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9 वर्ष पहले
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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के इंजीनियरों और एक अमेरिकी कम्पनी के सहयोग से दो भारतीय डॉक्टरों ने पीरियड के दिनों में अत्यधिक रक्तस्राव की समस्या से परेशान रहने वाली महिलाओं के लिए एक ऐसे उपकरण का इजाद किया है, जिससे उन्हें राहत मिल सकेगी।



इसे क्रांतिकारी सफलता बताई जा रही है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इस समस्या को 'मेनोरेजिया' कहा जाता है। एक अधिकारी ने कहा कि चिकित्सकों ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के इंजीनियरों और अमेरिका की एक कम्पनी के सहयोग से इस उपकरण का विकास किया है।



इससे इस समस्या का सुरक्षित तरीके से और सरलता से इलाज किया जा सकता है। उपकरण मुंबई लोकमान्य तिलक चिकित्सा महाविद्यालय के वाई.एस. नंदनवार और चिन्मय पाटकी के मस्तिष्क की उपज है। इस महाविद्यालय को सियोन अस्पताल के नाम से भी जाना जाता है।



पाटकी ने कहा, "दुनियाभर में 35 वर्ष से अधिक उम्र की एक तिहाई से अधिक महिलाएं मेनोरेजिया से पीड़ित हैं। इस समस्या के इलाज के अधिकतर मामलों में गर्भाशय को महिलाओं के शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है, जिसे शायद ही कोई महिला पसंद करती है। गर्भाशय को बाहर निकाले जाने की प्रक्रिया को हिस्टेरेक्टोमी कहा जाता है।"



आजकल हालांकि बगैर शल्य चिकित्सा वाले दूसरे विकल्प भी उपलब्ध हैं। इनमें से एक है एंडोमेट्रियल एब्लेशन तकनीक। इसके तहत मेनोरेजिया के इलाज के लिए लेजर किरणों या इलेक्ट्रिक के झटकों का इस्तेमाल किया जाता है और इसके जरिए गर्भाशय के अंदर की सतह की झिल्ली, जिसे एंडोमेट्रियल कहा जाता है, उसे या तो नष्ट कर दिया जाता है या फिर इसे बाहर निकाल दिया जाता है।



माहवारी के दिनों में यह झिल्ली बाहर निकल जाती है या फिर प्रसव के वक्त यह गर्भनाल के साथ बाहर निकल जाती है। इस तकनीक का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन अस्पताल के स्त्री रोग विभाग के प्रमुख नंदनवार ने कहा, "इस प्रक्रिया में कुछ खामियां हैं।"



चिकित्सकों ने दो सालों के शोध के बाद एंडोमेट्रियल को नष्ट करने के लिए 'मिनिटच सिस्टम' का विकास किया। इस प्रणाली के तहत एंडोमेट्रियल को बिजली का उपयोग कर जला दिया जाता है और इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता है।



पाटकी ने कहा, "इस प्रक्रिया में एक तीन मिलीमीटर चौड़े और 24 सेंटीमीटर लम्बे माइक्रोवेव ऊर्जा वाले उपकरण का इस्तेमाल किया जाता है। इसे योनि के अंदर डालकर 90 सेकेंड बाद बाहर निकाल दिया जाता है। इसी दौरान मेनोरेजिया का स्थायी इलाज हो जाता है। नब्बे सेकेंड के दौरान गर्भाशय की झिल्ली यानी एंडोमेट्रियल नष्ट हो जाती है। इस पद्धति का दुनिया में पहली बार विकास हुआ है।"



पाटकी ने कहा, "इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की बेहोशी की दवा नहीं दी जाती है, अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं है, विशेष आराम की जरूरत नहीं है, हॉरमोन से सम्बंधित औषधि लेने की जरूरत नहीं है, कोई शारीरिक परेशानी नहीं होती है, न ही कोई दुष्प्रभाव होता है और गर्भाशय को भी बाहर नहीं निकाला जाता है।"



नंदनवार ने कहा, "यह सियोन अस्पताल के स्त्री रोग विभाग की उपलब्धि है। उम्मीद है कि अप्रैल तक यह प्रणाली पूरे भारत में उपलब्ध हो जाएगी। यह अस्पताल इस प्रणाली का उपयोग करने वाला दुनिया का पहला अस्पताल होगा।"पद्धति का ब्यौरा अमेरिका की विज्ञान पत्रिका 'मिनिमल इनवैसिव गायनोकलॉजी' में प्रकाशित किया गया। अमेरिका और यूरोप में नए उपकरण के वाणिज्यिक इस्तेमाल की अनुमति दी जा चुकी है।






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