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वेद में रिसर्च के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त डॉ. बृज बिहारी चौबे नहीं रहे

7 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - होशियारपुर
हिंदी साहित्य और वैदिक प्रचार जगत के लिए योगदान देने वाले और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित डॉ. बृजबिहारी चौबे का शनिवार को निधन हो गया। उन्होंने डीएमसी लुधियाना में रात साढ़े बारह बजे अंतिम सांस ली। 74 वर्षीय डा. चौबे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और लुधियाना में उपचाराधीन थे। उनके निधन के साथ ही देश से साहित्य जगत के एक युग का अंत हो गया। वर्ष 2004 में जब प्रो. चौबे को राष्ट्रपति सम्मान मिला तो होशियारपुर के लिए यह गौरव का क्षण था।
गांव जवहीं में हुआ था डा. चौबे का जन्म
गौरतलब है कि डा. बृज बिहारी चौबे का जन्म 1 जुलाई 1940 को गांव जवहीं जिला बालिया उत्तर प्रदेश में हुआ था। प्रो. चौबे की प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय में हुई।
माध्यमिक व उत्तर माध्यमिक की शिक्षा रामसिंहासन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दुबर, बलिया में हुई थी। बीए एवं एम.ए. ((संस्कृत वेद ग्रुप से)) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से क्रमश: 1959 व 1961 में की। वहीं से उन्होंने 1964 में ट्रीटमैंट आफ नेचर इन दि ऋग्वेद विषय पर डा. सिद्धेश्वर भट्टाचार्य के निर्देशन में पी.एच.डी. की।
प्रो. चौबे ने इंस्टीट्यूट आफ ओरिएंटल फिलोसफी वृंदावन में 11 अगस्त 1965 से 10 जनवरी 1967 तक प्राध्यापक पद पर कार्य करने के पश्चात 12 जनवरी 1967 से विश्वेश्वरानंद विश्वबंधू संस्थान होशियारपुर((पंजाब यूनिवर्सिटी)) में प्राध्यापक, रीडर, प्रोफेसर व -निदेशक के पदों पर 35 वर्षों तक निरंतर कार्य करते हुए वर्ष 2002 में सेवानिवृत्त हुए।
कई विशिष्ट सम्मानों से सम्मानित हुए थे डा. चौबे
डा. बृज बिहारी चौबे को संस्कृत एवं विशेषकर वैदिक अध्ययन के क्षेत्र में उनके विशिष्ट कार्यों के लिए पूर्व में भी कई शैक्षिक संस्थाओं तथा संगठनों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन 27वें अधिवेशन कुरुक्षेत्र में उनको 1974 में डा. वी. राघवन पुरस्कार, 1995 में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा संस्कृत साहित्य विशिष्ट पुरस्कार, 1998 में भारतीय विद्या भवन बैंगलोर द्वारा वेद विद्वान-प्रशस्ति, 2000 में महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन द्वारा विशिष्ट वेद विद्वान पुरस्कार तथा इसी वर्ष हिमोत्कर्ष साहित्य संस्कृत एवं जनकल्याण परिषद ऊना ((हिमाचल प्रदेश)) द्वारा हिमोत्कर्ष राष्ट्रीय एकात्मकता पुरस्कार, 2004 में हिन्दी प्रचारण सभा बलिया द्वारा आचार्य परशुराम चतुर्वेदी स्मृति सम्मान तथा इसी वर्ष महामहिम राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा राष्ट्रपति पुरस्कार, 2008 में तिरुमल तिरुपति देवस्थान तिरुपति द्वारा शाविन्मणि सम्मान व इसी वर्ष पंजाब सरकार द्वारा शिरोमणि संस्कृत साहित्यकार पुरस्कार व पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ पंजाब द्वारा प्रोफैसर ऐमिरिटस की उपाधि दी गई, 2010 में श्री गुरु गंङ्गेश्वरानंद वेद विदांङ्ग राष्ट्रीय पुरस्कार तथा इसी वर्ष 2010 में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा विशिष्ट पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। प्रो. चौबे अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन पूना के विभिन्न अधिवेशनों में अनेक विभागों की अध्यक्षता कर चुके हैं। प्रो. चौबे ने 40 से अधिक ग्रंथों का लेखन एवं संपादन किया। इनकी रचनाओं में दि न्यू वैदिक सेलेक्शन, ट्रीटमेण्ट आफ नेचर इन दि ऋग्विेद, वैदिक स्वर बोध, वैदिक स्वरित मीमांस, वैदिक वाङ्मय एक अनुशीलन, भाषिकसूत्रम्, ऋग्वेद प्रातिशाख्य-पटल 1-4, विश्वामित्र इन वैदिक एंड पोस्ट लिटरेचर, वैदिक कान्सेप्ट, वेदांग लिटरेचर, लेक्र्स आन मैनुस्क्रिप्टालौजी, आश्वलायन श्रौतसूत्रम् ((देवत्रातभाष्यसहित)), संस्कृत-वाङ्मय का बृहद इतिहास ((प्रथम भाग, वेद खण्ड)), वेद विज्ञान चिंतन, वेदव्याख्य की दिशाएं, शुक्ल यजुर्वेदसंहिता ((ऐष्टिक भाग)) की हिन्दी व्याख्या आदि रहे। इसके अलावा इनके द्वारा ऋग्वेद की आश्वलायन संहित का प्रथम बार प्रकाशन किया गया। प्रो. चौबे का सबसे महत्वपूर्ण कार्य वाधूलशाखा के अनेक अज्ञात ग्रंथों की खोज तथा उनका संपादन है। वाधूलशाखा जो अज्ञात पड़ी थी उसके सभी ग्रंथों का संपादनकार्य उन्होंने अपने हाथों में लिया था। जिन ग्रंथों का वे संपादन कर चुके थे उनमें से कई प्रकाशित भी हो चुके हैं। प्रो. चौबे वैदिक स्वरविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भाषाविज्ञान, हस्तलेखविज्ञान के अधिकारी विद्वान थे। इस समय वे संज्ञान वैदिक अध्ययन एवं शोध केन्द्र चनुर्वेद जोधामल रोड़ होशियारपुर के निदेशक थे। वे प्राचीन वैदिक ग्रंथों का संपादन तथा उनके प्रमाणिक हिंदी अनुवाद तथा जनसामान्य के लिए वैदिक धर्म, संस्कृति आदि से संबंधित लघु पुस्तिकाओं के संपादन में लगे थे। उनकी एक लघु पुस्तिका वेद भारत की पहचान तथा वैदिक प्रेयर फार नालेज, पीस एंड को-एक्सिस्टैंस अभी थोड़े दिन पहले ही प्रकाशित हुई थी। संज्ञान वैदिक अध्ययन एवं शोध केन्द्र के माध्यम से वेदविषयक कार्यशालाएं, संगोष्ठिया आदि आयोजित कर पंजाब में वैदिक विद्वान तैयार करना उनका मुख्य उद्देश्य था। पंजाब की आम जनता के लिए पंजाबी भाषा में वेद के नीतिपरक सर्वधर्मसमभाव वाले मंत्रों का अपने निर्देशन में अनुवाद करवाना चाहते थे, जिससे वेदभूमि पंजाब में वेद की ज्योति एक बार पुन: प्रकाशित हो सके।




