शांत हो गई संगीत की तान, उस्तादों के उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर ने छोड़ी दुनिया

9 वर्ष पहले
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आज उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर के इंतकाल की खबर से दिल को यकीन दिलाना मुश्किल हुआ कि ध्रुपद की सबसे बुलंद आवाज खामोश हो गई। उस्ताद हमारे दादा गुरु यानी हमारे गुरु के गुरु थे। हमारे गुरु पद्मश्री गुंदेचा बंधु उस्ताद के प्रथम बैच के शागिर्द थे, जब उस्ताद भोपाल स्थित ध्रुपद केंद्र में गुरु थे। उस्ताद करीब 25 साल भोपाल में रहे और उन्होंने यहां जो तालीम दी, उसके कारण भोपाल उनका हमेशा ऋणी रहेगा।

उस्ताद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने संगीत के दामन में सबसे ज्यादा सितारे जड़े। उनके शागिर्द पं. उमाकांत-रमाकांत गुंदेचा, पं.ऋतिक सान्याल, उदय भवालकर, पुष्पराज कोष्ठी आज ध्रुपद के ऐसे बेनजीर हीरे हैं, जिनकी चमक ने दुनियाभर में ध्रुपद को रोशन किया है।

उस्ताद ने स्वयं तो गुणी शिष्य तैयार किए ही साथ ही भोपाल स्थित गुंदेचा बंधुओं के ध्रुपद संस्थान का भूमिपूजन कर उन्होंने नए चिरागों को रोशन करने की जमीन में बीज भी डाल दिए। आज ध्रुपद संस्थान में जो देशी-विदेशी शागिर्दों का गुलिस्ता महकने लगा है, उसकी जड़ें उस्ताद ने ही सींची हैं। हमारे गुरु गुंदेचा बंधु उस्ताद की सबसे बड़ी देन हैं, हम उन्हें हमेशा उस्तादों के उस्ताद के रूप में महसूस करते रहेंगे।

उस्ताद के बारे में

उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता उस्ताद जियाउद्दीन खानसाहब से ली थी। पिता ने उन्हें ध्रुपद गायन और वीणा वादन में प्रशिक्षित किया। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने बड़े भाई से संगीत की शिक्षा ली। उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर उस परिवार से हैं जिसने 19 पीढिय़ों तक ध्रुपद गायकी को आगे बढ़ाया। उन्होंने भोपाल में 25 सालों तक अपने शिष्यों को ध्रुपद की तालीम दी।

मप्र सरकार द्वारा उन्हें तानसेन सम्मान दिया गया। 1994 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से वे सम्मानित किए गए। उन्हें भारत सरकार द्वारा 2012 में पद्मश्री से सम्मानित करने की घोषणा की गई पर उन्होंने सम्मान लेने से इंकार कर दिया। उनका कहना था कि सरकार ने सीनियरिटी को नजरअंदाज करते हुए उनसे जूनियर ध्रुपद गायकों यह सम्मान पहले ही दे दिया था। उस्ताद ने ध्रुपद को लोकप्रिय बनाने के लिए अनेक प्रयास किए। उन्होंने बड़ी संख्या में देश-विदेश में कॉन्सर्ट किए, वर्कशॉप कीं।

वे 1980 में आस्ट्रिया में निवास करने लगे इस दौरान उन्होंने फ्रांस और आस्ट्रिया में ध्रुपद की तालीम देना शुरू किया। तभी कुछ समय के लिए वे भोपाल आए। उस समय संस्कृति सचिव अशोक वाजपेयी ने उस्ताद के सामने ध्रुपद गुरुकुल शुरू करने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने मान लिया और फिर उन्होंने यहां ध्रुपद की तालीम देना शुरू की। और भारत वापस आ गए। उन्होंने ध्रुपद केंद्र में 25 साल तक ध्रुपद की तालीम दी। वे आईआईटी बॉम्बे के ध्रुपद संसार में 5 साल तक गेस्ट फैकेल्टी भी रहे।