कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा, फिर भी दुनिया को दिखाया दम

9 वर्ष पहले
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विदिशा। अपनी तमाम जिंदगी में एक बार भी स्कूल का मुंह नहीं देखने वाले शहर के मुन्नालाल विश्वकर्मा एक शख्सियत बन गए हैं। उनके लिए लीक से हटकर चलने के सफर की शुरुआत जरा भी आसान नहीं थी, क्योंकि जो काम वे कर रहे थे लोग उसे गंभीरता से नहीं लेते थे। इतना ही नहीं उन्हें बार-बार टोका भी जाता था। बावजूद उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं हटाए और नतीजा यह है कि अब वे शहर की शख्सियतों में शुमार हो गए हैं। साथ ही वे दूसरों के लिए एक उदाहरण भी बन गए हैं। मुन्नालाल का मानना है कि जो धुन उन पर सवार थी उसके लिए किसी पढ़ाई की नहीं बल्कि रोजाना जिंदगी के अनुभव और नए नजरिए की जरूरत थी और इसी गुण से उन्हें सफलता मिल सकती थी।





400 से आकृतियां संग्रहित





मुन्नालाल विश्वकर्मा ने अपने घर के एक कमरे में रेप्लिका आर्ट गेलरी बनाई है। जिसमें करीब 400 कृतियों का संग्रह हो चुका है। वे काष्ठ के करवट लेने पर नाम से प्रदर्शनी भी लगाते हैं। हालांकि वे अब भी अपनी कला को दिखाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है बढ़ईगिरी से परिवार का गुजारा करते हैं लेकिन कला के लिए मदद की जरूरत है।





पेशे से कारपेंटर मुन्नालाल विश्वकर्मा ने लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड 2012 में जगह बनाई। वहीं अब उन्हें इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड 2013 में शामिल किया गया है। इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में शामिल होने के बाद उन्हें प्रमाण-पत्र भी दिया गया है। ये उनकी दूसरी सफलता है। शहर में जब भी कला का जिक्र होता है तो उनकी टीलाखेड़ी रोड स्थित रेप्लिका आर्ट गेलेरी का नाम जरूर लिया जाता है।





मुन्नालाल विश्कर्मा बताते हैं कि वे गुलाबगंज तहसील से नौ किमी दूर ग्राम आटा सेमर के रहने वाले हैं। घर में गरीबी होने के कारण गांव के लोगों की मवेशी चराने का काम करते थे। इस वजह से एक दिन भी स्कूल जाने का मौका नहीं मिल पाया।





13 साल की उम्र में बढ़ईगिरी सीखने गंजबासौदा आ गए। यहां दो साल काम किया और उसके बाद गुजरात के बढ़ोदरा शहर चले गए जहां करीब पांच साल काम किया। इसके बाद विदिशा शहर में फर्नीचर बनाने का काम किया। वे बताते हैं जनवरी 1988 में उन्हें लकड़ी का टुकड़ा मिला जो हुबहू किसी पुराने बरगद के पेड़ की तरह लगता था। फिर क्या था लकड़ी की आकृतियां एकत्रित करने की धुन सवार हो गई।



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