यूं ही नहीं हुआ है अभिषेक मनु सिंघवी का इस्तीफा

10 वर्ष पहले
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नई दिल्ली. कांग्रेस अपने प्रवक्ता व सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के इस्तीफे के लिए यूं ही सक्रिय नहीं हुई। दरअसल पार्टी को यह फैसला बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने से पहले विपक्ष के दबाव में लेना पड़ा। भाजपा नेता व राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली इस मामले में एक दिन पहले ही राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी से मिले थे।

उन्होंने सभापति से कहा कि ऐसा व्यक्ति किसी संसदीय समिति का चेयरमैन नहीं रह सकता है जिस पर बेहद आपत्तिजनक आरोप लग रहे हों। सूत्रों के मुताबिक यह संदेश कांग्रेस के फ्लोर मैनेजरों तक भी पहुंच गया। माना जा रहा है कि कांग्रेस नहीं चाहती थी कि किसी भी सूरत में बेहद अहम संसद सत्र सिंघवी के बहाने बाधित हो।

सूत्रों का कहना है कि भाजपा ने दोतरफा तरीके से सरकार और कांग्रेस को संसद में घेरने की रणनीति बनाई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि अगर कांग्रेस ने सांसद के इस तर्क को मान लिया कि सीडी सही नहीं है और इससे छेड़छाड़ की गई है और उनका ड्राइवर ब्लैकमेल कर रहा है, तो यह मामला संसदीय विशेषाधिकार नियमों के तहत जांच की परिधि में आता है।

इसके मुताबिक किसी संसद सदस्य के साथ इस तरह का आचरण अवमानना की परिधि में आता है। दूसरी तरफ अगर सीडी में कथित रूप से किसी को जज बनवाए जाने के वादे का आरोप सही है तो यह मामला सदन की एथिक्स कमेटी के पास भेजा जाना चाहिए।

सिंघवी के इस्तीफे के बाद भी भाजपा इस मामले को छोडऩे के मूड में नहीं है। जेटली ने एनडीए की बैठक के बाद कहा कि सिंघवी ने भले ही इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन उन्हें संसद में अपनी स्थिति साफ करनी होगी।