नए पुराने को मिला दें तो जीवन स्तर बेहतर हो सकता है

8 वर्ष पहले
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ये सिर्फ दो आइडिया हैं। पहला ये कि उन्हें अच्छा और स्वास्थ्यवर्धक भोजन करने के लिए कहें। और दूसरा कि इमरजेंसी में आधुनिक मेडिकल सुविधा मुहैया कराएं। अगर ये दो चीजें हो जाएं तो गरीबों के मौजूदा हालात बहुत बेहतर हो सकते हैं। लेकिन हम सब जानते हैं कि करने के मुकाबले यह कहना बहुत आसान है। लेकिन दो लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने-अपने तरीकों से यह कर दिखाया है।
पहले आइडिया पर काम किया है सेवाय चिल्ड्रन ट्रस्ट के ई. गोपालकृष्णन ने। वे तमिलनाडु के त्रिची में रहते हैं। एग्रीकल्चर ग्रेजुएट हैं। उन्होंने 1987 में ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई के दौरान ज्यादातर समय खेतों में गुजारा। ताकि फसलों से जुड़े विज्ञान को सीख-समझ सकें। उन्हें पूरा यकीन है कि आज की युवा पीढ़ी उन कई पत्तेदार सब्जियों के बारे में जानती तक नहीं जिन पर भारत में खूब रिसर्च हो चुकी है। अपने यकीन के चलते उन्होंने बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया। उनके घर के पीछे वाले हिस्से में ऐसी कई सब्जियां लगी हैं जो पहले कभी खाई जाती थीं। अब नहीं। हां, आजकल उन्हें टीवी पर महंगे शैंपू आदि को बनाने में इस्तेमाल होने वाले घटक के तौर पर जरूर दिखाते हैं। दावा किया जाता है कि इससे बालों का झड़ना, टूटना रोका जा सकता है। कई पौधों के उदाहरण दिए जा सकते हैं।
मसलन, एसिस्टेसिया जेंजेटिका। पौष्टिक तत्वों से भरपूर यह पौधा अब सजावट का सामान बनकर रह गया है। इसी तरह इपोमोया सेपीरिया। यह पौधा जमीन और पानी दोनों में उग सकता है। इसे महिलाओं की बीमारियों और उनमें बांझपन दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। बेलून वाइन (कार्डियोस्पेरमम हैलीककैबम) नामक पौधा ज्वलनरोधी है। इस पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा
रिसर्च कर रही है। जापान भी बेलून वाइन पर रिसर्च कर रहा है। लेकिन भारत में हमने इस पौधे को घास-फूस समझ लिया है। इसके गुणों पर रिसर्च करने की बात तो दूर है। गोपालकृष्णन त्रिची आने से पहले मदुरै में थे। वहां पढ़ाई के दिनों में उन्होंने प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल कर तरह-तरह के व्यंजन बनाने भी सीखे। इसी अनुभव का इस्तेमाल कर उन्होंने मदुरै में एक रेस्तरां भी खोला है। यहां इसी तरह के पौष्टिक व्यंजन मिलते हैं।
उन्हें पूरा यकीन है कि कोई भी व्यक्ति जीवन और जीवनशैली को टिकाऊ और बेहतर बना सकता है। बशर्ते वह ग्रीन लिविंग अपना ले। यानी प्रकृति के साथ दोस्ताना जीवनशैली। चाहे वह खान-पान हो या रोजमर्रा के जीवन से जुड़े अन्य किसी मामले में। गोपालकृष्णन के दोस्त उनके कई आइडिया पर हंसते हैं। लेकिन पत्नी उन्हें पूरा सहयोग देती हैं। उनके हर आइडिया को वे घर पर आजमाती हैं।
लागू करती हैं। दूसरे आइडिया पर काम कर रहा है आरोग्य सेवा नाम का एक अन्य संगठन। यह संगठन इसी महीने 11 तारीख को बना है। कई गांव हैं जहां लोगों ने आज तक डॉक्टर नहीं देखे। ऐसे ही कई डॉक्टर हैं जिन्होंने कभी गांवों का रुख नहीं किया। यह संगठन ऐसे ही दो धड़ों के बीच पुल का काम कर रहा है। इस बेहद मुश्किल से मिशन को हाथ में लिया है 30 साल के दयाप्रसाद जी. कुलकर्णी ने। कुलकर्णी मानते हैं कि बहुत से डॉक्टर जरूरतमंदों को सेवाएं मुफ्त में देना चाहते हैं। बस उन्हें अनुकूल माहौल देने की जरूरत है। कुलकर्णी के संगठन की खूबसूरती है लचीलापन। यानी इसमें कोई भी किसी भी स्वरूप में योगदान दे सकता है। उदाहरण के लिए कोई आम आदमी यहां मरीजों के कागजात तैयार करने में मदद कर सकता है। दूर देश से डॉक्टर स्काइप के जरिए मरीजों को इलाज सुझा सकते हैं। यह संगठन सरकार के साथ भी तालमेल करके काम कर रहा है। ताकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सरकारी अस्पतालों से टाइअप किया जा सके। कॉरपोरेट सेक्टर से माली मदद ली जा रही है। पैथोलॉजी लैब, दवाइयों की दुकानों और नर्सिग कम्युनिटी से भी संगठन संपर्क कर रहा है। उन्हें भी अपने साथ जोड़ रहा है। अब तक करीब 500 डॉक्टर सहयोग के लिए इस संगठन के साथ आ चुके हैं।
फंडा यह है कि..
पुरानी जमाने की जो सबसे अच्छी चीजें हों, उन्हें अपनाया जाना चाहिए। साथ ही आधुनिक आइडियाज पर काम करते हुए उन्हें भी लागू किया जाना चाहिए। ताकि जीवनशैली को बेहतर किया जा सके। खासकर, उन लोगों की जिनकी माली हालत बहुत बेहतर नहीं है।