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बिहार चुनाव विश्लेषण:बड़ी पार्टियों के पास खुद के बूते बहुमत जुटाने का जनाधार नहीं, गठजोड़ मजबूरी, अकेले चुनाव लड़ेंगी तो खंडित जनादेश, नहीं बन पाएगी सरकार

बिहार चुनाव2 महीने पहले
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  • जानिए, क्यों महत्वपूर्ण है बिहार में गठबंधन की राजनीति

(प्रो. संजय कुमार, सीएसडीएस) अपने बूते बहुमत बटोरने की कमी ने बिहार में पार्टियों को गठबंधन के लिए मजबूर कर रखा है। यह परिदृश्य 1990 के बाद हुए विधानसभा के 7 चुनावी नतीजों से स्पष्ट है और 2020 के विधानसभा चुनाव में भी यही कहानी दोहरायी जाएगी।

राज्य की राजनीति में सक्रिय दो राष्ट्रीय दलों-भाजपा व कांग्रेस और दो क्षेत्रीय दलों-राजद व जदयू में से कोई भी एक बीते तीन दशक में हुए चुनावों में एक बार भी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सका। ऐसे में लोजपा, हम (से.), वीआईपी, रालोसपा जैसे छोटे दलों से बहुमत पाने की उम्मीद बेमानी है।

लोकप्रिय मुख्यमंत्री होने के बावजूद नीतीश कुमार और उनकी पार्टी का कुछ जिलों में ही व्यापक जनाधार है। हाल के वर्षों में भाजपा का जनाधार बढ़ा है, लेकिन उतना भी नहीं कि वह अकेले सरकार बनाने की स्थिति में आ गई हो। यह स्थितियां ही सरकार बनाने का दावा कर रहीं पार्टियों को गठबंधन के लिए विवश करती हैं। किसी दल को बहुमत नही मिलने की वजह उसके जनाधार से ही समझा जा सकता है। जदयू और राजद की लोकप्रियता मूलत: कुर्मी और यादव में है। लोजपा और हम का मूलाधार दलित हैं जबकि भाजपा और कांग्रेस सवर्ण मतदाता समूह से मूल ऊर्जा सोखती हैं।

राज्य में सक्रिय राजनीतिक दलों में से भाजपा, राजद और जदयू का जनाधार करीब-करीब बराबर है और बीते कई चुनाव के आंकड़ों से यह प्रमाणित भी होता है। कांग्रेस, लोजपा, हम, रालोसपा का भी यही हाल है, चुनावी आंकड़े इसे पुष्ट करते हैं और यह भी बताते हैं कि भाजपा, जदयू और राजद की तुलना में इन पार्टियों का सपोर्ट बेस बहुत छोटा है।

राज्य की राजनीति में सक्रिय कई दूसरे दलों और छोटे-छोटे सामाजिक समूहों से उन्हें मिल रहे समर्थन ने राज्य की चुनावी जमीन को ही छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट रखा है। और यही वजह है कि चुनाव के दौरान पार्टियां हाथ मिलाती रहती हैं क्योंकि अपनी लोकप्रियता के शिखर पर होते हुए भी ये बहुमत से दूर रह गईं। वे किसी दूसरे दल के आधार वोट में सेंध नहीं लगा पाईं।

यह सब इसलिए कि मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के बाद के दौर में मतदाताओं के मध्य अपनी चुनी हुई पार्टी के प्रति गजब की वफादारी बढ़ी है। खासकर क्षेत्रीय दलों के प्रति जिनकी बुनियाद जातीय जुटान पर टिकी है। मंडल दौर के पहले मतदातों में पार्टियों के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता नहीं थी।

पार्टियां भी अब अपने कोर सपोर्ट बेस के बाहर से समर्थन जुटाने, दूसरे जातीय समूहों को आकर्षित करने में असमर्थ हैं। मूलत: जातीय जनाधार पर टिकी पार्टियों के पास उतना वोट बेस है ही नहीं कि वह सरकार बना लें। पार्टियां चुनाव पूर्व गठबंधन इसलिए बना रहीं कि एक-दूसरे का वोट बेस ट्रांसफर हो सके।

सवर्णों के बीच लोकप्रिय भाजपा, और कुर्मी-कोयरी के बीच से मूल ताकत पाने वाली जदयू के वोट दोनों पार्टियों के एकमंच पर आते ही एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। यही हाल राजद के मूल जनाधार यादव-मुस्लिम का भी है और कांग्रेस भी थोड़ा-बहुत वोट इधर-उधर से बटोर लाती है।

बिहार में यदि गठजोड़ न हो और सभी पार्टियां अकेले दम चुनाव लड़ेंगी तो खंडित जनादेश ही आएगा और कोई सरकार नहीं बना पाएगा। इसीलिए बिहार में चुनाव पूर्व गठजोड़ बनाने पर जोर है और गठजोड़ का स्वरूप ही इस चुनाव में भी पार्टियों की सफलता का सूत्र साबित होगा।

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