खोला तो एक पड़ोसी सामने खड़ा था। उसने बताया कि रात को यूनियन कार्बाइड से गैस निकली है, जिसने हजारों लोगों की जान ले ली। तत्काल दुकान पर पहुंचों, लोगों को कफन-दफन के सामान की दिक्कत होगी।

मुझे अंदाजा नहीं थाः मुझे लगा कि हुई होगी कोई छोटी घटना, लोगों की तो आदत होती है बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की। उस समय सूचना का भी कोई माध्यम नहीं था, इसलिए सही स्थिति का अंदाजा नहीं होने के कारण अपने नियमित काम कर दुकान के लिए निकले। जब दुकान के लिए निकला तब पता चला कि दरअसल मैं अब तक नींद में ही था। पूरे शहर में तबाही हुई और मैं चैन से सोता रहा। अब तक कितने ही लोगों के मरने के बाद उनके कफन के लिए कपड़ा दिया, लेकिन कभी नहीं पूछा कि मरने वाले को हुआ क्या था। लेकिन उस दिन मौत का असली तांडव देखा।


मेरी दुकान पर एक औरत आईः सुबह 8 बजे तक दुकान पर पहुंचा और दुकान का शटर उठाया ही था कि वहां अंतिम क्रिया का सामान लेने के लिए लोगों की भीड़ लग गई। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, हर आदमी का कोई न कोई उनसे दूर हो गया था। मुझे याद है कि एक औरत आई, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। इसलिए नहीं कि उसे गैस लग गई थी, बल्कि उसका इकलौता बेटा गैस का शिकार हो गया था। दरअसल बेटे ने अपना फर्ज निभाया था, जब गैस निकली तो उसने अपनी मां को कपड़ों से ढंक दिया और खुद मां को दबाकर बैठ गया।


बूढ़ी औरत उस दिन बच्चे से जिद न कर सकी और वह बच्चे की जिद के आगे उसकी जिंदगी को ही हार गई। किसी भी दुकानदार के लिए ग्राहक खुशी लेकर आता है, लेकिन पहली बार मुझे ज्यादा ग्राहक आने पर गुस्सा आ रहा था। मैंने मन ही मन कहा कि क्यों इतने सारे लोग आ रहे हैं। अचानक सवाल उठा मन में कि क्या सबको कफन मिल पाएगा। बमुश्किल 11 बजे होंगे कि कफन का कपड़ा खत्म हो गया।


आस-पास की दुकानों से भी कपड़ा बुलवा लिया, लेकिन वह भी खत्म हो गया। मैंने अपनी दुकान हर सामान के लिए खोल दी कि जिसे जो ले जाना है ले जाए। तीन बजे सारा सामान खत्म हो गया और तब मुझे अहसास हुआ कि मैं हजारों की मौत का सामान बांट चुका हूं।

अगली स्लाइड पर देखें गैस त्रासदी की भयानक तस्वीरें...

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