पाण्डुलीपियों के प्रकाश को बेटे के बराबर देते थे स्थान

पिता की शोध में बच्चों ने दिया सहयोग

स्वर्गीय डा. चौबे के शोकसंतप्त परिजनों के अनुसार डा. चौबे के पार्थिव शरीर को आज 12 मई सोमबार को सुबह 11 बजे अंतिम संस्कार बहादुरपुर स्थित शिवपुरी में पूरे सम्मान के साथ किया जाएगा। डा. चौबे विश्व हिन्दू परिषद के पंजाब प्रदेश के महामंत्री रहे, हिन्दी साहित्य परिषद होशियारपुर की स्थापना की तथा प्रो. चौबे हमेशा पाण्डुलीपियों के प्रकाशन को पुत्र के बराबर स्थान देते थे।

डा. बृज बिहारी चौबे का विवाह वर्ष 1957 में कृपालपुर बलिया उत्तरप्रदेश की लीलावती चौबे से हुआ था। इनके चार बेटे व दो बेटियां हुईं। जिन्होंने अपने पिता के शोध कार्य में हरसंभव प्रयास करके योगदान दिया और सभी उनके कार्य के साथ आज तक जुड़े रहे। जीवनसाथी का साथ मिलने से इन्होंने अपने शोध कार्य को और तेजी से जारी रखा। मगर 1995 में जीवनसाथी के बिछड़ जाने का इन्हें काफी दुख पहुंचा, मगर साहित्य जगत की सेवा को अपना परम कर्तव्य मानते हुए इन्होंने शोध कार्य जारी रखा। इनके निधन से जहां साहित्य जगत को हानि पहुंची है वहीं शोक संतप्त परिवार के सदस्यों उनके बेटों तारकेश्वर चौबे, कृष्ण कुमार चौबे, मनोज कुमार चौबे, योगेश चौबे तथा बेटियां मंजी व सुराधा के साथ हर कोई दुख सांझा करने पहुंच रहा है।

साल 2004 में वैदिक प्रचार जगत में योगदान देने वाले डॉ. बृज बिहारी चौबे को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित किया था।

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