इनोवेशन / फ्लाइंग कारों से बदलेगा शहरों में ट्रांसपोर्ट का तरीका

flying cars will change cities Transportation
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flying cars will change cities Transportation

  • अमेरिका, चीन और जर्मनी में ऐसी कारें ट्रायल के निर्णायक दौर में पहुंची 
  • कई कंपनियों ने ड्रोन की टेक्नोलॉजी के आधार पर भी प्रोटोटाइप बनाए
  • इनमें से कुछ का उपयोग हवाई टैक्सी सेवाओं के लिए होने की संभावना

Jun 08, 2019, 09:13 AM IST

ऑटो डेस्क. भीड़ भरे शहरों में स्थानीय ट्रांसपोर्ट से निपटने की समस्या का हल फ्लाइंग कारों के रूप में देखा जा रहा है। वर्षों से लोग उड़ने वाली कारों की चर्चा करते रहे हैं लेकिन, वे दिखाई नहीं देती थीं। इधर, कई कंपनियों ने निजी पर्सनल एयर ट्रांसपोर्ट का सपना सच करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। एक या दो सीटर फ्लाइंग कार बनाने के प्रोजेक्ट कुछ देशों में चल रहे हैं। इनमें प्रमुख है गूगल के को-फाउंडर लैरी पेज की कंपनी ओपनर का ब्लैकफ्लाई प्रोजेक्ट।

 

शहरों में हवा में उड़कर जाने का मुहावरा ब्लैकफ्लाई के पीछे काम कर रहा है। ब्लैकफ्लाई अब तक निर्मित उड़ने वाली मशीनों में सबसे अजीब है। यह छोटी व्हेल मछली के समान दिखती है। उसके अगले और पिछले हिस्से में दो विंग हैं। हर विंग में चार प्रोपेलर हैं। यह कार जैसी नजर नहीं आती है। सिंगल सीटर और बगैर व्हील की है। इसका लक्ष्य कार की श्रेणी में शामिल होने का है। रफ्तार-100 किमी प्रतिघंटा- कार जैसी है। रेंज 40 से 60 किमी है। पेज और ब्लैक फ्लाई के आविष्कारक मार्कस लेंग को उम्मीद है, उनका प्रोजेक्ट ट्रांसपोर्ट में क्रांति लाएगा। ब्लैकफ्लाई का फ्रेम कार्बन फाइबर का है। यह बैटरी से चलती है। उसमें दुर्घटना से बचाव का स्मार्ट सॉफ्टवेयर है।

 

ब्लैकफ्लाई के समान अधिकतर नए डिजाइन ड्रोन के समान बिजली से चलने वाले प्रोपेलर पर आधारित हैं। कुछ कंपनियों ने सीधे ड्रोन को बेहतर बनाकर हवाई वाहन का रूप दिया है। इनमें से एक है, चीनी कंपनी ईहेंग जो पहले ही ड्रोन बना रही है। ईहेंग के दो सीटर- द 216 वाहन को 4 अप्रैल को विएना में एक शो में लॉन्च किया गया। ब्लैकफ्लाई को तो कोई व्यक्ति उड़ाएगा लेकिन द 216 शुरुआत में रोबोट से चलेगा। ईहेंग की योजना इसे निजी वाहन की बजाय टैक्सी के रूप में चलाने की है। जर्मन कंपनी ने ड्रोन अपग्रेड कर वोलोकॉप्टर बनाया है। दो सीट वाले केबिन के निचले हिस्से में 18 प्रोपेलर का मकड़ी जैसा ढांचा है। ईहेंग की तरह इसमें ट्रैफिक जाम से बचने के लिए पहले से प्रोग्राम तय रहेगा। एक अन्य जर्मन कंपनी लिलियम ने दूसरा तरीका अपनाया है। उसका बिजली से चलने वाला वाहन मई में पहली उड़ान भर चुका है।

 

