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संसद के 60 साल: इन घटनाओं ने किया सदन को शर्मसार

8 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. संसद अपने 60 वर्ष पूरे होने पर जश्न मना रही है। इन 60 वर्षों में संसद ने स्वर्णिम दिन देखे हैं। संसद में हुए कई ऐतिहासिक फैसलों ने देश की दिशा और दशा बदली है। इन 60 वर्षों के इतिहास पर नजर डालते हुए समारोह में ऐसे ही स्वर्णिम अध्यायों का जिक्र होगा। लेकिन इस दौरान भारत की संसद में कुछ काले अध्याय भी लिखे गए हैं। ऐसे अध्याय जो जब-जब खुलेंगे तब-तब भारत की संसद और लोकतंत्र शर्मसार होगा।

एक नजर ऐसे ही कुछ काले अध्यायों पर

लहराए नोट जुलाई 2008 में अमरीका से परमाणु समझौते के विरोध में यूपीए सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया था। मनमोहन सरकार ने विश्वास मत तो जीत लिया लेकिन इस दौरान भारतीय संसद एक शर्मसार कर देने वाली घटना की गवाह बनी। विश्वास मत पर आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चल ही रहा था कि अचानक बीजेपी के तीन सांसद अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते (दोनों मध्य प्रदेश के)और महावीर भगोरा (राजस्थान) नोटों की गड्डियां लेकर स्पीकर की सीट के सामने पहुंच गए। लोकसभा रिपोर्टरों की टेबल पर एक हजार रुपये को नोटों की गड्डियों से भरा बैग खुलने और सांसदों द्वारा गड्डियां दिखाने के साथ पूरा माहौल एकदम नाटकीय हो गया।
जब यह घटना घटी उस समय माकपा के वासुदेव आचार्य बोल रहे थे।



पत्रकार भी लालू यादव के भाषण के बाद कुछ सुस्त थे। लेकिन संसद के बरामदे में अचानक भगदड़ जैसा माहौल बना और हर किसी को प्रैस गैलरी में जाने की जल्दी मच गई। वहां टेबल पर पड़े नोटों के बंडल हर किसी को हैरान कर कर रहे थे। सदन के अंदर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर कांग्रेस के प्रमुख नेताओं और यूपीए के प्रमुख सहयोगी हर किसी के चेहरे पर हवाइयां उड़ती नजर आ रही थी। काफी देर तक सांसद सदन में ही रहे जबकि लोकसभा की कार्यवाही पांच बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई थी। संसद में सदन की कार्यवाही देखने वालों की लंबी कतार लग चुकी थी और वहां अजीब सा महौल था। कुछ लोगों ने तो नारेबाजी शुरू कर दी। तभी सदन में एक टीवी चैनल द्वारा इस रिश्वत प्रकरण का स्टिंग ऑपरेशन करने की बात फैल गई। भाजपा के कुछ सांसद प्रैस गैलरी की ओर देखकर जोर-जोर से इस प्रकरण का टेप होने की बात कर रह थे। तत्कालीन लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने इस घटना को भारत के संसदीय इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना करार दिया।


प्रश्नकाल पर ही प्रश्न

लोकतंत्र के इतिहास में 30 नवंबर 2009 की सुबह 11 बजे पहली बार संसद में प्रश्नकाल रोकना पड़ा। सांसदों की गैरहाजरी के मामले में यह दिन लोकसभा के लिए ऐतिहासिक रूप से सबसे शर्मसार करने वाला रहा। संसद के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक 38 सासंदों को सवाल पूछने थे। संसद की परंपरा के मुताबिक इन सभी सांसदों को पहले से ही सूचना भी दे दई गई थी लेकिन सदन में सिर्फ चार सांसद ही पहुंचे। जब सवाल पूछने वाले ही नहीं थे तो कोई जवाब भी क्या देता। इस कारण लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार संसद में प्रश्नकाल रोका गया। वैसे इससे पिछली लोकसभा में स्थिति और भी शर्मनाक थी। 14वीं लोकसभा में कुल 175 सांसदों ने ही सदन में सवाल पूछे और बहस में हिस्सा लिया। बाकी सारे सांसदों ने ना तो कोई सवाल पूछा और ना ही कभी सदन में मुंह खोला।


