पत्नी या ससुराल वालों पर नहीं चल सकता मुकदमा

8 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
आत्महत्या से पहले पति के सुसाइड नोट के आधार पर चल रहा मुकदमा हाईकोर्ट से खारिज पति की आत्महत्या के मामले में पत्नी और उसके मायके वालों के खिलाफ चल रहे मुकदमे को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। जस्टिस एनके गुह्रश्वता की एकलपीठ ने कहा है कि इस मामले में यदि पति को किसी प्रकार की समस्या थी तो वह तलाक लेकर अन्य कानूनी कदम उठा सकता था, आत्महत्या उसका समाधान नहीं था। ऐसे में उसके सुसाइड नोट के आधार पर चल रहे मुकदमे को किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।
जबलपुर. अदालत ने यह फैसला जबलपुर के गंगा मईया (रांझी) निवासी रूबीना, कदीरा बी, नुरुद्दीन, रौनक, नासरीन और सिराज खान की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। प्रकरण के अनुसार रूबीना का निकाह खुर्शीद आलम के साथ हुआ था। विवाह के बाद कुछ विवादों के चलते उसका और रूबीना के बीच विवाद चलता था। रूबीना का अपने मायके वालों के साथ आरोपित तौर पर दिए जा रहे तानों से तंग आकर खुर्शीद ने 20 फरवरी 2010 को सल्फास पी ली थी।
अस्पताल में उपाचारार्थ भर्ती रहने के दौरान उसकी 23 फरवरी को मौत हो गई थी। मरने से पहले सुसाइड नोट में खुर्शीद ने लिखा था कि ससुराल वालों से मिल रही प्रताडऩा के कारण वह आत्महत्या कर रहा है और इसके लिए वो ही जिमेदार हैं। खुर्शीद के सुसाइड नोट के आधार पर गोहलपुर थाने में आवेदकों के खिलाफ भादंवि की धारा 306 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इस मामले में आवेदकों के खिलाफ जबलपुर की जिला अदालत में लंबित मुकदमे को चुनौती देकर यह पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई थी।
मामले पर हुई सुनवाई के दौरान आवेदकों की ओर से अधिवक्ता अरूप कुमार दास ने पक्ष रखा। सुनवाई पर एफएसएल रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि इस रिपोर्ट की अब ज्यादा अहमियत नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि तीन दिनों तक इलाज चलने के बाद यह संभावना थी कि उसके शरीर में मौजूद जहर अपने आप गायब हो जाए, लेकिन जहर के कारण खराब हुए विभिन्न अंगों के कारण ही उसकी मौत हुई थी।
ऐसे में एफएसएल रिपोर्ट का कोई महत्व नहीं रह जाता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-ए और सुसाइड नोट का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि खुर्शीद द्वारा उठाया गया कदम भादंवि की धारा 107 की परिधि में नहीं आएगा, क्योंकि यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें मृतक के लिए आत्महत्या सिर्फ एकमात्र रास्ता नहीं था। इस मत के साथ अदालत ने आरोपियों के खिलाफ चल रहा मुकदमा खारिज करके आदेश की प्रति अग्रिम कार्रवाई के लिए निचली अदालत को भेजने के निर्देश दिए।