उपलब्धियों से कोई लेना-देना नहीं शिक्षा और ताकत का

8 वर्ष पहले
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पहली कहानी: चेन्नई में रहने वाला 18 साल का लड़का वेंकटेश पढ़ाई में बेहद कमजोर है। टीचर्स, माता-पिता और उससे जानने वाले हमेशा उसकी इसके लिए आलोचना करते रहते हैं। ऐसे में अपना ज्यादातर वक्त वह स्कूल के बजाय मरीना बीच पर बिताने लगा। अमेरिका में फ्लोरिडा के बाद दुनिया का दूसरा सबसे लंबा समुद्र तट, मरीना बीच। यह बेहद खतरनाक समुद्र तट है इसलिए क्योंकि यहां किनारे पर लहरें काफी रौद्र रूप में होती हैं। इस समुद्र तट पर गोताखोर (डूबने वालों को बचाने के लिए) की भूमिका निभाने के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं होता। ऐसी जगह पर वेंकटेश अनाधिकृत रूप से गोताखोर की भूमिका निभाने लगा।
उसे तैरना पसंद है। हिम्मती भी खूब है। वेंकटेश ने इस तट पर कई लोगों की जिंदगियां बचाईं। कई बार तो ऐसे मौकों पर पर भी जब अधिकृत गोताखोर समुद्र में जाने से कतरा रहे थे, वेंकटेश समुद्र
की लहरों में घुस गया और डूबते व्यक्ति को मौत के मुंह से छीन लाया। इसी साल जब वह लोगों को बचाने के लिए समुद्र की लहरों से जूझ रहा था तो दूसरी तरफ स्कूल ने उसे एक सर्टिफिकेट थमा दिया। नौवीं कक्षा में ड्रॉप आउट यानी स्कूल छोड़ने वाले बच्चे का सर्टिफिकेट। उसे चिंता हुई। लेकिन अब वह और ज्यादा वक्त समुद्र तट पर बिताने लगा। ज्यादा से ज्यादा लोगों को बचाने के लिए वह समुद्र में जाने लगा। यह सब करते हुए अब तक वह इतना एक्सपर्ट हो चुका है कि पानी का रंग देखकर बता देता है कि समुद्र में कहां-कितनी गहराई है। तीन साल से वेंकटेश यही काम कर रहा है। तटीय पुलिस भी उसकी मदद लेती है। उसने कितने लोगों को बचाया इसकी उसे गिनती तक याद नहीं है। हालांकि पुलिस बताती है कि यह आंकड़ा 100 से ऊपर पहुंच चुका है। कई बार से उसने विशेषज्ञ तैराकों को भी डूबने से बचाया है। पुलिस की वह हर तरीके से मदद करता है। पुलिस भी उसे आधिकारिक गोताखोर ही मानने लगी है। वह सिर्फ 18 साल का है। ऑडियो रिपेयरिंग का काम करके आजीविका चलाता है। लेकिन उसका ज्यादातर वक्त समुद्र तट पर ही गुजरता है। उसे हर काम में एवज में पुलिस की ओर से इनाम दिया जाता है। तारीफ और काम का संतोष जो उसे मिलता है, वह अलग। इससे अब तक हुई उसकी आलोचनाओं का बोझ भी उसके मन से काफी हद तक कम हो चुका है।
दूसरी कहानी: बी. कारीगौड़ा 63 साल के हैं। पुणो में रहते हैं। कई प्रोजेक्ट पर काम करने के एस्कॉर्ट कंपनी से रिटायर हुए। नए प्रोजैक्ट के सिलसिले में अक्सर ये होता है कि आपको कई दफ्तरों
के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लाइसेंस और अन्य प्रकार की अनुमतियां हासिल करने के लिए। इस लिहाज से कारीगौड़ा इन सब चीजों में अब एक्सपर्ट हो चुके हैं। प्रोजेक्ट पर काम करने वाले लोग बुलडोजर की तरह होते हैं। वे कहीं भी जाकर अपना काम कराने में माहिर हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ कारीगौड़ा के बारे में समझ सकते हैं। इसकी ताजा मिसाल है। पुणो के कोडिगेहल्ली पुलिस स्टेशन का स्टाफ सालों से जो काम नहीं कर पा रहा था उसे उन्होंने कर दिखाया। मामला पुलिस स्टेशन की बिल्डिंग के लिए जमीन हासिल करने से जुड़ा हुआ था। पुलिस अफसरों समेत, थाने से जुड़े स्टाफ के लोग अपनी ही सरकार के दफ्तरों से जमीन के लिए चक्कर पर चक्कर काट रहे थे। लेकिन जमीन उन्हें मिल नहीं रही थी। तब कारीगौड़ा ने जिम्मेदारी अपने ऊपर ली। और किसी को यकीन नहीं होगा कि महज तीन महीनों के भीतर उन्होंने पुलिस स्टेशन के जमीन सैंक्शन करा ली। इसके लिए उन्होंने किया क्या? हर सप्ताह तहसीलदार और राजस्व विभाग के दफ्तरों में जाते रहे। नियमित रूप से यह देखते रहे कि मामले से जुड़ी फाइल आगे बढ़ी या नहीं। एक जगह से जब फाइल बढ़ जाती और दूसरी जगह पहुंचती तो वे वहां भी यही प्रक्रिया अपनाते। और आखिरकार करीब 19,000 वर्ग फीट जमीन पुलिस को मिलने वाली है। आने वाली 26 जनवरी को जमीन के कागज कोडिगेहल्ली पुलिस स्टेशन को मिल जाएंगे।
फंडा यह है कि..
इसमें कोई शक नहीं कि शिक्षा से ज्ञान हासिल होता है। शक्ति भी हमारेलिए उतनी ही अहम है। लेकिन वे लोग जिनके पास ज्ञान या शक्ति नहीं है, वे भी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।