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'मोदी सरकार' के लिए किए गए अपने 'काम का इनाम' चाहते हैं संघ कार्यकर्ता

6 वर्ष पहले
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नई दिल्ली.लोकसभा चुनावों के नतीजे आए कई दिन बीत चुके हैं। चुनाव बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने स्वयंसेवकों से कहा है कि अब 'केंद्र में राष्ट्रवादी सरकार बनाने का काम' पूरा हो चुका है और स्वयंसेवकों को अब अपने इलाकों में संघ के क्रियाकलापों में जुट जाना चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों को समझाया था कि संघ के आदर्श बड़े हैं और सिर्फ सत्ता हासिल करना उसका लक्ष्य नहीं है। लेकिन, लगता है कि संघ के स्वयंसेवक शायद उनकी बात ठीक से नहीं समझ पाए हैं।
हालांकि, राजनीति से हमेशा दूर रहने वाला संघ,इस बार भी यही करने की कोशिश करता दिखाई भी दिया लेकिन, इस बार के लोकसभा चुनावों में उसके स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने जिस तरह से सक्रिय भूमिका निभाई, उससे उनके मन में सियासी पद पाने की इच्छा जोर पकडऩे लगी हैं। सूत्रों का कहना है कि संघ के कुछ वरिष्ठ प्रचारक सरकार में ऊंचे ओहदों पर बैठने की होड़ में आगे आए हैं।
सूत्रों के मुताबिक संघ और सरकार के बीच कॉर्डिनेशन देख रहे भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के पास संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े सदस्यों के करीब 5,000 बायोडाटा पहुंचे हैं। ये सभी सरकार के आसपास अहम राजनीतिक ओहदा चाहते हैं। संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारियों के पास भी ऐसे ही आवेदनों की बाढ़ आ गई है। ज्यादातर लोग मंत्रियों के निजी सहयोगियों के तौर पर नियुक्ति चाहते हैं और कुछ किसी न किसी सरकारी समिति में शामिल होने की जुगाड़ भिड़ा रहे हैं ताकि वे भी भारत सरकार के 'अशोक चिन्ह' वाले विजिटिंग कार्ड का रुतबा हासिल कर सकें।
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंत्रियों को पहले ही साफ कर चुके हैं कि निजी सहयोगियों और कर्मचारियों में उनके किसी भी परिजन को जगह नहीं दी जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि नियुक्तियों के लिए जांच अच्छी तरह होनी चाहिए। सरकार ने यह कदम उन लोगों को सत्ता से दूर रखने के लिए उठाया है, जो सत्ता के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं और उसका फायदा उठाना चाहते हैं, चाहे सरकार किसी की भी हो। संघ चाहता है कि योग्य और भरोसेमंद कार्यकर्ताओं को उनकी मेहनत के 'पुरस्कार' के तौर पर ये पद मिलने चाहिए।
सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री ने संघ से कह दिया है कि सितंबर के पहले सप्ताह में सरकार के 100 दिन का कार्यकाल पूरा होने के बाद ही राजनीतिक नियुक्तियां की जाएंगी। इससे पहले संघ या परिवार का कोई अन्य संगठन न तो सरकार के काम की समीक्षा करेगा और न ही उसकी आलोचना। यूपीए की पिछली सरकार में भी संघ के कई पदाधिकारियों ने मंत्रियों से काम कराने के लिए अपने रसूख का इस्तेमाल किया था। लेकिन,मोदी सरकार में इस बार फैसला किया गया है कि चुनिंदा पदाधिकारी ही सरकार से बात करेंगे। नाम ना छापने की शर्त पर भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया, 'मोदी ने साफ कर दिया है कि उपयुक्त और योग्य व्यक्तियों को ही सरकार में कोई पद दिया जाएगा। संगठन के लिए बहुत काम करना या संगठन में वरिष्ठ पदाधिकारियों को जानना ही सरकार में नियुक्ति के लिए काफी नहीं होगा।
इस वक्त तमाम सुधारों के साथ केंद्र की मोदी सरकार काम करने के पुराने ढर्रे से आगे बढ़ रही है। ऐसे में मोदी नहीं चाहते कि सरकार किसी के लिए पैसे कमाने का जरिया बने। मोदी ने इससे पहले गुजरात में भी नेताओं और राजनीतिक बिचौलियों की सांठगांठ को तोड़ा था। इससे शुरू में राज्य में कई लोग इससे खफा हुए थे, लेकिन बाद में संघ ने भी इसे स्वीकार किया था कि जिसके कई फायदे भी देखे गए हैं।

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