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इस तरह होता है अमेरिकी राष्‍ट्रपति का चुनाव

9 वर्ष पहले
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इस साल 6 नवंबर को अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव की तारीख तय होने के बाद सरगर्मियां तेज हो गई हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की प्रक्रिया भारत के मुकाबले काफी पेचीदा और लंबी है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दुनिया का सबसे ‘ताकतवर’ माना जाने वाला मुल्क अपने राष्ट्रपति का चुनाव कैसे करता है।





अमेरिका के संविधान के अनुच्छेद 2 में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया के बारे में जिक्र है। अमेरिकी संविधान में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था है। यह विधि तब वजूद में आई जब अमेरिका के संविधान निर्माताओं को दो धड़ों के बीच समझौता हुआ। अमेरिकी संविधान निर्माताओं का एक धड़ा इस पक्ष में था कि अमेरिकी संसद को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार मिले। वहीं, दूसरा धड़ा जनता की सीधी वोटिंग के जरिए राष्ट्रपति चुने जाने के हक में था। ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ को इन दोनों धड़ों की अपेक्षाओं की बीच की एक कड़ी माना गया।




अमेरिका में दो राजनीतिक पार्टियों की व्यवस्था है। वहां चुनाव हर चार साल में एक बार होते हैं। राष्ट्रपति बनने की आकांक्षा रखने वाले उम्मीदवार सबसे पहले एक समिति बनाते हैं, जो चंदा इकट्ठा करने और संबंधित नेता के प्रति जनता का रुख भांपने का काम करती है। कई बार यह प्रक्रिया चुनाव से दो साल पहले ही शुरू हो जाती है।




औपचारिक तौर पर चुनावी साल में चुनाव प्रक्रिया ‘प्राइमरी’ के साथ जनवरी में शुरु होती है और जून तक चलती है। इस दौर में पार्टी अपने उन उम्मीदवारों की सूची जारी करती है, जो राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में उतरना चाहते हैं। इसके बाद दूसरे दौर में अमेरिका के 50 राज्यों के वोटर पार्टी प्रतिनिधि ( पार्टी डेलिगेट) चुनते हैं।




अमेरिकी संविधान प्राइमरी स्तर पर पार्टी प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया में कोई लिखित निर्देश नहीं देता है। यही वजह है कि कुछ राज्यों में जनता ‘प्राइमरी’ दौर में मतदान का इस्तेमाल न करके ‘कॉकस’ के जरिए पार्टी प्रतिनिधि का चुनाव करती है। ‘कॉकस’ के तहत राज्यों में स्थानीय स्तर पर बैठक कर पार्टी प्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है।




प्राइमरी में चुने गए पार्टी प्रतिनिधि दूसरे दौर में पार्टी के सम्मेलन (कन्वेंशन) में हिस्सा लेते हैं। कन्वेनशन में ये प्रतिनिधि पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। इसी दौर में नामांकन की प्रक्रिया होती है। राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपनी पार्टी की ओर से उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुनता है।




तीसरे दौर की शुरुआत चुनाव प्रचार से होती है। इसमें अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवार मतदाताओं का समर्थन जुटाने की कोशिश करते हैं। इसी दौरान उम्मीदवारों के बीच टेलीविजन पर इस मामले से जुड़े मुद्दों पर बहस भी होती है। आखिरी हफ्ते में, उम्मीदवार अपनी पूरी ताकत ‘स्विंग स्टे्टस’ को लुभाने में झोंकते हैं। ‘स्विंग स्टे्टस’ वे राज्य होते हैं, जहां के मतदाता किसी भी पक्ष की ओर जा सकते हैं।




चुनाव की अंतिम प्रक्रिया में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ राष्ट्रपति पद के लिए मतदान करता है। लेकिन इससे पहले राज्यों के मतदाता इलेक्टर चुनते हैं, जो राष्ट्रपति पद के किसी न किसी उम्मीदवार का समर्थक होता है। ये इलेक्टर एक ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ बनाते हैं, जिसमें कुल 538 सदस्य होते हैं। ‘इलेक्टर’ चुनने के साथ ही आम जनता के लिए चुनाव खत्म हो जाता है। अंत में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के सदस्य मतदान के जरिए अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टोरल मत जरुरी होते हैं।




हर राज्य का इलेक्टर चुनने का कोटा तय होता है। यह संख्या हर राज्य से अमेरिकी संसद के दोनों सदनों-हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सेनेट के सदस्यों की कुल संख्या के बराबर होती है। इसलिए हर राज्य के इलेक्टरों की संख्या में अंतर होता है। चुनाव के लिए भी दिन निश्चित होता है। ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ राष्ट्रपति पद के लिए चुनावी साल के नवंबर महीने में पड़ने वाले पहले सोमवार के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मतदान करता है।




उपराष्ट्रपति
इस साल अमेरिका में 6 नवंबर को ही राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव में ही इलेक्टोरल कॉलेज उपराष्ट्रपति पद के लिए भी मतदान करेगा। कोई भी इलेक्टर दोनों पदों के लिए एक ही स्टेट के उम्मीदवारों को वोट नहीं दे सकता है। चुनाव के इस तरीके से उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को चुनौती देने की संभावना खत्म हो गई। 1804 से पहले उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इलेक्टोरल कॉलेज ही करता था, लेकिन तब अलग-अलग मत नहीं डाले जाते थे। तब जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते था, वह राष्ट्रपति बनता था। दूसरे नंबर पर रहने वाला व्यक्ति उपराष्ट्रपति चुना जाता था।

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