कोकड़ी के स्कूल का अपना शिक्षा कोष, छात्रों को मिलता है बिना ब्याज का लोन

8 वर्ष पहले
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महासमुंद. महासमुंद से करीब 20 किमी दूर कोकड़ी गांव के प्राथमिक स्कूल ने वह सब कर दिखाया, जो भारी-भरकम बजट और ढेर सारी प्लानिंग के बावजूद सरकारें नहीं कर पाईं। स्कूल के हेड मास्टर गेंदलाल कोकडिय़ा ने गरीबी की वजह से आगे की पढ़ाई नहीं कर पाने वाले बच्चों की मदद के लिए चार साल पहले छोटी सी कोशिश की।

संपन्न किसान परिवार के गेंदलाल ने स्कूल में शिक्षा कोष बनाकर उसमें अपना पूरा वेतन डालना शुरू किया। धीरे-धीरे पालक और गांव के लोग भी जुटने लगे। आज कोष में चार लाख रुपए से ज्यादा की राशि है। गांव के 15 से ज्यादा बच्चे कोष से मिली 15-20 हजार रुपए की मदद से एनआईटी जैसे संस्थानों में पढ़ रहे हैं। कई बच्चों और उनके पालकों को कारोबार के लिए आर्थिक मदद की जरूरत पड़ी, तो स्कूल से उनको 20 से लेकर 90 हजार रुपए तक का कर्ज बिना ब्याज के उपलब्ध कराया गया।

इंडस्ट्रियल केमेस्ट्री में बीएससी करने वाले 28 वर्षीय गेंदलाल पटेल ने इतिहास में एमए किया है। तीन बार वे पीएमटी में सलेक्ट हो चुके हैं। दो बार डेंटल में और एक बार एमबीबीएस कोर्स के लिए। पर उनका इरादा स्कूल शिक्षा में कुछ अलग करने का था। डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़कर वे पड़ोस के गांव कोकड़ी की सरकारी प्राथमिक शाला में आठ साल पहले शिक्षाकर्मी बन गए। मन ऐसा रमा कि सरनेम पटेल से बदलकर कोकडिय़ा कर लिया। अध्यापन के दौरान देखा कि गांव के कई गरीब बच्चे आर्थिक परेशानियों की वजह से मुफ्त शिक्षा योजना के बावजूद आगे नहीं पढ़ पाते।

एक दिन तय किया और स्कूल में शिक्षा कोष बनाकर अपना पूरा वेतन उसमें डालना शुरू कर दिया। इसी पैसे से गरीब बच्चों को कॉपियां, पेंसिल, स्लेट और बाकी जरूरतों का सामान देने लगे। गांव में रहने वाले राधेश्याम की बेटी आठवीं कक्षा में मेरिट में आई थी। पर आगे कॉलेज की पढ़ाई के लिए उनके पास पैसा नहीं था। कोकड़ी स्कूल से पढ़ाई करके निकली छात्रा को स्कूल के कोष से 20 हजार रुपए बिना ब्याज के दिए गए।

राधेश्याम की बेटी के अलावा 20 बच्चे आज इसी कोष की बदौलत इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर पा रहे हैं। राधेश्याम ने बताया कि कोष न होता, तो वह अपनी बच्ची को आगे पढ़ा ही नहीं पाता। गांव में रहने वाले दुकालू रात्रे, गेंदलाल चेलक, रामनाथ भारती ने बताया कि गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे स्कूल के शिक्षा कोष से लोन लेकर उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं। इस स्कूल से पढ़कर निकले बच्चों को स्वरोजगार के लिए भी बिना ब्याज का ऋण दिया जा रहा है।

स्कूली बच्चों के पालकों खूबचंद भारती, अर्जुन प्रसाद और शकुनबाई ने खेती को उन्नत बनाने के लिए शिक्षा कोष से मदद ली। लीमन कुमार ने 20 हजार रुपए का कर्ज लेकर गांव में फोटो स्टूडियो खोला, तो आयुर्वेदिक साबुन बनाने के लिए दो लोगों को 30 हजार रुपए की मदद मिली।

कोष का लाभ और उद्देश्य पालकों और गांव के संपन्न परिवारों को समझ में आया, तो उन्होंने भी इसमें मदद करना शुरू किया। स्कूल के प्रधान पाठक बन चुके गैंदलाल पिछले चार सालों से अपना पूरा वेतन इसी कोष में डाल रहे हैं। गेंदलाल कोकडिया का कहना है कि खेती-मजदूरी करने वाले लोगों को इस बात की चिंता होती है कि इतनी महंगाई में उनके प्रतिभावान बच्चे आगे कैसे पढ़ेंगे। 7-8 साल पहले गांव के ज्यादातर बच्चे माध्यमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते थे। सरपंच वैदेही नायक ने बताया कि स्कूल की वजह से ही उनकी पंचायत का पूरे इलाके में नाम है। गांव की प्राथमिक स्कूल में बच्चे मध्यान्ह भोजन के लिए नहीं, यहां के माहौल और पढ़ाई की वजह से आते हैं।