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एक के बाद एक खुली शौक, मस्ती और मजबुरी की शर्मनाक सच्चाई

9 वर्ष पहले
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नागपुर। सामाजिक लक्ष्मण-रेखाएं लांघती रेव पार्टियां : नशा, मौजमस्ती और मनोरंजन के नाम पर तमाम सामाजिक लक्ष्मण-रेखाएं लांघती रेव पार्टियां समाज के लिए नासूर बनती जा रही हैं। पश्चिमी समाज का अंधानुकरण करके युवा पीढ़ी ने जो पराभव का रास्ता चुना है, वह पतन की अंधी सुरंग की ओर ही जाता है।








इन रेव पार्टियों की श्रृंखला जाने-अनजाने में ऐसे गंभीर अपराधों की गली में खत्म होती है, जहां से लौटना इन युवाओं के लिए मुश्किल हो सकता है। वास्तव में रेव पार्टियों के आयोजन के पीछे एक बड़ी सोची-समझी रणनीति काम करती है।








इसमें होटल, बिचौलियों तथा नशे का कारोबार करने वाले एक सुनियोजित तंत्र की मिलीभगत होती है। जिस सुनियोजित तरीके से इन पार्टियों के लिए लोगों को आमंत्रित किया जाता है, उससे आयोजकों के मंसूबों को भांपा जा सकता है।








जिंदा होते हुए भी मर गई : बारहवीं तक शिक्षित दीपाली और पढ़ना चाहती थी, मगर आर्थिक जरूरतों ने उसे गलत मार्ग पर ला दिया। जिस उम्र मंे बच्चे मां - बाप की उंगली थामकर चलना सीखते हंै। उस उम्र में दीपाली को पिता के प्यार से महरुम होना पड़ा। उसके पिता जगदीश की असमय मृत्यु हो गई।








दीपाली की मां प्रमिला के कंधों पर तीन पुत्रियों व दो पुत्रों के पालन की जिम्मेदारी आ गई। दो वक्त की रोटी की जुगत में प्रमिला ने कॉटन मार्केट क्षेत्र में सब्जी की दुकान लगानी शुरू कर दी। कभी यहां पर प्रमिला का पति हमाली काम किया करता था। परिवार बड़ा और कमाने वाले दो ही हाथ होने से बड़ी मुश्किल से प्रमिला के घर का चूल्हा जलने लगा था।








जब सब्जी का धंधा और बच्चों पर एक साथ ध्यान देना और भी मुश्किल होने लगा तो प्रमिला ने दुकान बंद की और दूसरों के घरों मे बर्तन मांजना शुरू किया। कई बार तो ऐसा भी समय आया बच्चे तो खा-पी कर सो जाते, मगर प्रमिला को अपने पेट की आग पानी पी कर बुझानी पड़ती थी।








दीपाली घर में बड़ी थी। जब उसे मां की हालत देखी नहीं गई तो वह भी पढ़ाई के साथ साथ घर खर्च मे मां का हाथ बटाने के उदेश्य से ब्यूटी पार्लर में काम करने लगी। यहां पर काम करने वाली अन्य लड़कियां पहले से वेश्यावृति के धंधे से जुड़ी हुई थीं। उन लड़कियों का पहनावा व चमक दमक देखकर दीपाली के मन मे भी ख्वाहिश जागी। उस वक्त दीपाली को यह नहीं पता था कि वे लड़कियां इस घिनौने धंधे से जुड़ी हुई हैं।








धीरे धीरे दीपाली के समझ में भी सब कुछ आने लगा। पार्लर में काम करते हुए रूपाली नाम की लड़की दीपाली की अच्छी सहेली बन गई। उसके बहकावे और घर की मजबूरी में न चाहते हुए भी दीपाली वेश्यावृति की दलदल में उतर आई।








इस धंधे में आने के बाद दीपाली स्वयं व रिश्तेदारों की नजर में गिर गई। कई बार तो उसे अपनों ने ही अपमानित किया। मां को जब इस बारे पता चला तो वह माथा पकड़ कर रह गई।








खूब हो-हल्ला हुआ। घर में किसी की भी शादी नहीं हुइ थी। बदनामी के डर से अब कौन शादी करेगा, यह सोचकर मां ने आत्महत्या की भी कोशिश की। भाई ने जमकर दीपाली की पिटाई की थी। इस घटना के बाद दीपाली ने कई बार इस दलदल से निकलने की कोशिश की मगर वह कामयाब नही हुई।








आखिरकार उसे घर छोड़ना पड़ा। बाद में इसी धंधे से जुड़े व्यक्ति से दीपाली ने शादी कर ली। दीपाली दूर रहकर अभी भी घर पर रुपए भेजती है। भाई ने उन रुपयों से दुकान लगाइ है। मगर दीपाली अब भी उन लोगों के लिए जिंदा होते हुए भी मर गई है।








आत्मकेंद्रित किशोर : तिरपुडे समाजकार्य महाविद्यालय के रीडर डॉ.विजय शिंगनापुरे का कहना है कि किशोर आत्मकेंद्रित होने लगे हैं। परिवार से मिलने वाले पाकेट मनी व अन्य सहूलियतों के कारण किशोर स्वयं को हर मामले में स्वतंत्र मानते हैं।








अन्य लोगों के प्रति उनके मन में आदर की कमी होने लगती है। पहले पास-पड़ोसियों के बीच इज्जत के सवाल पर विशेष तहजीब के साथ पेश आने की नसीहतें मिलती थी। अब पड़ोस व पड़ोसीपन दूर हो रहा है। सामाजिक मूल्यों का पतन हो रहा है।








दोस्त बनें : एडवोकेट कंचन करमरकर का कहना है कि बच्चों के साथ अभिभावकों का दोस्ताना संबंध होना चाहिये। कल्चर के नाम पर पाबंदियों की बेड़ी लेकर घूमने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। कोमल मन को संयमित रखने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है।








नये दौर में दुनिया के तमाम परिवर्तनों से बच्चे वाकिफ होने लगे हैं। प्रचार प्रसार माध्यमों के साथ ही इंटरनेट पर इन पार्टियों के दृश्य युवाओं को लुभाते हैं। मां-पुत्री की सच्ची सहेली व पिता पुत्र का दोस्त बने तो इस खतरे को बहुत हद तक दूर किया जा सकता है।








डीम्ड यूनिवर्सिटी के उपकुलगुरु वेदप्रकाश आर्य ने कहा कि भौतिकवादी संस्कृति का प्रभाव जीवन मूल्यों पर पड़ रहा है। इससे भारतीय संस्कृति प्रभावित हो रही है। परिजन बच्चों को समय व संस्कार नहीं दे पाते। भारतीय खेलों की जगह ऐसे आयोजन लेने लगे हैं।



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