ध्यान खींचना है तो कुछ अलग दिखना होगा

8 वर्ष पहले
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पहली कहानी: देश में रोज हो रहे कंस्ट्रक्शन के काम को इकट्ठा कर दिया जाए। उसका आकलन किया जाए तो पता लगेगा कि भारत में हर साल अमेरिका की शिकागो सिटी के बराबर निर्माण हो जाता है। और इसी बीच यह भी मालूम चलेगा कि देश में हरी-भरी जगहें, पार्क, बच्चों के लिए खेल के मैदान लगातार कम हो रहे हैं। कई शहरों में लंबे-लंबे फ्लाईओवर तो बने हुए हैं। लेकिन उनका बेहतर उपयोग करना अब भी हम लोगों को नहीं आया है। हालांकि कुछ शहरों में फ्लाईओवरों के नीचे पार्किग स्पेस बनाए गए हैं। कहीं-कहीं नगरीय निकायों के ऑफिस बने हैं। मुंबई में ट्रैफिक पुलिस चौकियां भी बनाने की योजना है।लेकिन मुंबई और बेंगलुरू में इस दिशा में कुछ अलग भी हो रहा है। डिजाइन और आर्किटेक्चर के स्टूडेंट्स ने इंटर्नशिप प्रोजेक्ट के तहत यह काम किए हैं। ताकि फ्लाईओवरों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके। न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर का एक प्रोजेक्ट है। इसके तहत बेंगलुरू के आनंद राव सर्किल फ्लाइओवर पर मिनी पार्क और बच्चों के लिए प्लेइंग जोन बनाया गया है। पहले इस जगह पर कचरा फेंका जाता था। अब वेस्ट मटेरियल का ही इस्तेमाल कर खुबसूरत पार्क तैयार कर दिया गया है। इस पार्क और प्लेइंग जोन बनाने में मेहनत भी खुद स्टूडेंट्स ने ही की है।
पार्क बनाने में ज्यादातर बेकार चीजों का इस्तेमाल किया गया है। फ्लाइओवर के पिलरों पर पीले रंग का पेंट किया गया है। इनके इर्द-गिर्द बड़ी खूबसूरती से बेलें चढ़ाई गई हैं। बाकी पौधे भी इस तरह के लगाए गए हैं, जिन्हें दिन में दो बार ही पानी देने की जरूरत पड़े। इस आइडिया ने बेंगलुरू के नगरीय निकाय के अफसरों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब उनकी सोच की दिशा ये है कि फ्लाईओवर के नीेचे की खाली पड़ी जगहों को क्रिएटिव और खूबसूरत तरीके से कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है। यहां तक कि ये लोग अपने मास्टर प्लान की समीक्षा के लिए भी तैयार हो गए हैं।इसी तरह का काम मुंबई में हुआ है। आंबेडकर रोड माटुंगा पर। यहां के रहवासियों ने फ्लाइओवर के नीचे की 1.6 किलोमीटर की लंबाई वाली जगह को बेहतरीन जॉगिंग ट्रैक में बदल दिया है। पूरे ट्रैक के इर्द-गिर्द प्लांटेशन भी किया गया है। ताकि हरियाली का अहसास बना रहे।
दूसरी कहानी: सड़कों पर लोग अक्सर जल्दबाजी में होते हैं। एक-दूसरे से आगे निकलने की जल्दी रहती है। हर कोई प्रतिस्पर्धा करते नजर आता है। जैसे सोच रहा हो कि कैसे कौन पहले अपनी तय जगह पर पहुंचेगा, देखते हैं। लोगों को यह समझाना बेहद मुश्किल है कि लोग घर से तय समय से पांच मिनट पहले निकलें। ताकि उन्हें अपनी निर्धारित जगह पर पहुंचने में जल्दबाजी न करनी पड़े। वे वहां समय पर पहुंच सकें। लेकिन अहमदाबाद पुलिस ने ट्रैफिक कंसल्टेटिव कमेटी की मदद से इस दिशा में एक अनोखा अभियान चलाया है। ताकि लोगों को बेसिक ट्रैफिक रूल्स और
इससे जुड़ी दूसरी चीजों के बारे में जागरूक किया जा सके।
क्या किया गया? एक नाव में पहिए लगाए गए। नारे लिखे हुए बैनर और पैम्पलेट वगैरह लगाकर उसे सड़क पर उतार दिया गया। उन्होंने नाव पर पहिए लगाने का तरीका इसलिए चुना क्योंकि इससे निश्चित तौर पर लोगों ध्यान खिंचेगा। इस बहाने वे बैनर और पैम्पलेट पर लिखे नारे वगैरह पढ़ ही लेंगे। और निश्चित तौर पर इससे कुछ न कुछ असर भी होगा ही।
तीसरी कहानी: यह किस्सा अहमदाबाद के ही वी-इनोवेट सोशल रिसर्च फाउंडेशन से जुड़ा हुआ है। इसने एक एप्लीकेशन बनाई है। नाम है, ‘सेव बर्ड।’ इसके जरिए संस्था ने इस संक्रांति पर पहले की तुलना में ज्यादा पक्षियों की जिंदगी बचाई है। यह एप्लीकेशन मोबाइल फोन पर डाउनलोड की जा सकती है। यूजर्स और संस्था के वालंटियर्स के बीच यह समन्वय बनाए रखती है। समन्वय इसलिए कि जल्दी से किसी घायल पक्षी को मेडिकल हेल्प पहुंचाई जा सके। इसके जरिए नजदीकी वालंटियर को तुरंत अलर्ट भेजा जा सकता है। यही नहीं, वालंटियर भी एप पर उपलब्ध मैप के जरिए जल्द से जल्द मौके पर पहुंच पाता है।
फंडा यह है कि..
अगर आप चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोग आपके प्रोडक्ट की तरफ ध्यान दें तो कुछ अलग करना होगा। कोशिश इस बात की भी करनी होगी कि आपका प्रोडक्ट ज्यादा से ज्यादा लोगों के काम आए।