सभापति से धक्का मुक्की; महिला आरक्षण बिल की प्रतियां फाड़ीं गई

मार्च 2010 में राज्य सभा कि इज्जत उस समय तार-तार होती नजर आई जब, महिला आरक्षण विधेयक की खिलाफत कर रहे विराधियों ने सभापति हामिद अंसारी के साथ छीना-झपटी करते हुए बिल की प्रतियां फाड़ दी। संसदीय इतिहास में पहली बार संसद को शर्मसार करने वाला इस तरह का असंसदीय व्यवहार किया गया। राज्यसभा की कार्यवाही 11 बजे शुरू होने के बाद उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने महिला दिवस पर देश को शुभकामनाएं दी। इसके बाद उन्होंने सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन सपा, राजद और जदयू सांसद अपनी सीटों पर खड़े हो गए और जोर-जोर से नारे लगाने लगे। सदन की कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। दोबारा कार्रवाही शुरु हुई तो कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने जैसे ही महिला आरक्षण बिल को सदन के पटल पर रखा, विधेयक का विरोध कर रहे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद सभापति हामिद अंसारी के असान तक जा पहुंचे। राजद सांसद सुभाष यादव व राजनीति प्रसाद और सपा सांसद कमाल अख्तर ने हामिद अंसारी से छीना-झपटी करते हुए बिल की प्रतियां छीन लीं और उसे फाड़कर सदन में लहरा दिया। इस तरह संसद के इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ गया।


राज्यसभा में फटा लोकपाल विधेयक, आधी रात भागी सरकार


साल 2011 के शीत सत्र में देश को संसद से एक मजबूत लोकपाल विधेयक की उम्मीद थी। लेकिन इस सत्र के अंतिम दिन जो हुआ उसने संसद की गरिमा पर कालिख पोत दी। रात के 12 बजे सरकार वोटिंग से भाग गई तो इससे पहले राजद सांसद राजनीति प्रसाद ने लोकपाल विधेयक की प्रतियां फाड़कर संसद के पटल पर एक राजनीतिक पटकथा को जीवंत कर दिया।

29 दिसंबर 2011 को लोकपाल विधेयक की राह नाटकीय घटनाक्रमों के बीच राज्यसभा में रुक गई। सरकार ने गुरुवार रात पौने बारह बजे संशोधनों के बहाने विधेयक पर मतदान टालने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। सरकार ने तर्क दिया कि सदन तीन दिनों के लिए था और गुरुवार रात 12 बजे के बाद इसे नहीं चलाया जा सकता। इसके साथ ही साफ हो गया कि लोकपाल एक बार फिर से ठंडे बस्ते में चला गया। सरकार के टालू रवैए पर पूरा विपक्ष बिफर गया।

राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा, ‘अगर कोई सरकार संसद में वोट कराने से भागती है, तो उस सरकार को एक मिनट भी देश में राज करने का हक नहीं है।’ शोरगुल व हंगामे के बीच असहाय नजर आ रहे सभापति हामिद अंसारी ने कहा, ‘अप्रत्याशित स्थिति पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति में सदन नहीं चल सकता बेहतर है हम सभी घर जाएं।’

जिस स्थिति में सभापति ने अचानक राष्ट्रगान के लिए सांसदों को खड़ा कर दिया, उससे लोगों को भरोसा नहीं हुआ। इसके साथ ही उन्होंने सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। संसदीय इतिहास के स्तब्ध कर देने वाले दृश्य के बीच सदन में मौजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी शांत बैठे रहे। विपक्ष के सभी नेताओं ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन करार दिया। टीम अन्ना ने भी सरकार के रवैए पर घोर निराशा जाहिर की।

बाद में संसदीय कार्य राज्यमंत्री अश्वनी कुमार ने सरकार के कदम का बचाव किया और कहा कि लोकपाल बिल पर अगले सत्र में चर्चा होगी। बीजेपी नेता सुषमा स्‍वराज ने कहा कि यह लोकतंत्र पर धब्‍बा है। बीजेपी नेता बलवीर पुंज ने कहा कि यह भारतीय लोकतंत्र के लिए काला दिन है। आपातकाल के बाद यह फिर से लोकतंत्र की हत्या हुई है। सदन में हंगामा प्रायोजित है और सरकार ने जानबूझकर लोकपाल को लटकाया।

