देश का एक गांव ऐसा भी, जहां आजादी के बाद पहली बार लोगों ने डाला वोट

6 वर्ष पहले
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नई दिल्ली/कोलकाता. देश में एक गांव ऐसा भी है, जहां आजादी के बाद पहली बार गुरुवार को हजारों लोगों ने वोट डाला। पश्चिम बंगाल के मध्य मशालडांगा में जब 103 साल के असगर अली अपनी फैमिली के साथ पोलिंग बूथ पर पहुंचे तो खुशी के मारे उनकी आंखों से आंसू छलक उठे। बता दें कि ये इलाका दो देशों के बीच जमीन विवाद में फंसा था। हजारों लोगों की कोई पहचान नहीं थी। भारत-बांग्लादेश नहीं मानते थे नागरिक...
- असगर अली ने कहा, "मरने से पहले बस अपना वोट डाल दूं। ताकि भारत का नागरिक होने का अहसास हो, यही मेरी मुराद है।"
- जुलाई, 2015 में मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ सालों से अटके लैंड विवाद को खत्म किया था।
- एग्रीमेंट में यहां के 51 एंक्लेव भारत में शामिल हुए थे, जिनकी कुल आबादी 14864 और 9776 वोटर हैं।
- कूच बिहार में 9776 वोटर को पहली बार वोटिंग का हक मिला है। 111 एंक्लेव बांग्लादेश को मिले थे।
- बंगाल इलेक्शन के आखिरी फेज में ईस्ट मिदनापुर और कूच बिहार जिले की 25 सीटों पर वोटिंग हो रही है।
गांवों में मना था दिवाली सा जश्न
- 103 साल के असगर अली ने आजादी के बाद 68 साल तक किसी देश के नागरिक नहीं थे।
- जब कूच बिहार का लोगों को भारत में शामिल किया गया, तो दर्जनों गांवों में दिवाली सा जश्न मना।
- कूच बिहार में लोगों को अपना पिन नंबर मिला। यहां अब डाकिया भी लेटर लेकर आने लगा है।
- भारत में जुड़ने के बाद इस इलाके में बंगाल इलेक्शन के आखिरी फेज में पहली बार वोटिंग हो रही है।
क्या है मशालडांगा गांव की कहानी?
- अंग्रेजों ने 1947 में भारत छोड़ दिया। इसके बाद रंगरपुर जिला पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का हिस्सा बन गया।
- 1949 में भारत के साथ जुड़ने से पहले कूच बिहार स्वतंत्र हिस्सा था। इसी दौरान भारत के हिस्से वाले कूच बिहार के 51 एंक्लेव (बस्ती) प. बंगाल की सीमा में थे और प. बंगाल के 111 एंक्लेव भारतीय सीमा में चले गए थे।
- 1974 में दोनों देशों के बीच हुआ जमीन समझौते को लागू होने लेटलतीफी हुई और हजारों लोगों को पहचान मिलने में देरी हुई।
- कुल मिलाकर 162 एंक्लेव आधिकारिक तौर पर न तो भारत में थे और न ही बांग्लादेश में।
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