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पदोन्नति में आरक्षण मामला:हाईकोर्ट ने पूछा- क्यों न अधिसूचना रद्द कर दें

10 वर्ष पहले
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जयपुर.हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की 11 सितंबर, 11 की अधिसूचना के आधार पर पदोन्नति में आरक्षित वर्ग को 16 व 12% सहित कुल 28% आरक्षण को चुनौती देने के मामले में सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा। अदालत ने पूछा है कि क्यों नहीं 11 सितंबर की अधिसूचना की क्रियान्विति पर रोक लगा दी जाए या उसे निरस्त कर दिया जाए।

मुख्य न्यायाधीश अरुण मिश्रा व न्यायाधीश मीना वी. गोम्बर की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश पाराशर नारायण शर्मा व समता आंदोलन समिति की याचिका पर दिया। इसमें 11 सितंबर, 11 की अधिसूचना के आधार पर विभागों में आरक्षित वर्ग को पदोन्नति में 1 अप्रैल, 97 से आरक्षण का लाभ देने को चुनौती दी और कहा कि सरकार संविधान के अनुच्छेद 309 के परंतुक के तहत अधिसूचना जारी नहीं कर सकती।

इसके तहत कोई अधिसूचना तब ही जारी हो सकती है जब कोई अधिनियम नहीं बना हो। लेकिन सरकार ने आरक्षण संबंधी अधिनियम बना रखा है, ऐसे में सरकार अधिसूचना जारी नहीं कर सकती। अधिसूचना में इंदिरा साहनी के निर्णय का उल्लंघन किया है क्योंकि उसमें पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अर्थ आनुपातिक नहीं होता लेकिन अधिसूचना में इसे आनुपातिक आधार पर परिभाषित किया है। अधिसूचना में अधिक प्रतिनिधित्व आधार पर पदोन्नत किए गए अफसरों को पदावनत करने को रोका है और सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को रीगेनिंग का लाभ नहीं दिया है। इसलिए अधिसूचना की क्रियांविति पर रोक लगाकर उसे निरस्त करें।

ये हैं अधिसूचनाएं: सरकार ने 1 अप्रैल 97 की अधिसूचना से सामान्य वर्ग को रीगेनिंग का लाभ देते हुए उनकी मूल वरिष्ठता दी जिससे सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने अपनी मूल वरिष्ठता को पुन अर्जित कर लिया। वहीं 11 सितंबर 2011 की अधिसूचना से आरक्षित वर्ग को पारिणामिक वरिष्ठता का लाभ दिया अर्थात जिस तारीख से आरक्षित वर्ग के कर्मचारी पदोन्नत हुए, उसी तारीख से उन्हें वरिष्ठता का लाभ दिया गया। इसके अलावा आरक्षित वर्ग के पदोन्नत हुए अफसरों को वापस पदावनत नहीं करने के लिए कहा गया।