मजबूत है 'गॉड पार्टिकल' का भारतीय कनेक्शन

10 वर्ष पहले
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कोलकाता. 'गॉड पार्टिकल' की खोज का में भारत का भी कम योगदान नहीं। ब्रह्मांड निर्माण की पहेली को समझने की चाभी माने जा रहे हिग्स बोसॉन पार्टिकल की खोज के लिए पिछले कई वर्षों से चल रहे विश्व के सबसे महत्वाकांक्षी प्रयोग से कई भारतीय संस्थान जुड़े हुए हैं। इस महत्वपूर्ण प्रयोग से भारतीय संबंध यूरोपियन सेंटर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) के वैज्ञानिकों की ओर से हिग्स बोसॉन या गॉड पार्टिक ल को खोज निकालने की घोषणा से पहले की गई टिप्पणी से भी प्रतिबिंबित होती है। जिनेवा स्थित अनुसंधान संगठन सर्न के प्रवक्ता पाउलो गिउबेलिनो ने कहा, 'भारत इस परियोजना के ऐतिहासिक जनक की तरह है।' सर्न में वैज्ञानिकों ने जब भीमकाय लार्ज हैड्रेन कोलाइडर में गॉड पार्टिकल खोज निकालने की घोषणा की तब कोलकाता के एसआईएनपी में भी उत्साह स्पष्ट रूप से झलक रहा था क्योंकि उसके वैज्ञानिकों ने सर्न में कॉम्पैक्ट मुओन सोलेनाएड (सीएमएस) प्रयोगों में महत्वपूर्ण योगदान किया था। हिग्स बोसॉन की काफी लंबे समय से खोज की जा रही थी। इंस्टीट्यूट के निदेशक मिलन सान्याल ने कहा कि भौतिक विज्ञान में यह एक ऐतिहासिक पल है और एसआईएनपी को इसका गर्व है कि वह इस प्रयोग का हिस्सा है। उन्होंने कहा, 'इस खोज को किसी संदेह से परे स्थापित करने के १लिए और अधिक आंकड़ों और गहन जांच की आवश्यकता होगी।' सान्याल ने कहा, 'विज्ञान के विकास में यह महत्वपूर्ण पल है और मुझे इस बात का गर्व है कि हमारा संस्थान, हमारा शहर और हमारा देश इस वैज्ञानिक क्रांति क ा हिस्सा है।' उन्होंने कहा, 'सीएमएस कोर टीम में एसर्आएनपी के पांच संकाय सदस्य हैं जिसमें समूह प्रमुख प्रो सुनंदा बनर्जी, प्रो. एस भट्टाचार्य, प्रो. सुचंद्र दत्त, प्रो. सुबीर सरकार और प्रो. मनोज सरन शामिल हैं।' इस बीच एस एन बोस नेशनल सेंटर फॉर बेसिक साइंसेज से जुड़े ब्रह्मांड विज्ञानी अर्चन मजुमदार ने हिग्स बोसॉन या गॉड पाटिकल से मिलते-जुलते सूक्ष्म अणु की खोज को मानव सभ्यता के लिए एक जीत करार दिया। मजुमदार ने यहां कहा, 'यह खोज मानव इतिहास में एक क्रांति है। यह मानव सभ्यता के मूल ज्ञान की महान जीत है।' गॉड पार्टिक ल की खोज को ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों को समझने में महत्वपूर्ण माना जाता है। > यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, पंजाब यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ गुवाहाटी, राजस्थान यूनिवर्सिटी, कोलकाता स्थित साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स, वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रोन सेंटर, बोस इंस्टीट्यूट और आईआईटी मुंबई, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर और आरआरकैट इंदौर के वैज्ञानिकों ने काम किया। > भारतीय वैज्ञानिक डॉ. अर्चना शर्मा महाप्रयोग में शुरु से ही शामिल रहीं। बकौल अर्चना, यह भूसे के खलिहान में सुई ढूंढने जैसा है। हम सुई को ढूंढने के कगार पर हैं। लेकिन यह नहीं कह सकते कि सुई मिल गई है। > परमाणु ऊर्जा विभाग और विज्ञान व तकनीक विभाग भी सर्न से जुड़े रहे हैं। > एफिल टावर से ज्यादा भारी 8,000 टन के चुंबक के प्रमुख हिस्से भारत में बने। > कई हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर भारत में बने या यहां की कंपनियों ने मदद की।