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फॉर हेरिटेज! कीर्तन नहीं कर सकतीं महिलाएं ...लेकिन वे ही संवार रही हैं स्वर्ण मंदिर

9 वर्ष पहले
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अमृतसर. सिखों के सर्वोच्च धार्मिक स्थल स्वर्ण मंदिर में भले ही महिलाओं को कीर्तन करने की इजाजत नहीं है, मगर यहां के विलुप्त होते दुर्लभ भित्ती चित्रों के संरक्षण और संवर्धन की जिम्मेदारी वही निभा रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों और धर्मों को मानने वाली ये महिला कलाकार इसे जल्द ही पुरानी तर्ज पर संजो देंगी। फ्रेस्को पेंटिंग के नाम से जानी जाने वाली इस कला को 'सिख स्कूल ऑफ आट्र्स' के नाम से भी जाना जाता है। स्वर्ण मंदिर की मुख्य इमारत की दीवारों तथा सीढिय़ों पर कुदरती रंगों से उकेरे गए ये चित्र आज भी अपनी बारीकी तथा मनोहारी स्वरूप के कारण दुनिया में सानी नहीं रखते।

1830 में महाराजा रणजीत सिंह ने जब इस स्थान पर सोने के पतरे चढ़ाने की सेवा शुरू की तभी इनको उकेरा गया था। उस समय सिख चित्रकार ज्ञानी संत सिंह ने मुस्लिम कलाकारों के साथ मिल कर इस पर काम किया था। इसके बाद 1910 में इस पर दोबारा चित्रकार भाई ज्ञान सिंह नक्काश ने काम शुरू किया और 32 सालों तक सेवा करते रहे। 1962 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने फिर इस पर काम करवाया। उस दौरान रंगों में वार्निश का इस्तेमाल हो जाने के कारण आहिस्ता-आहिस्ता इसका ज्यादा नुकसान हो गया।

छह सदस्यीय टीम कर रही काम
अपनी छह सदस्यीय महिला टीम के साथ इन भीत्ती चित्रों को संरक्षित कर रही नमिता जसपाल कहती हैं कि इस परंपरागत आर्ट को साइंस के नजरिए से संरक्षित किया जा रहा है, ताकि इसे लंबे समय तक महफूज रखा जा सके। नमिता ने बताया कि पहले पड़ाव में खराब पेंटिंग को साफ किया गया, फिर बारीक ब्रश से पुट्टी फिलिंग करके विशेष और पुराने तर्ज पर ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सीढिय़ों से लेकर दीवारों तक पर यह चित्र बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

बावजूद इसके दीवारों पर 2,500 तथा सीढिय़ों पर 4,000 वर्ग फुट कला बची हुई है। वह कहती हैं कि काम दिसंबर में शुरू किया गया था और चार महीने में मुकम्मल कर लिया जाएगा। स्वर्ण मंदिर के मैनेजर प्रताप सिंह कहते हैं कि दुनिया में इसी जगह पर यह कला जिंदा है। उनका कहना है कि काम पूरा होने के बाद संगत के स्पर्श से बचाने के लिए इन पर खास किस्म के शीशे भी लगाए जाएंगे।