सुबह से अपने पक्ष में संख्या बल एकत्र करने में नाकामयाब रही सरकार की ओर से मतदान टालने और सियासी ड्रामे की रणनीतिक पटकथा शायद पहले ही लिख गई थी। जब रात साढ़े 11 बजे 15 मिनट के लिए सदन की कार्यवाही रुकी तो साफ हो गया कि विधेयक का लटकना तय है।





भारतीय संसद से जुड़ी पांच अहम घटनाएं




1- इमरजेंसी, विपक्षविहिन संसद और स्वामी





1970 के दौर में जयप्रकाश नारायण का सर्वोदय आंदोलन चरम पर था। उसी समय सुब्रमण्यम स्वामी का राजनीति में पदार्पण हुआ था। सन् 1974 में इमरजेंसी लगी हुई थी। संसद पूरी तरह विपक्ष विहिन थी। संसद की कार्रवाही में सरकार के अलावा गिनती के सांसद मौजूद होते थे। आंदोलनकारी नेताओं के नाम अरेस्ट वारंट निकला हुआ था। इन नेताओं में स्वामी का भी नाम शामिल था। एक दिन राज्यसभा में कार्रवाही चल रही थी, उसी बीच कहीं से स्वामी प्रकट हो गए। उन्हें संसद में देखकर सभी लोग अवाक रह गए। तत्कालीन गृहमंत्री को लगा कि वह हाथ में पिस्टल लेकर उनकी तरफ बढ़ रहे हैं। मंत्री घबड़ाकर मेज की नीचे छिप गए। स्वामी पूरे सत्र के दौरान राज्यसभा में उपस्थित रहे। उसके बाद सबकी नजरों से ओझल हो गए। बताते हैं कि गिरफ्तारी से बचने के लिए वह उसके बाद अमेरिका चले गए।



2- संसद नोट कांड





22 जुलाई 2008 को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर भारतीय संसद में एक शर्मनाक घटना घटी। उस दिन भाजपा के तीन सांसदों ने लोकसभा में एक करोड़ रुपये लहराए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह रकम उन्हें विश्वास मत के पक्ष में मतदान करने के लिए दी गई थी। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर वाम दलों द्वारा समर्थन वापसी के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने संसद में विश्वास प्रस्ताव पेश किया था। इस घटना से पूरे देश की जनता भौंचक्की रह गई थी।



3- संसद में 13 दिन की अटल सरकार





अटल बिहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने। गठबंधन के बलबूते बनाई गई यह सरकार कुछ दिनों में ही लड़खड़ाने लगी। विपक्ष ने इस सरकार पर अल्पमत में होने का आरोप लगाया। वाजपेयी सरकार को बहुमत साबित करने के लिए राष्ट्रपति ने समय दिया। उस दिन संसद रात तक चलती रही। लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। महज 13 दिनों में खिचड़ी सरकार गिर गई। इस मौके पर अटल जी द्वारा दिया गया भाषण लोगों के दिलों को छू गया। कहा जाता है कि संसद में दिया गया वह भाषण अगले चुनाव का शंखनाद था।





4- संसद पर हमला



13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकियों ने संसद पर हमला किया था। संसद परिसर में तैनात सुरक्षा बलों ने आतंकियों का बहादुरी से मुकाबला करते हुए सभी पांच आतंकियों को मार गिराया था। लोकतंत्र पर हुए इस सबसे बड़े हमले में दिल्ली पुलिस के पांच जवान, सीआरपीएफ की एक महिला कांस्टेबल, संसद के दो गार्ड, संसद में काम कर रहा एक माली और एक पत्रकार शहीद हो गए थे। हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। इसे कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी।





5- बदबू से राज्यसभा स्थगित





राज्यसभा की कार्यवाही अजीबोगरीब कारण के चलते स्‍थगित करनी पड़ी। हुआ ये कि 10 मई 2012 को राज्यसभा के कुछ सदस्‍यों ने शिकायत की कि सदन में गैस की बदबू आ रही है। इस पर उपसभापति ने कार्यवाही पहले 15 मिनट के लिए और फिर 12 बजे तक के लिए स्‍थगित कर दी। 12 बजे सदन की कार्यवाही फिर से शुरु हो गई। 11 बजकर 27 मिनट पर सदस्यों की शिकायत के बाद जांच के लिए सदन को 15 मिनट तक के लिए स्थगित कर दिया गया।



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