सिलिकॉन वैली में लैरी पेज की आंशिक हिस्सेदारी की एक कंपनी किटी हाक ने अपने वाहन में अतिरिक्त उठाव के लिए विंग लगाए हैं। उसके दो सीटर कोरा में 12 प्रोपेलर हैं। एयर बस की स्पेशल प्रोजेक्ट यूनिट ए 3 ने चार प्रोपेलर और विंग्स की वहाना नामक मशीन बनाई है। बोइंग भी देर से इस उड़ान में छलांग लगा चुकी है। उसने जनवरी में अपना अनाम वाहन पेश किया है। कई कंपनियां इन वाहनों को टैक्सी सेवा के रूप में चलाएंगी।

 

अगर उड़ती कारें वास्तव में चल निकलीं तो ये स्थानीय ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के लिए बदलाव लाने वाली टेक्नोलॉजी साबित होंगी। कुछ कंपनियां कॉमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने वाली हैं। ईहेंग को अप्रैल में चीन सरकार से यात्रियों के साथ परीक्षण उड़ानें प्रारंभ करने की अनुमति मिल चुकी है। वोलोकॉप्टर एयर टैक्सी सर्विस चलाने के लिए इस वर्ष सिंगापुर में ट्रायल करेगी। ओपनर की योजना वर्ष के अंत तक ब्लैकफ्लाई की कॉमर्शियल सेवाएं शुरू करने की है। और उधर साओ पाउलो,ब्राजील में भीड़ भरी सड़कों से बचने के लिए हेलिकॉप्टर टैक्सी सेवाएं चलाने की इजाजत दे दी गई है।

 

फ्लाइंग कार


पायलट विहीन प्लेन, हेलिकॉप्टर आ रहे हैं


पिछले वर्ष बोइंग की रिपोर्ट में अंदाजा लगाया गया कि अगले बीस वर्षों में सिविल एविएशन को सात लाख 90 हजार कॉमर्शियल पायलट की जरूरत होगी। इसका हल बेहतर टेक्नोलॉजी है। एयरबस और बोइंग केवल एक पायलट से विमान उड़ाने की तैयारी में लगे हैं। दोनों कंपनियां ऐसे कॉकपिट सिमुलेटर का परीक्षण कर रही हैं। मालवाहक विमानों को एक पायलट या ड्रोन जैसा बनाने की संभावना कायम है। अमेरिकी सेना जल्द ही पायलट विहीन हेलिकॉप्टर चलाएगी। लॉकहीड मार्टिन ऐसे एक हेलिकॉप्टर का परीक्षण कर रही है। बोइंग कंपनी 12 मीटर लंबे एक विमान को पायलट के बिना चलाने के प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। अगले वर्ष उसके प्रोटोटाइप आ जाएंगे।

 

फ्लाइंग कार

 

लगभग 40 हजार विमानों की जरूरत पड़ेगी


दुनियाभर में एयरट्रैफिक बढ़ रहा है। यूरोपीय विमान निर्माता एयरबस के अनुसार अगले दो दशक में हवाई यातायात हर वर्ष 4.4% की दर से बढ़ेगा। इसके लिए कोई 36,600 नए यात्री और 830 मालवाहक विमानों की जरूरत पड़ेगी। अमेरिकी कंपनी बोइंग का कहना है, इस दौरान ट्रैफिक 4.7 % सालाना बढ़ेगा। 41 हजार नए एयरक्राफ्ट की जरूरत होगी। 2015 में एयरबस के ए 320 और बोइंग 737 का प्रोडक्शन हर माह लगभग 40 प्लेन था। यह इस वर्ष बढ़कर हर माह 60 हो जाएगा। दोनों कंपनियां निर्माण की टेक्नोलॉजी में परिवर्तन कर रही हैं। मैटल के स्थान पर कार्बन फाइबर का ज्यादा उपयोग हो रहा है। इंडस्ट्रियल सिल्क से एयरफ्रेम बनेंगे।

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