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हौसले के आगे धुंधली पड़ गई आंखें, बचपन से नेत्रहीन छात्रा ने किया बोर्ड में टॉप

9 वर्ष पहले
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दमोह। जन्म से दृष्टिबाधित है सृष्टि। लेकिन है दुनिया जीतने की क्षमता। दमोह की 12वीं कक्षा की छात्रा सृष्टि तिवारी ने कला समूह में 500 में से 481 अंक हासिल कर प्रदेश की मैरिट में पहला स्थान पाया है। हाई स्कूल परीक्षा 2011 में भी सृष्टि ने दृष्टिबाधित संवर्ग में मैरिट में स्थान बनाया था। उसने बताया- उसे पेपर हल करने के लिए राइटर मिला था। सृष्टि की मां सुनीता और पिता सुनील तिवारी भोपाल में रहते हैं। नाना वीरेंद्र गंगेले, नानी पुष्पा गंगेले और मामा डॉ. संजय गंगेले ने सृष्टि की पढ़ाई में मदद की। मामा ने नोट्स बनाकर दिए, नाना-नानी ने पढ़कर सुनाया, जिन्हें याद कर उसने परीक्षा की तैयारी की।

एमपी बोर्ड की मैरिट में आर्ट्स ग्रुप से पहला स्थान हासिल करने वाली कक्षा 12वीं की द्रष्टिवाधित छात्रा श्रृष्टि तिवारी ने यह मुकाम मजबूत इरादों, द्रढ़ इच्छाशक्ति और कठिन मेहनत के बूते पर पाई है। लोगों को घोर आश्चर्य में डालने वाली श्रृष्टि की इस सफलता के पीछे एक बड़े संघर्ष छिपा है, जिसका सामना उसने बेहद आत्मविश्वास के साथ करते हुए प्रदेश में एक नया इतिहास रच दिया।

शहर के जेपीबी गर्ल्स स्कूल की छात्रा श्रृष्टि के पिता सुनील तिवारी उद्योग विभाग भोपाल में कार्यरत है। श्रृष्टि को जन्म से कुदरत ने शारीरिक रूप से उसे सामान्य बच्चों से भले ही अलग बनाया, लेकिन उसमें कूट-कूटकर भरे आत्म विश्वास ने उसे विशेष बना दिया। पांच साल की उम्र तक श्रृष्टि अपने माता-पिता के साथ रही, लेकिन कक्षा तीसरी से उसका एडमीशन दमोह में उनके नाना-नानी और मामा ने दमोह में करा दिया। तब से वह उन्हीं की देखरेख में पली-बढ़ी है।