ग्राउंड रिपोर्ट / आखिर दुनियाभर में मशहूर रही नैनो कार के प्लांट में हो क्या रहा है?

तस्वीर साणंद प्लांट की है। यहां अब तक कुल 4.50 लाख कारें बन चुकी हैं। इनमें 1.20 लाख नैनो हैं। तस्वीर साणंद प्लांट की है। यहां अब तक कुल 4.50 लाख कारें बन चुकी हैं। इनमें 1.20 लाख नैनो हैं।
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तस्वीर साणंद प्लांट की है। यहां अब तक कुल 4.50 लाख कारें बन चुकी हैं। इनमें 1.20 लाख नैनो हैं।तस्वीर साणंद प्लांट की है। यहां अब तक कुल 4.50 लाख कारें बन चुकी हैं। इनमें 1.20 लाख नैनो हैं।

  • साणंद प्लांट देश का इकलौता प्लांट जहां इलेक्ट्रिक कार सहित बनती हैं तीन मॉडल की कारें
  • रिपोर्ट के मुताबिक टाटा अब नैनो कार ऑन डिमांड ही बनाएगी

Dainik Bhaskar

Dec 01, 2019, 11:12 AM IST
महेश त्रिवेदी.अहमदाबाद. गुजरात का साणंद। दुनिया की सबसे चर्चित कारों में से एक टाटा नैनो का प्लांट यहीं है। वर्ष 2010 में जब यहां लखटकिया कार बननी शुरू हुई तो उस पर दुनियाभर की नजरें थीं, लेकिन आज इस प्लांट में नैनो न के बराबर बन रही है। अब इसे ऑर्डर मिलने पर ही बनाया जा रहा है। नैनो प्लांट में अब इलेक्ट्रिक कारों पर काम हो रहा है। हाई लेवल की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता वाले 193 रोबोट यहां कारों के उत्पादन में मदद कर रहे हैं। खास बात यह है कि साणंद प्लांट देश का इकलौता कार प्लांट है, जहां कार के तीन मॉडल- नैनो, टाटा टियागो और टाटा टिगॉर (इलेक्ट्रिक भी) सीरीज की कारों का उत्पादन हो रहा है। यहां 2017 में टाटा टिगॉर का उत्पादन शुरू किया गया, अब तक 3000 टिगॉर कारों का उत्पादन हो चुका है। यहां कई तरह के इंजन भी बनाए जा रहे हैं। टाटा मोटर्स की पैसेंजर व्हीकल बिजनेस यूनिट के अध्यक्ष मयंक पारीक बताते हैं कि हमारे कुल यात्री व्हीकल उत्पादन में साणंद प्लांट की 60% की हिस्सेदारी है।

प्लांट में अब तक बनी हैं 1.20 लाख नैनो

  1. जिन्होंने पहली नैनो खरीदी थी, वे क्या कहते हैं...

    मुंबई में रहने वाले पूर्व कस्टम अधिकारी अशोक विचारे ने पहली नैनो खरीदी थी, वे अब इस दुनिया में नही हैं। पूर्व बैंकिंग अधिकारी रहीं उनकी पत्नी शैला ने बताए अपने अनुभव...

    देश की पहली सिल्वर रंग की नैनो कार जब हमें मिली, तो लगा कि हम रातोंरात सेलिब्रिटी बन गए हैं। जापान और कोरिया जैसे देश से लोग हमारा इंटरव्यू लेने हमारे घर आए। चूंकि नैनो कार हमें जुलाई महीने में गणेशोत्सव से कुछ दिन पहले मिली थी। लिहाजा गणपति के दौरान स्थानीय गणपति मंडलों ने हमारे बड़े-बड़े हाेर्डिंग लगाए थे। मैं इलाहाबाद बैंक के सायन ब्रांच में तब कार्यरत थी। वहां के अधिकारियों ने मुझे सपरिवार बैंक के वर्ली स्थित रीजनल कार्यालय बुलाकर स्वागत किया। हमारे बैंक की इन हाउस निकलने वाली मैग्जीन में भी मेरे परिवार की नैनो कार के साथ फोटो छापी गई। मेरे पति के कई रिश्तेदार पुणे में रहते थे। इसलिए हम अक्सर नैनो कार से ही पुणे जाया करते थे। मेरे पति कोंकण के चिपलून के पोमेंडी गांव के मूल निवासी थे। उनकी इच्छा थी कि वे नैनो कार से अपने पैतृक गांव जाएं। मगर जब हमने 2009 में नैनो कार खरीदी उसके बाद लगभग एक साल से अधिक समय तक हम लगातार इंटरव्यू देने सहित अन्य कार्यों में इतने व्यस्त रहे कि नैनो कार लेकर पैतृक गांव पोमेंडी तक नहीं जा सके। नैनो से मेरे पति का भावनात्मक लगाव था। परंतु उसी नैनो कार से 2015 में होली के आस-पास नवी मुंबई के कलंबोली से जब मेरे पति पुणे से घर लौट रहे थे, तब वे बहुत ही भीषण दुर्घटना के शिकार हो गए। हादसा इतना दर्दनाक था कि वे नैनो कार की स्टीयरिंग और अगले हिस्से के बीच काफी देर तक दबे रहे। भीषण हादसे के बावजूद उनकी नैनो कार के प्रति दिवानगी खत्म नहीं हुई। उन्होंने दूसरी कार भी नैनो की ही एक्सटीए ऑटोमेटिक मॉडल खरीदी। मैंने 2017 में पति के स्वर्गवास के बाद भी नैनो कार के प्रति उनके भावनात्मक लगाव की वजह से दूसरी नैनो कार को मुलुंड के अपने निवास स्थान की पार्किंग में सुरक्षित खड़ी रखी। मुझे कार चलाना नहीं आती है। लिहाजा पार्किंग में नैनो खड़ी रहने की से दो बार बैटरी डाउन हो गई और साथ में सर्विसिंग सहित अन्य रिपेयर के काम निकलने लगे, तो मैंने कार को पिछले सितंबर महीने में अपने भतीजे अनिकेत को चलाने के लिए दे दिया। पहली नैनो कार को तो मेरे पति अपने चिपलून के पैतृक गांव को लेकर नहीं जा पाये, परंतु भतीजा अनिकेत दूसरी नैनो कार को चिपलून तक चलाकर ले गया। (जैसा उन्होंने भास्कर के विनोद यादव को बताया।)

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